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Movie Review: 'बुलेट राजा'

उत्तर प्रदेश की पृष्ठभूमि में बनी इस फ़िल्म को तिग्मांशु ने बड़ी बारीकी से हर तरह से ठेठ यूपी वाला लुक दिया है।

Dainik Bhaskar

Nov 29, 2013, 12:00 AM IST
Movie Review: Bullet Raja

सैफ अली खान आज बॉक्स ऑफिस पर 'बुलेट राजा' बनकर उतरे हैं। बुलेट राजा एक गैंगस्टर बेस्ड थ्रिलर मूवी है।इसमें ढेर सारा एक्शन आपको मिलेगा ही, इसकी गारंटी है।

कहानी: फ़िल्म की कहानी घूमती है उत्तर प्रदेश के लखनऊ में रहने वाले राजा मिश्रा (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द जो एक बहादुर और जिद्दी किस्म का इंसान है। वह दिल का नरम, मगर ऊपर से गरम है। वह लाइफ में कुछ करना चाहता है, मगर सीधे तरीके से उसे सफलता नहीं मिलती।

सिस्टम की बेरुखी से वह और ज्यादा आग-बबूला हो जाता है और गैंगस्टर बन जाता है। क्राइम के जरिए वह अपना गुस्सा जाहिर करता है। इसमें उसका साथ देता है उसका दोस्त रूद्र (जिमी शेरगिल)। दोनों मिलकर शहर में उत्पात मचाते हैं। राजा अब 'बुलेट राजा' बन चुका है जो अकड़ू है और जिसे सिर्फ पैसों और पावर से प्यार है। एक दिन उसकी मुलाकात होती है सोनाक्षी सिन्हा से जो उसकी जिंदगी में प्यार भी ले आती है।

ये तो रही कहानी। अब बात करते हैं फ़िल्म के ट्रीटमेंट की। क्या बुलेट राजा में वह ताकत है जो दर्शकों को थिएटर तक खींच लाए। जवाब है, बहुत ज्यादा नहीं। 'पान सिंह तोमर' और 'साहेब बीवी गैंगस्टर' जैसी फिल्में बना चुके तिग्मांशु धूलिया की यह फ़िल्म उनकी पिछली फिल्मों की तुलना में काफी कमजोर है। यहां तक कि यह फ़िल्म सिंघम और दबंग जैसी बॉलीवुड मसाला जैसी फिल्मों की कैटेगरी में भी आने से चूक जाती है। फ़िल्म का फर्स्ट हाफ या कहें शुरुआती आधे घंटे तो बेहद कमजोर हैं और उसमें हमें कुछ नया देखने को नहीं मिलता।

निर्देशन: तिग्मांशु धूलिया जैसे मंझे हुए निर्देशक एक मसाला फ़िल्म बनाने के चक्कर में चूक गए। कई बार आप समझ ही नहीं पाते कि कहानी किस दिशा में जा रही है। फ़िल्म के पहले भाग में किरदारों का बचकाना व्यवहार भी कई बार आपको इरिटेट कर देता है। फ़िल्म में तिग्मांशु उत्तर प्रदेश का ठेठ अंदाज दिखाने में कामयाब हुए हैं।

उन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान दिया है फ़िल्म के डायलॉग्स और उसके उच्चारण पर, मगर इसके अलावा काश वह फ़िल्म की कहानी में कसावट ले आते तो यह एक अच्छी फ़िल्म बन सकती थी। पहले भाग की अपेक्षा फ़िल्म का दूसरा भाग ज्यादा सधा हुआ है। इससे आपको लगता है कि फ़िल्म देखकर आपका कुछ हद तक मनोरंजन तो हो ही गया।

एक्टिंग: वैसे, भले ही फ़िल्म की कहानी और निर्देशन में कई कमियां हों, मगर इसमें कलाकारों की जानदार एक्टिंग की तारीफ न करना बेईमानी होगी। ठेठ देसी किरदार में सैफ खूब जमे हैं।

अपनी इमेज के बिलकुल उलट बुलेट राजा जैसे किरदार को निभाकर सैफ अपने कम्फर्ट जोन से तो बाहर निकले ही हैं, साथ ही बेहतरीन परफॉर्मेंस देने में भी कामयाब हुए हैं। जिमी शेरगिल ने एक बार फिर साबित किया है कि वह कितने टैलेंटेड एक्टर हैं।

गुलशन ग्रोवर और रवि किशन ने भी अपने किरदारों में अच्छा काम किया है। विद्युत् जामवाल की स्क्रीन प्रजेंस भी दमदार है।

फ़िल्म की सबसे कमजोर कड़ियों में से एक सोनाक्षी सिन्हा भी हैं। इस फ़िल्म में भी वह अपनी पिछली फिल्मों जैसी ही लगी हैं। लगता है राउडी और गैंगस्‍टर टाइप ग्रे केरेक्‍टर्स के अपोजिट मेन लीड करना उनका जॉनर बनता जा रहा है और इसमें उनके करने लायक कुछ नहीं होता।

म्यूजिक: म्यूजिक भी फ़िल्म की कमियों में से एक है। कई गाने न सिर्फ आपको बोर करते हैं, बल्कि इनकी टाइमिंग भी बिलकुल गलत लगती है। हालांकि, रफ्तार, आरडीबी और निंदी कौर की तिकड़ी ने सैफ और सोनाक्षी को 'तमंचे पे डिस्को' करा के दर्शकों का फुल पैसा वसूल कराया है।

कुल मिलाकर कहा जाए तो इतनी सारी खामियों के बावजूद भी फ़िल्म बुरी नहीं है। अंतिम 20 मिनट आपका भरपूर मनोरंजन कर देते हैं। ऐसे में, इस वीकेंड अगर आपके पास कुछ खास करने लायक न हो तो आप एक बार फ़िल्म को देख सकते हैं।

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