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Movie Review: सिटी लाइट्स

भारतीय दर्शक इस तरह के सिनेमा से अक्सर दूरी बनाकर रखते हैं, लेकिन सिटी लाइट्स शायद इस ट्रेंड को बदल कर रख दे।

Dainik Bhaskar

May 29, 2014, 12:07 AM IST
Movie Review: City Lights
हिंदी सिनेमा में बदलाव का दौर आ गया है। पैरलल सिनेमा को लेकर मिथक टूटते दिखें तो आश्चर्य नहीं, तो दूसरी ओर ऐसी फिल्मों को दर्शक भी मिल रहे हैं। कम से कम 'आर राजकुमार', 'रागिनी एमएमएस-2' और 'हीरोपंती' जैसी फिल्मों को देख कर ऊब चुके दर्शकों के लिए तो सुकून भरी खबरें इधर आने लगी हैं।
कमर्शियल सिनेमा को कड़ी टक्कर देने के लिए न केवल पैरलल सिनेमा मजबूत हो रहा है बल्कि निर्माता अब इन फिल्मों में पैसा लगाने से भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। अब शायद ऐसी फिल्मों का दौर आने लगा है जो सिनेमा हॉल के अंदर तो दर्शकों को बांधे ही रखे, लेकिन जब दर्शक सिनेमा हॉल की सीट छोड़े तो कुछ सवाल भी अपने साथ लेकर जाए।
ऐसी फिल्में जो न केवल सिनेमा के व्यापक मायनों को जीवित करे बल्कि ऐसी भी जो कि महज टाइमपास तक ही ना सिमटी रहें। 'सिटी लाइट्स' ऐसी ही फिल्म है, जो आपको सोचने पर मजबूर कर देगी।
कहानी: फिल्म की कहानी राजस्थान के एक ऐसे छोटे व्यापारी की कहानी है, जो बेहतर जिंदगी की तलाश में अपने परिवार के साथ मुंबई पहुंच जाता है। मुंबई जैसा कि वह सोचता है उससे कई गुना उलट है। एक ऐसा शहर जो कभी किसी की परवाह नहीं करता और रात भर जागता है। अगर आप 'सिटी लाइट्स' के ट्रेलर को देखकर दंग हैं तो फिर पिक्चर तो अभी बाकी है मेरे दोस्त।
यहां हम फिल्म के दो न भुलाए जा सकने वाले सीन के साथ फिल्म के बारे में बात करते हैं। फिल्म के मध्य में राखी (पत्रलेखा) नौकरी की तलाश में एक डांस बार मालिक के पास जाती है, जो राखी को ऊपर से नीचे तक घूरता है और उसे पूरा देखने के लिए पीछे घूमने के लिए कहता है। इसके बाद वह उसे खुश करने के लिए रेखा को डांस करने के लिए कहता है, जबकि वह चिल्ला रही होती है।
एक अन्य सीन में दीपक (राजकुमार) जो यह जानता है कि उसकी पत्नी एक डांस बार में काम कर रही है, गुस्से में घर लौटता है और अपनी पत्नी से डांस करने के लिए कहता है। वह इसके विरोध में दीपक को एक थप्पड़ जड़ती है, जिससे वह जमीन पर गिर जाता है।
हंसल ने फिल्म के हर सीन को बेहद संजीदगी और खूबसूरती से कैमरे में कैद कर लिया है। फिल्म ने मुंबई के प्रति उस धारणा को भी खारिज किया हे, जिसे आप अक्सर फिल्मों में देखते हैं। फिल्म आपका ध्यान खींचती है और आपको बांधे रखती है। फिल्म खत्म होने के बाद भी आपको कचोटती रहेगी, जो आपके अंदर सवाल पैदा करती है।

एक्टिंग: नेशनल अवार्ड विनिंग एक्टर राजकुमार राव दुबारा से अपनी परफॉरमेंस के जरिए अवार्ड की दौड़ में हैं। राजकुमार ने अपनी बेहतरीन अदाकारी से अपने किरदार में जान फूंक दी, जैसा कि उनसे उम्मीद की जा रही थी। इस फिल्म को देखकर लगता है मानों हंसल मेहता राजकुमार के लिए ही बने हों, जैसे करण जौहर शाहरुख खान या फिर डेविड धवन गोविंदा के लिए।
पत्रलेखा ने भी राजकुमार राव की ही तरह फिल्म में बेहतर अभिनय किया है। कहीं भी फिल्म में उनकी अदाकारी को देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि यह उनकी पहली फिल्म है। फिल्म के कुछ दृष्यों में वह राजकुमार को ओवरशैड़ो भी कर रही हैं।
डायरेक्शन: फिल्म 'शाहिद' के बाद हंसल मेहता अपने चहेते राजकुमार राव के साथ ऐसी ही एक और फिल्म 'सिटी लाइट्स' लेकर आएं हैं जो अपको डराएगी भी तो जिंदगी की भयावह सच्चाई का आईना भी दिखा देगी। इसे महज एक फिल्म नहीं कहा जा सकता।
यह एक आर्ट पीस है, लेकिन यह भी सच है कि यह कमर्शियल सिनेमा नहीं है। फिल्म का डायरेक्शन नि:संदेह शानदार है। डायरेक्टर हंसल मेहता ने महानगरों की सच्चाई और आम आदमी के सपनों, संघर्षों और डर को जिस खूबी से कैमरे में कैद किया है, वह काबिले तारीफ है।
संगीत: इस तरह की जोनर की फिल्मों से अलग हटकर सिटी लाइट्स का संगीत भी प्रभावित करता है। हालांकि फिल्म में दो गाने अनावश्यक डाले गए हैं, लेकिन इसका बैकग्राउंड म्यूजिक कर्णप्रिय बन पड़ा है।
क्यों देख सकते हैं फिल्म?
यह एक बड़ा सवाल है कि आखिर फिल्म को क्यों देखा जाए। 'सिटी लाइट्स' एक कमर्शियल फिल्म नहीं है। यह ऐसी फिल्म नहीं है जिसे आप अपने परिवार के साथ महज मूड को सही करने के लिए सिनेमाघरों में जाएं।
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