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Movie Review: 'हैदर'

शेक्सपियर के एक-एक किरदार को मंच पर उतारना जितना मुश्किल और जोखिम भरा होता है, विशाल भारद्वाज की फिल्मों में उन्ही किरदारों के साथ आप बहते चले जाते हैं।

Dainik Bhaskar

Oct 02, 2014, 04:29 PM IST
Movie Review: Haider
बात चाहे ओमकारा की हो, मकबूल की या फिर आज रिलीज हुई फिल्म हैदर की... तीनों ही फिल्में शेक्सपियर के ओथेलो, मैकबेथ और हेमलेट का अडॉप्टेशन हैं।
विशाल भारद्वाज की इन फिल्मों की खूबी यही है कि किरदार कहानी से इधर-उधर नहीं भटकते और ना ही फिल्म के अंत तक अपनी गढ़ी हुई पृष्ठभूमि से अलग हो पाते हैं। हैदर में भी यही बात है। विशाल ने डेनमार्क के 'हेमलेट' को कश्मीर का 'हैदर' बनाया, न कि इलाहाबाद का हरीश या फिर गोवा का हरमन। फिल्म देखते हुए यही खूबसूरती आपको अंत तक बांधे रखेगी और शायद आपको भी लगे कि हेमलेट को उठाकर यदि आज के भारत में कहीं फिट किया जा सकता है तो उसके लिए कश्मीर ही सबसे उम्दा बैकग्राउंड होगा और हैदर सही मुखौटा...!! इसमें राजा और रानी तो नहीं, लेकिन साम्राज्य कमोबेश वही है। हेमलेट में सत्ता पाने की चाह में क्लॉडियस था, यहां वह खुर्रम की शक्ल में है और डेनमार्क की जगह बर्फबारी में भी दहकता कश्मीर।

कहानी
हैदर की कहानी एक डॉक्टर (नरेंद्र झा) से शुरू होती है, जो एक दिन अपने घर पर एक मरीज को इलाज के लिए ले आता है। यह मरीज अलगाववादी संगठन का कमांडर है और हिंदुस्तानी फौज को उसकी तलाश होती है। फौज को सूचना मिलती है कि कमांडर का इलाज अनंतनाग के एक घर में हो रहा है। फौज मुखबिर की सूचना पर गांव में धावा बोलती है और गांव के हर शख्स को शिनाख्त के लिए इकठ्ठा करती है। इस दौरान मुखबिर डॉक्टर को पहचान लेता है। फौज डॉक्टर को उठा ले जाती है और आंतकियों को मारने के लिए डॉक्टर के घर को बम से उड़ा देती है। इधर, डॉक्टर का बेटा हैदर (शाहिद कपूर) अलीगढ़ यूनिवर्सिटी से सूचना पाकर अपने गांव लौटता है। यहां उसे अपनी प्रेमिका अर्शिया (श्रद्धा कपूर) से मालूम होता है कि उसका घर अब तबाह हो चुका है और उसकी मां गजाला (तब्बू) उसके चाचा खुर्रम (के.के मेनन) के घर में रह रही है। वह अपनी मां से मिलने अपने चाचा के घर पहुंचता है तो वहां अपनी मां और चाचा को साथ में गाना गाते हुए देखकर अवाक रह जाता है। हैदर गुस्से में घर से निकल आता है। हैदर अपने पिता को ढूंढने के लिए फौजी शिविरों के चक्कर काटता है, लेकिन उसे उसके पिता का नामोंनिशान तक नहीं मिलता। इधर हिंदुस्तानी फौज अलगाववादियों से निपटने के लिए कश्मीर के ऐसे लोगों के हाथों में हथियार देना चाहती है, जो सरहद पार की गतिविधियों के खिलाफ हों। इसी बीच खुर्रम हैदर को बताता है कि वह भी उसके पिता को ढूंढ रहा है, लेकिन यह बिना सत्ता में आए हुए संभव नहीं हो सकता। खुर्रम चुनाव लड़ता है और जीत भी जाता है। इधर, हैदर फौजी शिविरों में अर्शिया के साथ अपने पिता को ढूंढता रहता है। इसी बीच अर्शिया की मुलाकात रुहधर (इरफान खान) से होती है, जो बताता है कि वह हैदर के लिए उसके पिता का मैसेज लेकर आया है। हैदर रुहधर से मिलने पहुंचता है और उसे पता चलता है कि रुहधर और उसके पिता एक ही कैंप में फौज की यातनाएं झेल रहे थे। रुहधार हैदर को बताता है कि उसके पिता की मौत हो गई और उनकी मौत का असल गुनहगार खुर्रम और उसकी मां गजाला है। हैदर यह सुनकर बौखला जाता है और प्रतिशोध की आग में जलने लगता है। हैदर पागल होने का नाटक करता है, लेकिन यह बात खुर्रम को पता लग जाती है। इसके बाद की कहानी हैदर के प्रतिशोध के साथ आगे बढ़ते हुए अपने अंत तक पहुंचती है।

एक्टिंग
हैदर निस्संदेह शाहिद कपूर की बेमिसाल अदाकारी के लिए पहचानी जाएगी, लेकिन तब्बू, इरफान खान, केके मेनन और श्रद्धा कपूर के बेजोड़ अभिनय के बिना शायद ही हैदर इस रूप में उभरकर पर्दे पर आती। इसके अलावा नरेंद्र झा, ललित परिमू, आमिर बशीर, सुमित कौल, रजत भगत और अन्य सहयोगी कलाकारों ने भी अपने किरदार को पर्दे पर जीवंत किया है। विशाल ने हैदर के एक-एक किरदार से शानदार काम लिया है।
डायरेक्शन
विशाल भारद्वाज का फलक बहुत बड़ा है, खासतौर पर शेक्सपियर के नाटकों को जब भी उन्होंने अडॉप्ट किया तब बेजोड़ कला का नमूना उन्होंने पेश किया। 'हैदर' के एक-एक पात्र को उन्होंने बेहद संजीदगी से हेमलेट के इर्द-गिर्द तो रखा, लेकिन परिस्थतियां ऐसी दिखाईं मानो हेमलेट न होकर हैदर ही मूल रचना रही हो। विशाल ने हैदर को कश्मीर में शूट किया है, लिहाजा लोकेशन्स दिलकश हैं। बर्फबारी के बीच फिल्माए गए शॉट बेजोड़ हैं, तो कश्मीरी किरदार वास्तविक होने के चलते फिल्म को और अधिक मजबूती देते हैं।
संगीत
हैदर का एक सॉन्ग बिस्मिल-बिस्मल प्लेलिस्ट में जगह बना चुका है। फिल्म का संगीत कर्णप्रिय है और गाने जबरन ठूंसे हुए नहीं लगते। विशाल भारद्वाज ने ही फिल्म को संगीत भी दिया है। बिस्मिल-बिस्मिल में उन्होंने स्थानीय फोक धुनों के साथ ही इन्स्ट्रमेंट्स भी कश्मीर के ही चुने, जो मजेदार हैं।
क्यों देखें
हैदर को न देखने की कोई खास वजह नहीं हो सकती। फिल्म हेमलेट का अडॉप्टेशन जरूर है, लेकिन विशाल ने हैदर में राजनीतिक पेचीदिगियों को सहजता से प्रस्तुत किया है। फिल्म कश्मीर में फौज और चरमपंथियों, दोनों के नजरिए की भी झलक देती है। बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से अलग है 'हैदर'। आपको 'ओमकारा' और 'मकबूल' पसंद हैं तो 'हैदर' भी आपके दिल को छू लेगी...
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