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Movie Review: 'लिंगा'

साउथ के सुपरस्टार रजनीकांत के जन्मदिन के मौके पर रिलीज की गई ये फिल्म एक्शन और थ्रिल से भरपूर है। साथ ही इसमें कॉमेडी का तड़का भी है।

Dainik Bhaskar

Dec 12, 2014, 11:35 AM IST
Movie Review Lingaa
'लिंगा' तमिल और तेलुगु में ही अभी रिलीज हुई है। लिहाजा हमें भी फिल्म तमिल में ही देखनी पड़ी, बावजूद भाषाई बंधन फिल्म की खूबसूरती और कहानी के बीच आड़े नहीं आते। 'लिंगा' रजनीकांत की बाकी फिल्मों की ही तरह परदे पर उनके लार्जर दैन लाइफ कैरेक्टर को ही पेश करती है। फिल्म में दो कहानियां पैरलल चलती हैं। पहली ब्रिटिश पीरियड की और दूसरी मौजूदा दौर की।
कहानी
'लिंगा' (रजनीकांत) अपने चार दोस्तों के साथ मिलकर चोरियां करता है। इसी दौरान उसकी मुलाकात एक टीवी रिपोर्टर लक्ष्मी (अनुष्का शेट्टी) से होती है, जो उसे बताती है कि वह राजा लिंगेश्वरन (रजनीकांत) का पोता है। वह उससे राजा के गांव चलने की बात कहती है, लेकिन लिंगा नहीं मानता। इसी दौरान एक सुनार लिंगा को एग्जीबिशन में लगा रानी का हार चुराने के एवज में मोटी रकम देने का वादा करता है। लिंगा समझौते को मान लेता है और एग्जीबिशन से अपने दोस्तों की मदद से हार चुरा लेता है। यह खबर लक्ष्मी पुलिस को दे देती है और पुलिस हार के साथ ही आरोपियों को ढूंढने में जुट जाती है। इधर, लिंगा पुलिस से बचने के चक्कर में लक्ष्मी के पास जाकर राजा के गांव जाने के लिए तैयार हो जाता है। लिंगा का गांव में राजा की ही तरह स्वागत किया जाता है। गांव में लिंगा को एक बुजुर्ग उस मंदिर के बारे में बताता है जिसे राजा लिंगेश्वरन ने बनाया था। बुजुर्ग कहता है कि मंदिर के किवाड़ राजा के जाने के बाद से बंद हैं और इसे पूर्णिमा के दिन राजा का वारिस ही खोलेगा। बुजुर्ग लिंगा को यह भी बताता है कि मंदिर में जो शिवलिंग है, वह एंटीक है। लिंगा और उसके दोस्त मंदिर से शिवलिंग चुराने का प्लान बनाकर रात को मंदिर के अंदर घुस जाते हैं। उन्हें अंदर जाते हुए दो गॉर्ड देख लेते हैं और इसकी सूचना पूरे गांव को दे देते हैं। पूरा गांव मंदिर के बाहर इकट्ठा होता है और दरवाजा खुलवाया जाता है। दरवाजा खुलते ही सब दंग हो जाते हैं। लिंगा और उसके दोस्त मंदिर की सफाई करने के बाद पूजा कर रहे होते हैं। लिंगा और उसके दोस्तों को चोर बताने वाले ग्रामीण शर्मिंदा होते हैं और कहानी फ्लैशबैक में चली जाती है।
कहानी फ्लैशबैक में...1930
लिंगेश्वरन ब्रिटिश गवर्नमेंट में एक कलेक्टर है। वह एक गांव के दौरे पर आता है। वहां उसे पता चलता है कि ग्रामीण पानी की समस्या से जूझ रहे हैं। खेत सिंचाई के अभाव में बंजर पड़े हुए हैं और लोगों को पीने का पानी जुटाने के लिए खासी मशक्कत उठानी पड़ रही है, जबकि बरसात में गांव के खेत बाढ़ की चपेट में आकर तबाह हो जाते हैं। लिंगेश्वरन इन दोनों समस्याओं के निदान के लिए डैम बनाने का प्रस्ताव ब्रिटिश सरकार के समक्ष रखता है। अधिकारी इस बात पर आपत्ति करते हैं कि इससे ब्रिटिश सरकार को भला इससे क्या लाभ। लिंगेश्वरन कई तर्क देता है, लेकिन बात नहीं बनती। वह नौकरी से इस्तीफा दे देता है और डैम खुद बनाने का बीड़ा उठाता है। लिंगेश्वरन एक प्रोफेशनल सिविल इंजीनियर भी होता है। वह अपने रेजीडेंस पर दावत देता है और वहां जब ब्रिटिश सरकार के अफसर पहुंचते हैं तो यह देखकर चौंक जाते हैं कि लिंगेश्वरन ही राजा लिंगेश्वरन है। लिंगेश्वरन गवर्नर से डैम बनाने की परमिशन ले लेता है। वह तमाम दिक्कतों को दूर करते हुए डैम बनाने में कामयाब हो जाता है, लेकिन लैंड ट्रांसफर के एक ऑर्डर उसके हाथ बांध देते हैं। वह ग्रामीणों के लिए अपने रॉयल पैलेस को बेच देता है, लेकिन ब्रिटिश अफसर की चालाकी से ग्रामीणों में फूट पड़ जाती है और वह लिंगेश्वरन पर ब्रिटिश हुकूमत से मिले होने का आरोप मढ़ते हैं। खैर, अंत में सबके सामने सच्चाई खुलकर सामने आती है, लेकिन तब तक लिंगेश्वरन गांव छोड़ चुका होता है। लिंगेश्वरन के साथ ही भारती (सोनाक्षी सिन्हा) भी गांव छोड़ देती है और दोनों शादी कर लेते हैं।
क्लाइमेक्स
लिंगा अपने दादा की यह कहानी सुनकर भावुक हो जाता है और गांव छोड़ने के लिए डैम पर आता है। यहां उसे गांव के लोग रोकते हैं और कहते हैं कि डैम पर एक बार फिर से खतरा है। वो लिंगा से मदद की गुहार लगाते हैं। एक सांसद पैसों के लालच में पुराने डैम को तुड़वाकर फिर से नया डैम बनाना चाहता है। इसके आगे की कहानी 20 मिनट की है। लिहाजा, अंत आप फिल्म देखकर ही जानें। हां, भाषा आड़े नहीं आएगी, इतना बता देते हैं।
एक्टिंग:
रजनीकांत को साउथ में भगवान की तरह पूजा जाता है। एक्टिंग में रजनी का अपना एक अलग स्टाइल है जो 64 की उम्र में भी दिखता है। फिर रजनी का एक्शन हो या पंच लाइन, उनका स्टाइल हर जगह फिल्म में मौजूद है। सोनोक्षी सिन्हा फिल्म में खूबसूरत लगी हैं। अनुष्का शेट्टी और के विश्वनाथ भी तमिल फिल्मों के सीनियर एक्टर्स हैं, लिहाजा दोनों ने अपना बेस्ट दिया है। ब्रह्मानंदम का फिल्म में छोटी-सा रोल है, लेकिन वह इसमें भी दर्शकों को गुदगुदाते हैं।
डायरेक्शन
64 के रजनी को 34 का दिखाना आसान काम नहीं था। क्राउड के सीन्स हर कोई डायरेक्टर खूबसूरती से नहीं फिल्मा सकता, लेकिन इस मामले में के एस रविकुमार की फिल्में मायूस नहीं करतीं। फिल्म में रजनी के एक्शन शॉट जबरदस्त हैं। फिल्म का हर एक फ्रेम खूबसूरती से फिल्माया गया है।
क्यों देखें:
रजनीकांत की फिल्में एंटरटेनिंग होती हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। फिल्म की कहानी दिलचस्प है और कई जगह भावुक करती है। फिल्म में एक्शन, कॉमेडी और इमोशन्स का डोज बराबर है। सबटाइटिल के साथ इसे आराम से देख सकते हैं।
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