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Movie Review: 'रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस' / Movie Review: 'रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस'

dainikbhaskar.com

Oct 31, 2014, 02:02 PM IST

घने जंगल और जंगली जानवरों को आधार बनाकर फिल्में बनाने का चलन हॉलीवुड में बेशक पुराना और सफल प्रयोग है, लेकिन बॉलीवुड अभी इसके लिए तैयार नहीं दिखता।

Movie Review: Roar: Tigers off the sunderbans
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घने जंगल और जंगली जानवरों को आधार बनाकर फिल्में बनाने का चलन हॉलीवुड में बेशक पुराना और सफल प्रयोग है, लेकिन बॉलीवुड अभी इसके लिए तैयार नहीं दिखता। बेशक 'रोर: टाइगर्स ऑफ द सुन्दरबंस' एक शानदार और नया प्रयोग है, लेकिन ऐसी फिल्में देखने के लिए अभी भारतीय ऑडियंस नहीं जाती हैं, यह भी सच है।

कहानी
'रोर' की कहानी एक फोटो जर्नलिस्ट की मौत से शुरू होकर बाघ, जंगल और जिंदगी के संघर्ष से निकलकर बदले तक पहुंचती है। फोटो जर्नलिस्ट उदय (पुलकित) एडवेंचर का बेहद शौकीन होता है। वह सुंदरबन के घने जंगलों में अपने एक फोटोग्राफी प्रोजेक्ट को निपटाने मे मशगूल होता है कि एक दिन शिकारी के जाल में सफेद बाघ के बच्चे को देखता है। उदय इस शिकारी के जाल में फंसे सफेद बाघ के बच्चे को बचाने में कामयाब रहता है। वह शावक को लेकर घर आ जाता है। अपने बच्चे की तलाश में बाघिन, शावक की गंध को सूंघते हुए उदय के घर आ जाती है, जहां अपने बच्चे को न पाकर वह उदय को मार कर उसकी लाश लेकर गायब हो जाती है। उदय के मारे जाने की खबर जब उसके भाई पंडित (अभिनव शुक्ला) को मिलती है तो वह अपने कुछ दोस्तों के साथ उसी बाघ को मारने के लिए सुदंरबन आता है। यहां आकर वह अपनी टीम के साथ इस बाघ की सर्च में लग जाता है यहां उसके साथ जंगल में टाइगर ट्रैक करने में एक्स्पर्ट झूम्पा (हिमार्षा वी) भी है जो उसकी टीम को टाइगर तक पहंचने का रास्ता दिखाती है। दरअसल, झूम्पा को नहीं मालूम कि पंडित और उसकी टीम सुंदबन में टाइगर को मारने के मकसद से आई हुई है। बाघिन अपने बच्चे की तलाश में भटकते हुए पंडित की टीम के सदस्यों पर हमला शुरू कर देती है। इसके आगे की कहानी बाघिन से संघर्ष और पंडित की टीम के जंगल से निकलने की कहानी कहती है।
एक्टिंग
फिल्म में कोई भी चर्चित चेहरा नहीं है, बावजूद इसके एक्टिंग के मामले में हर किरदार ठीक-ठाक ही लगा है। अली कुली और अभिनव शुक्ला अपने किरदारों में जमे है। अंचित कौर ने अपने किरदार को बखूबी निभाया है। हिमार्षा वी, सुब्रत दत्ता और पुलकित का काम भी अच्छा है।
डायरेक्शन
निर्देशक कमल सदाना ने फिल्म को रोचक बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी, लेकिन फिल्म के कई दृश्य वीएफएक्स के लिहाज से कमजोर हैं। फिल्म की शुरुआत बेहद धीमी है, लेकिन बीस मिनट के बाद फिल्म की रफ्तार दर्शकों को बांधने मे कामयाब हो जाती है। ओवरऑल कमल ने शानदार काम किया है और उनकी सराहना की जानी चाहिए।
क्यों देखें
वाइल्ड लाइफ के शौकीन और इस सब्जेक्ट पर फिल्म देखने की हसरत रखने वालों को फिल्म मायूस नही करेगी। फिल्म बॉलीवुड की मसाला फिल्मों से बिल्कुल अलग है।

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