--Advertisement--

Movie Review: 'अनफॉरगेटेबल'

'अनफॉरगेटेबल' को लेकर न तो कोई उत्साह दर्शकों में पहले नजर आ रहा था, और ना ही शायद आगे नजर आए।

Dainik Bhaskar

Jun 13, 2014, 08:54 PM IST
Movie Review: UNFORGETTABLE
तकरीबन हर हफ्ते बॉलीवुड में एक प्रेम कथा पर आधारित फिल्म बनती है। इन फिल्मों में कुछ अपने बड़े स्टार्स की बदौलत अच्छा बिजनेस कर जाती हैं, तो कुछ का दर्शकों को बेसब्री से इंतजार होता है। बदकिस्मती से 'अनफॉरगेटेबल' फिल्म में अविस्मरणीय जैसी कोई बात नहीं है। इस फिल्म के जरिए टीवी के सितारे इकबाल खान ने अपना बॉलीवुड डेब्यू किया है, लेकिन उन्होंने इंडस्ट्री की समझ होने के बावजूद ऐसी पटकथा के लिए कैसे हामी भरी यह वही बेहतर बता सकते हैं।
फिल्म इतनी स्लो और बोरिंग है कि यह ऑडिएंश पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाती है। लव स्टोरी बेस्ड मूवी में यह जरूरी है कि दर्शक किसी किरदार के प्रति सहानुभूति रखते हों, लेकिन इस फिल्म में दर्शकों की सहानुभूति ना तो फिल्म के नायक आनंद के प्रति जागती है ना नायिका तारा और निशा के प्रति। फिल्म के डायरेक्टर अरशद युसुफ खान का काम अच्छा है, लेकिन सवाल अंतत: पटकथा का ही सामने आता है। फिल्म की कहानी पर और काम किए जाने की बहुत ज्यादा गुंजाइश रह गई थी, लेकिन इसे जल्दबाजी कहें या फिर कुछ भी दिखाने का जुनून, दर्शकों के साथ छलावा है। युसुफ पठान ने एक ऐसी पटकथा लिखी है, जिसमें एक बेटा अपनी मां की खुशियों के लिए अपने प्यार को कुर्बान कर देता है। एक ऐसे आदमी की कहानी जिसके सिर मे चोट लगती है और उसकी आंखों की रोशनी लौट आती है...आज का दर्शक यह सब शायद ही देखना चाहता हो। यह 80 के दशक के सिनेमा के लिए हिट कहानी हो सकती थी आज के लिए तो कतई नहीं। यहां तक कि पठान के स्क्रीनप्ले में सस्पेंस भी है, लेकिन जब वह खुलता है तो दर्शक भौचक्के नजर नहीं आते।
कहानी: त्रिकोणीय प्रेम कथा में कुर्बानी, 80 के दशक की कहानी
आनंद (इकबाल खान) एक अमीर शख्स है, जो निशा (हेजल क्रोनी) से प्यार करता है, लेकिन आनंद की मां उसके इस रिश्ते के खिलाफ है। इतना ही नहीं उसकी मां उसका रिश्ता भारत में रोशनी से तय कर देती है। वह अपने बेटे से शादी करने के लिए जल्द उन्हेंं ज्वाइन करने का वादा लेकर भारत के लिए रवाना हो जाती है। भारी मन से आनंद शादी के लिए राजी हो जाता है, क्योंकि वह अपनी मां से बेइंतहा प्यार करता है। उसकी मां एक हार्ट पेशेंट है जिसके लिए थोड़ा सा भी सदमा जान लेवा हो सकता है। आनंद अपनी शादी के दिन भारत आने के लिए मान जाता है, लेकिन वह भारत नहीं आता।
इस बात का उसकी मां को गहरा सदमा लगता है और उसकी मौत हो जाती है। आनंद इस सबके लिए खुद को जिम्मेदार मानता है। इस दुख को आनंद बर्दाश्त नहीं कर पाता। अपनी भावनाओं पर उसका काबू नहीं रहता, जिसके चलते वह एयरपोर्ट के बाहर अपनी कार का एक्सीडेंट करवा बैठता है। इस हादसे में उसकी आंखों की रोशनी चली जाती है। डॉक्टर उसके अभिभावक मुंशी (शाहबाज खान) को बताते हैं कि आनंद की आंखों की रोशनी जाने के पीछे फिजिकल कम और मनोवैज्ञानिक कारण ज्यादा हैं। आनंद अपने प्यार को निशा के लिए बलिदान करने का मन बना लेता है।
इसी बीच उसकी जिंदगी में तारा (अल्का वर्मा) आती है। वह चाहती है कि वह आनंद का तब तक ख्याल रखे जब तक उसकी आंखों की रोशनी न लौट आए। आनंद शुरुआत में नहीं चाहता की तारा उसकी केयरटेकर रहे, लेकिन बाद में वह मान जाता है। एक दिन एक हादसे में आनंद की आंखों की रोशनी तो लौट आती है, लेकिन तारा उसे छोड़कर चली जाती है। उसे महसूस होता है कि वह तारा से प्यार करने लगा है और उसे ढूंढने लगता है। क्या आनंद तारा को ढूंढ पाता है...? तारा कौन है...? क्या वह अपने प्यार का इजहार तारा से कर पाता है...? क्या तारा भी आनंद से प्यार करती है...? क्या आनंद और तारा की शादी होती है, या फिर आनंद निशा से शादी कर लेता है...? यही फिल्म की बाकी की कहानी है।
एक्टिंग: इकबाल खान ने अच्छी एक्टिंग की है। वह टीवी के एक मंजे हुए अभिनेता हैं, इसलिए कैमरा फेस करने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। उनके एक्सप्रेशंस नजर आते हैं। अल्का वर्मा ने अपनी डेब्यू फिल्म होने के बावजूद अच्छा काम किया है। हेजल भी अपने किरदार में ठीक नजर आईं हैं। शाहबाज खान का किरदार ढंग से नहीं लिखा गया, जितना अभिनय उन्हेंं करना था वह पर्दे पर दिखता है।
डायरेक्शन: अरशद युसुफ खान का डायरेक्शन अच्छा है, हालांकि सिनेमा के मौजूदा समय के लिहाज से कमजोर पटकथा उनके हाथ बांध देती है। फिल्म स्लो है। जरूरत से ज्यादा युसुफ ने कुछ सीन्स को खींच लिया। बतौर डायरेक्टर उन्होंने साफ सुथरा काम किया है, लेकिन स्क्रीनप्ले वह उतना मजेदार नहीं लिख सके।
क्यों देखें: 80 के दशक के सिनेमा से बेइंतहा प्यार हो, बेटे को मां के लिए कुर्बानी देना देखना चाहते हों और धीरे-धीरे पर्दे पर सरकती त्रिकोणीय प्रेम कथा को देखना चाहते हों तो आप देख सकते हैं। फिल्म मौजूदा समय में बन रहे सिनेमा से कोसों दूर नजर आती है। आज हिंदी फिल्मों के दर्शक जहां 'सिटी लाइट्स', 'वेडनेसडे' या फिर 'जब तक है जान' जैसी फिल्में देखने की आदत डाल चुके हों, तब इस तरह की फिल्में खटकती हैं।
X
Movie Review: UNFORGETTABLE
Bhaskar Whatsapp

Recommended

Click to listen..