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Review: 'राजा नटवरलाल'

Dainik Bhaskar

Aug 29, 2014, 05:21 PM IST

इस हफ्ते सिनेमाघरों में बॉलीवुड के सीरियल किसर के नाम से मशहूर इमरान हाशमी अपनी फिल्म राजा नटवरलाल के जरिए पहुंचे हैं। इमरान की पिछली दोनों फिल्में 'घनचक्कर' और 'एक थी डायन' बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास कमाल नहीं दिखा सकी थी।

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फिल्म निर्देशक कुणाल देशमुख ने फिल्म बनाने के कहानी तो बेहद रोमांचक चुनी, लेकिन जब पटकथा ही बेकार हो तो भला कैमरा कहां तक पब्लिक को बांधे रखे। फिल्म 'राजा नटवरलाल' की कहानी भारत के मशूहर ठग नटवरलाल से प्रेरित जरूर है, लेकिन इसमें उतना दम नहीं, जितना नटवरलाल असल जिंदगी में दिखा चुका है। नटवरलाल वही शख्स था जिसने ताज महल, लाल किला, राष्ट्रपति भवन और संसद भवन तक को बेच दिया था। शायद इन्हीं बातों से प्रेरित होकर निर्देशक कुणाल देशमुख ने 'राजा नटवरलाल' में अविश्वसनीय बातों का ताना-बाना बुना है, लेकिन अफसोस कि उनकी कहानी पर यकीन नहीं हो पाता। इससे मजेदार कहानी अभिषेक बच्चन और रानी मुखर्जी स्टारर फिल्म 'बंटी और बबली' की ठगी की थी।
कहानी
फिल्म एक ठग राजा (इमरान हाशमी) के इर्द-गिर्द घूमती है। राजा का सपना है कि वह ढेर सारा रुपया कमाए और इसके लिए वह अपने दोस्त राघव (दीपक तिजोरी) के साथ मिलकर ठगी करता है। राजा ताश के तीन पत्तों में रानी खोजने वाले खेल से ठगी करता है। जिया (हुमैमा मलिक) राजा की गर्लफ्रेंड है जो बार में डांस करती है। राजा एक ही बार में बड़ा दांव खेलना चाहता है, जिससे बाकी जिंदगी सुकून से कटे। इस बीच उसे 80 लाख रुपए की चोरी करने का मौका मिलता है।
इधर राघव इस काम को जोखिमभरा बताकर राजा को इसमें न पड़ने की सलाह देता है, लेकिन राजा को कैसे भी पैसे बनाने हैं। आखिर राघव भी राजा का साथ देने को राजी हो जाता है और दोनों मिलकर एक खतरनाक अपराधी वरधा यादव (केके मेनन) के 80 लाख रुपए चुरा लेते हैं। वरधा को ये बात पता चल जाती है कि ये पैसा किसने चुराया है। वह राघव की हत्या करवा देता है, जबकि राजा को वह नहीं पहचानता। अब राजा का एक ही मकसद है, राघव की मौत का बदला लेना। वह 15 सौ करोड़ के मालिक वरधा को सड़क पर लाना चाहता है और इसके लिए वह ठगी के गुरु योगी (परेश रावल) के पास मदद मांगने पहुंचता है।
योगी रिश्ते में राघव का सगा भाई है। वह राजा की मदद के लिए तैयार हो जाता है। वरधा क्रिकेट का दीवाना है। उसकी इसी कमजोरी का योगी और राजा फायदा उठाते हैं। उसे आईपीएल की तर्ज पर आधारित एक लीग में वे एक ऐसी टीम बेचने का प्लान बनाते हैं जो है ही नहीं। इसके बाद की कहानी आप जानते ही हैं, जैसा कि हिंदी फिल्मों का चलन है। येन-केन प्रकारेण हीरो को ही जीतना है और यही होता है। बचा-खुचा रोमांच हम खत्म नहीं करना चाहते। आप इसे सिनेमाहॉल में ही देखें तो बेहतर होगा।
एक्टिंग
एक्टिंग का तो सीधा-सा फंडा है, जैसी पटकथा और जैसा निर्देशन वैसी अदाकारी! यहां भी कुछ ऐसा ही है। इमरान हाशमी अपनी नायिका को चूमने से इतर जितनी एक्टिंग कर सकते हैं, उन्होंने की है। हुमैमा मलिक भी इमरान से कंधा मिलाने की कोशिश पूरी फिल्म में करती रही, लेकिन कंधे मिल नहीं पाए। हां, परेश रावल जरूर फिल्म के मजेदार किरदार हैं। वह जब भी आए, उन्होंने फिल्म को ट्रैक पर लाने की कोशिश की, लेकिन पटकथा का बिखराव उनके काम पर पानी फेर देता है। केके मेनन और दीपक तिजोरी ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया है।

डायरेक्शन
कुणाल देशमुख का डायरेक्शन बेहद ढीला है। कमजोर पटकथा का असर कुणाल के निर्देशन में भी देखने को मिलता है। केके मेनन और परेश रावल जैसे मंजे हुए कलाकारों के बावजूद कुणाल का निर्देशन भटकता हुआ ही ज्यादा नजर आता है। फिल्म में बेवजह के गाने भी ठूंसे गए हैं।
संगीत
आमतौर पर माना जाता है कि इमरान हाशमी की फिल्मों का संगीत और गानें अच्छे होते हैं, लेकिन 'राजा नटवरलाल' में यह तत्व भी गायब है। फिल्म में ऐसा कोई भी गाना नहीं है जो हॉल से बाहर आने के बाद जुबान पर चढ़ा रहे।
क्यों देखें
फिल्म यह सोचकर देखने का मन बना रहे हैं कि पिछली सीट पर बैठकर इमरान के किसिंग सीन्स को इत्मीनान से देख सकेंगे तो देख आइए, घर पर तो ऐसे सीन आते ही रिमोट ही ढूंढना पड़ता है। बाकी परेश रावल भी हैं ही फिल्म में, लेकिन बावजूद इसके अच्छी फिल्में, जिनमें कहानी हो, संगीत हो और कुछ ना तो मार-धाड़ ही हो, देखने के आदी हैं तो सिनेमाहॉल ना जाएं।

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