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Movie Review: उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती शाहिद-कंगना की 'रंगून'

40 के दशक में ब्रिटिश राज के अन्तर्गत आने वाली भारत की आर्मी का क्या था हाल? इसको विशाल भारद्वाज ने अपने अंदाज में दर्शाने की कोशिश की है।

Dainik Bhaskar

Feb 24, 2017, 09:51 AM IST
'रंगून' में कंगना रनोट और शाहिद 'रंगून' में कंगना रनोट और शाहिद

क्रिटिक रेटिंग 2.5/5
स्टार कास्ट कंगना रनोट, शाहिद कपूर, सैफ अली खान, रिचर्ड मैकेबे
डायरेक्टर विशाल भारद्वाज
प्रोड्यूसर साजिद नाडियाडवाला, विशाल भारद्वाज
संगीत विशाल भारद्वाज
जॉनर वॉर ड्रामा

विशाल भारद्वाज ने पहले शेक्सपीयर के लेखन से प्रेरित होकर कई फिल्में बनाई है और इस बार 40 के दशक के भारत में होने वाली गतिविधियों पर आधारित 'रंगून' फिल्म बनाई। कैसी बनी है यह फिल्म, आइए जानते हैं...

कहानी
फिल्म की कहानी 1943 पर बेस्ड है, जहां ब्रिटिशर्स का भारत पर शासन था और उसी दौरान मिस जूलिया (कंगना रनोट) बहुत ही फेमस अभिनेत्री हुआ करती थी। जो कि अपनी जरूरतों के हिसाब से प्रोड्यूसर रुसी बिलिमोरिया (सैफ अली खान) के इशारों पर चलती थी। ब्रिटिश सेना का मेजर जनरल हार्डिंग (रिचार्ज मैकेबे), रुसी से बात करके जूलिया को भारत-बर्मा की सीमा पर तैनात सैनिकों के मनोरंजन के लिए ले जाता है और ट्रेन में जूलिया की सुरक्षा की जिम्मेदारी जमादार नवाब मलिक (शाहिद कपूर) के हाथों में होती है, जिसे शुरुआत में जूलिया नापसंद करती हैं। लेकिन धीरे-धीरे ऐसी परिस्थितियां आती हैं कि दोनों के बीच में रोमांस पनपने लगता है। तभी रुसी को नवाब और जूलिया के बीच बढ़ती नजदीकियों की भनक लगने लगती है। कहानी में कई सारे ट्विस्ट टर्न्स आते हैं और आखिरकार एक अजीब से क्लाइमेक्स के साथ फिल्म का अंत होता है।


डायरेक्शन
फिल्म का डायरेक्शन हमेशा की तरह काफी अच्छा है और विशाल भारद्वाज की रियल लोकेशन की शूटिंग भी काफी दर्शनीय है। युद्ध, प्रेम प्रसंग और लोकेशन्स सहित फिल्म में कई बेहतरीन चीजें देखने को मिलेगी। फिल्म में 40 के दशक के हिसाब से बारीकियों का ध्यान बखूबी रखा गया है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी कमाल की है। हालांकि, फिल्म काफी आराम-आराम से चलती है, जो 20-20 के जमाने में टेस्ट क्रिकेट की याद दिलाती है। रफ्तार को बेहतर किया जा सकता था। साथ ही कहानी को भी बहुत ही खींचा गया है, जिसकी वजह से क्लाइमेक्स काफी कमजोर दिखाई पड़ता है। एक तरफ आजादी के लिए आजाद हिन्द फौज के गठन का जिक्र होता है, लेकिन उसके एवज में फिल्मांकन के दौरान वो ही इमोशन भीतर से जाग नहीं पाते और कनेक्ट कर पाना मुश्किल होता है। ना ही जंग मुकम्मल दिखाई गई है और ना ही रोमांस, दोनों के बीच में खिचड़ी-सी पकती जान पड़ती है।

एक्टिंग
कंगना रनोट और उनकी परफॉर्मेंस को देखना एक बार फिर से बहुत ही उम्दा है और पूरे फिल्म के दौरान उनकी मौजूदगी एक ट्रीट जैसे लगती है। वहीं, सैफ अली खान ने भी बढ़िया काम किया है। शाहिद कपूर और उनकी अदायगी ने एक बार फिर से साबित कर दिया है कि फिल्म दर फिल्म उनका काम और भी सहज हो रहा है। मेजर जनरल का किरदार निभाने वाले एक्टर रिचर्ड मैकेबे ने फिल्म में चार चांद लगाए हैं। फिल्म की कास्टिंग काफी सटीक है और इसकी वजह से हरेक किरदार बहुत ही रियल लगता है।


म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक ठीक ठाक है, जो कि और भी बेहतर हो सकता था। हर किसी को यह म्यूजिक पसंद नहीं आएगी।


देखें या नहीं?
अगर आप सैफ अली खान, शाहिद कपूर, कंगना रनोट के दीवाने हैं तो एक बार इसे देख सकते हैं। हालांकि, आपको 'हैदर' और 'ओमकारा' वाली फीलिंग 'रंगून' में मिलनी मुश्किल है।

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'रंगून' में कंगना रनोट और शाहिद 'रंगून' में कंगना रनोट और शाहिद
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