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'अगर वहां मंदिर था तो मंदिर बनना चाहिए',राम मंदिर विवाद पर टीवी के 'राम' का exclusive इंटरव्यू

Dainik Bhaskar

Apr 27, 2018, 04:02 PM IST

मेरी नजर में भगवान राम वैसे ही हैं जैसे सबकी नजरों में हैं। मैं उन्हें आदर्श मानता हूं।

अगर वहां मंदिर था तो मंदिर बनना चाहिए,राम मंदिर विवाद पर टीवी के 'राम' का इंटरव्यू

1987 में प्रसारित हुए टीवी के फेमस शो रामायण को अब 31 साल हो चुके हैं। शो में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल अब 60 साल के हो चुके हैं. इस शो ने उन्हें घर-घर में पॉपुलर कर दिया था और लोग उन्हें असल में भगवान राम समझने लगे थे।अरुण गोविल अब क्या कर रहे हैं? राम पर राजनीति के बारे में वह क्या सोचते हैं। ऐसे ही अन्य मुद्दों पर उन्होंने dainikbhaskar.com से खास बातचीत की।


'राम' की नजर में 'राम' कैसे हैं?
मेरी नजर में भगवान राम वैसे ही हैं जैसे सबकी नजरों में हैं। मैं उन्हें आदर्श मानता हूं। वह कई मायनों में आदर्श थे भी और यह बात पर्सनली भी मुझे सही लगती है।


राम तो जोड़ते हैं,मिलाते हैं,वो प्रेम के पर्याय हैं फिर राम के नाम पर हो रहे हंगामे पर आप क्या सोचते हैं?
राम के नाम पर हंगामा गलत है,मैं मानता हूं कि धर्म पर राजनीति होनी ही नहीं चाहिए। धर्म के नाम पर अपना फायदा देखना सरासर गलत है।


राम मंदिर विवाद पर क्या कहना है?
ये मंदिर लोगों की आस्था का केंद्र है। अगर वहां ये साक्ष्य मिले थे कि वहां राम मंदिर था तो बेशक राम मंदिर बनाया जाना चाहिए।


जब आपको रोल मिला तो आपने क्या सोचा था?
मुझे रोल मिला नहीं बल्कि मैंने खुद इसे करने की इच्छा जताई थी। रोल के लिए ऑडिशन किए जा रहे थे मैं इसके मेकर्स के साथ पहले से ही काम कर रहा था। मैं उस वक्त रामानंद सागर के विक्रम और बेताल में राजा विक्रमादित्य का रोल प्ले कर रहा था। ऐसे में जब मुझे ये पता चला कि 'रामायण' में राम का रोल प्ले करने के लिए ऑडिशन लिए जा रहे हैं तो मैंने रामानंद सागर से यह इच्छा जताई कि मैं ये रोल करना चाहता हूं। तब उन्होंने मुझे कहा कि वह अपने टीम मेंबर्स से
इस बारे में चर्चा करेंगे और फिर उसके बाद बताएंगे। एक दिन उन्होंने मुझे बताया कि मुझे ये रोल दे दिया गया है।


क्या आपको नहीं लगता कि इस शो के बाद आपको जिस लेवल पर काम मिलना था वह नहीं मिल पाया?
हां,मैं इस बात से सहमत हूं। रोल साइन करने से पहले मुझे कई लोगों ने सलाह भी दी थी कि मैं भगवान राम की इमेज में कहीं बंध कर न रह जाऊं लेकिन मैंने तब भी ये रोल किया। मुझे इस बात का बेहद दुःख भी हुआ था। लेकिन फिर मैंने इस बात को स्वीकार कर लिया कि मैं इस छवि से बाहर नहीं निकल पाऊंगा और इससे निकलने के चक्कर में मैं वह भी खो दूंगा जो मुझे मिल सकता है। इसके बाद मैंने 'लव कुश' (1989), 'कैसे कहूं' (2001), 'बुद्धा' (1996), 'अपराजिता', 'वो हुए न हमारे' और 'प्यार की कश्ती में' जैसे कई पॉपुलर टीवी सीरियल्स में काम किया है लेकिन बात नहीं बनी।


शो के किन साथियों से अब भी संपर्क में हैं?
'लक्ष्मण' बने सुनील लोहिड़ी और 'रावण' बने अरविंद त्रिवेदी से मुलाकात होती है,सीता (दीपिका चिखलिया)से भी कभी कभी मिल पाता हूं।


इन दिनों क्या कर रहे हैं?
फिल्मों और टीवी सीरियल के ऑफर तो बहुत मिले लेकिन उनमें दम नहीं लगा इसलिए अपनी खुद की प्रोडक्शन कंपनी चलाता हूं।

इन दिनों टीवी पर कई पौराणिक शो चल रहे हैं, 1987 के दौर और अभी के दौर को कैसे देखते हैं?

अभी के सीरियल बहुत तकनीकी हो गए हैं.हमारे वक्त में ऐसा नहीं होता था। हमारा शो वीकली आता था इसलिए महीने में चार या पांच एपिसोड ही शूट किए जाते थे.एक एपिसोड की शूटिंग तकरीबन चार दिन तक चलती थी और हम लोग दिन-रात काम करते रहते थे।

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