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पहली फिल्म बनाने में बीवी के गहने बेच दिए, एक्ट्रेस ढूंढने के कोठे तक पहुंचे गए दादा साहब फाल्के

जब भी हिंदी सिनेमा की शुरुआत का जिक्र होता है तो दादा साहब फाल्के का नाम जरूर आता है।

Danik Bhaskar | Apr 30, 2018, 12:55 PM IST

स्पेशल डेस्क. जब भी हिंदी सिनेमा की शुरुआत का जिक्र होता है तो दादा साहब फाल्के का नाम जरूर आता है। आज जब भारत की बॉलीवुड इंडस्ट्री करोड़ों डॉलर की हो चुकी है। जब हम हर दिन फिल्मों के 100 करोड़ और 200 करोड़ रुपए कमाने की बात करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि इन सब के पीछे फाल्के ही थे। एक ऐसा शख्स, जिसने भारत में हिंदी सिनेमा का पौधा लगाया। जिसकी वजह से ये इंडस्ट्री दुनियाभर में जानी जाती है। आज दादा साहब फाल्के का 148वां जन्मदिन है। गूगल ने उनकी सम्मान में डूडल बनाकर श्रद्धाजंलि दी है। दोस्त से पैसे उधार लेकर सीखा फिल्म प्रोडक्शन...

- 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र में जन्में दादा साहेब का असली नाम धंुधिराम गोविंद फाल्के था। उन्होंने अपने 19 साल के करिअर में 95 फिल्में बनाईं। इसमें से 26 शॉर्ट फिल्म्स थीं। इसमें से मेाहिनी भस्मासुर, सत्यवान सावित्री, श्रीकृष्ण जन्म और लंका दहन सबसे ज्यादा मशहूर फिल्म हैं।
- लेकिन फाल्के को फिल्में बनाने का चस्का कहां से लगा, इसकी भी बड़ी दिलचस्प कहानी है। 1910 में उन्होंने मुंबई के थिएटर में क्रिसमस के दौरान जीसस क्राइस्ट पर एक फिल्म 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' देखी। इसे देखने के बाद उन्हें फिल्म बनाने की ठान ली।
- फिल्म कैसे बनाते हैं, ये सोचकर उन्होंने अपने एक दोस्त से दो रुपए उधार लिए और लंदन पहुंच गए। दो हफ्ते तक वहां फिल्म प्रोडक्शन से जुड़ी बारिकियां सीखीं। उसके बाद बाकी सब तो इतिहास है।


पत्नी के गहने बेच दिए
- 100 साल पहले गुलाम भारत में एक गरीब आदमी के फिल्म बनाना दुनिया का सबसे कठिन काम माना जा सकता है।
- जब फाल्के भारतीय सिनेमा की सबसे पहली फिल्म राजा हरिश्चंद्र बना रहे थे, तब इससे बनाने में 15 हजार रुपए खर्च हो गए।
- 100 साल पहले 15 हजार रुपए बहुत रकम थी। ये पैसे फाल्के ने अपनी दूसरी पत्नी सरस्वती बाई के गहने बेचकर लिए थे। तब दोस्तों ने उनको पागल तक कह दिया था।

कोठे पर एक्ट्रेस ढूंढने की कोशिश की
- फिल्म की शूटिंग के दौरान कई कहानियां हैं। लोग इस काम समझते नहीं थे या फिर गंदा मानते थे।
- इसके लिए फाल्के ने फिल्म यूनिट से जुड़े कलाकारों और सहायकों को कहा है कि बाहरी दुनिया में वह फिल्म का नाम लें। वह लोगों को बताए कि वह एक हरिश्चंद्र की फैक्ट्री में काम करने जाते हैं।
- इतना ही नहीं, उन्हें फिल्म के लिए एक एक्ट्रेस की जरूरत थी। इसके लिए कोई भी महिला तैयार नहीं हुई। फिर उन्होंने एक कोठे पर जाकर भी एक्ट्रेस ढूंढने की कोशिश की। लेकिन वहां से भी निराशा हाथ लगी।
- फिर आखिर में उन्होंने एक भोजनालय में काम करने वाले रसोइए को ही महिला का किरदार निभाने के लिए मना लिया। और इस तरह तीन मई 1913 को कोरोनेशन थियेटर फिल्म रिलीज की गई।
- फिल्म देखने के लिए टिकट का प्राइज रखा गया तीन आना। ये फिल्म रिलीज होते ही हिट हो गई। कारण था इसका छोटा होना। अमूमन उस दौर में नाटक करीब 6-6 घंटे चलते थे। लेकिन इस 40 मिनट की फिल्म भारतीय लोगों को एक दूसरी दुनिया में ले गई।