ऋतिक रोशन अपनी इस कमजोरी को दूर करने के लिए आज भी करते हैं प्रैक्टिस, खुद किया खुलासा

मजाक उड़ने के डर से स्कूल जाने से भी कतराते थे ऋतिक

DainikBhaskar.com

Mar 16, 2019, 09:58 PM IST
Hrithik Roshan Practices Every day to Solve stammering problem

मुंबई: ऋतिक रोशन जो पंचलाइन आज ऑनस्क्रीन डिलीवर करते हैं। उसके पीछे उनकी कड़ी मेहनत है। स्पीच थैरेपी आज भी उनकी दिनचर्या का हिस्सा है और वे हकलाने की कमी को दूर करने के लिए शुरू से ही प्रयास कर रहे हैं। दरअसल, ऋतिक बचपन से ही हकलाने की बीमारी से जूझ रहे हैं। जिसके डर से वे कभी स्कूल जाने में भी कतराते थे। क्योंकि इस बीमारी को लेकर उनका मजाक उड़ाया जाता था। TISA (The Stammering Association) से बातचीत के दौरान ऋतिक ने हकलाने के कारण किए स्ट्रगल को किया शेयर...


- रिपोर्ट्स के अनुसार, TISA ने ऋतिक को अपना ब्रांड एम्बेसडर बनाने के लिए अप्रोच किया था। जिसके सिलसिले में 'टिसा' की 9 सदस्यों की टीम उनसे बात करने के लिए उनके घर गई थी। करीब 20 मिनट की इस मीटिंग में ऋतिक ने उन्हें बताया कि कैसे वे शीशे के सामने खड़े होकर बोलने की लगातार घंटो प्रैक्टिस करते थे और अपनी आवाज को रिकॉर्ड करते थे साथ ही वे गाना भी सीखते थे।
- ऋतिक ने आगे बताया कि स्पीच थैरेपी रोज उनकी हैबिट में रहती थी और आज भी वे करीब एक घंटे तक बोलने की एक्सरसाइज करते हैं। इसके बाद उन्होंने अपनी इस बीमारी पर काबू पाया। ऋतिक रोशन ने हकलाने की समस्या के बारे बताते हुए आगे कहा कि हकलाने की परेशानी बचपन में ही नहीं थी, बल्कि 2012 तक बरकरार रही। इसके बाद वे फिल्म स्टार बन गए।
- ऋतिक ने अपने स्ट्रगल के बारे में बात करते हुए एक इंसिडेंट रिकॉल कराया। उन्होंने बताया कि एक बार उन्हें दुबई में एक अवॉर्ड के लिए जाना था। उन्होंने बताया कि शुरुआत में उन्हें दुबई बोलने में बहुत दिक्कत होती थी। लेकिन वे इसे बोलने की कोशिश करते रहे और एक वक्त आया कि बिना किसी दिक्कत के इसे बोलने में समर्थ हो गए।

खुद को धीरे बोलने वाले व्यक्ति के रूप में किया स्वीकार

ऋतिक रोशन ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि उन्होंने खुद को धीरे बोलने वाले व्यक्ति के रूप में स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही वे कहते हैं कि किसी भी शब्द को तेज बोलने के लिए उन्हें एक सेकेंड तक उसे अपने दिमाग में सोचना पड़ता हैं। हकलेपन को स्वीकार करना ऋतिक के लिए लम्बे समय से किसी स्ट्रगल से कम नहीं था लेकिन अब वे इससे निश्चिंत हैं। NLP (Neuro-Linguistic Programming) से 2012 में जुड़ने के बाद से उन्होंने अपने आप को काफी फ्री महसूस किया। लेकिन आज भी उन्हें बोलने के लिए स्पीच थैरेपी की जरूरत होती है।

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