कभी मस्जिद पर भीख मांग कर गुजारा करते थे कादर खान, 82वें जन्मिदन पर साथियों ने किया याद

2 वर्ष पहले
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बॉलीवुड डेस्क. चाहे कॉमेडी हो या विलेन का किरदार, बॉलीवुड की कई हिट फिल्मों में अपनी दमदार अदाकारी का जलवा बिखेरने वाले कादर खान का आज 82वां जन्मदिन है। उन्होंने 1973 में आई \"दाग\" से एक्टिंग कॅरियर की शुरुआत की थी। 300 से अधिक फिल्मों में काम करने वाले कादर खान ने 250 से ज्यादा फिल्मों में डायलॉग्स भी लिखे। साल 2019 में पद्मश्री पाने वाले कादर 9 बार फिल्मफेयर में नॉमिनेट हो चुके हैं। दिसंबर 2018 में दुनिया को अलविदा कह गए कादर को याद कर रहे हैं इंडस्ट्री के तीन साथी।

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मैं कादर खान साहब से पहली बार गोवा में मिला था। मुझे जहां तक याद आ रहा है, वहां ‘सोने की लंका’ की आउटडोर शूटिंग कर रहे थे। मैं उनका बहुत बड़ा फैन था और अब भी हूं। मैंने उनके साथ कई फिल्में की। सीन कुछ और होता था, पर वे बना कुछ और देते थे। उनका सीन में इंप्रोवाइजेशन कमाल का था। कभी-कभी तो डबिंग करते वक्त इतनी कुछ चीजें डाल देते थे, जिससे चार चांद लग जाता था। उनके साथ काम करके उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। आई फील, अगर मैं थोड़ा-बहुत अच्छी एक्टिंग करता हूं, सब उनकी वजह से। काफी कुछ उनसे सीखा।  

कादर खान साहब मेरी बहुत फिल्मों में काम किया। वे बहुत कमाल के एक्टर थे। रियल राइटर, एक्सलेंट एक्टर के साथ-साथ ग्रेट पर्सन थे। उनसे काफी कुछ मुझे सीखने को मिला। बतौर राइटर कैसे सीन लिखते थे, वे एक्टिंग कैसे करते थे। उनकी परफॉर्मेंस तो मेरी पिक्चर में उम्दा थी ही। वे थिएटर के कलाकार थे। ग्रेट एक्टर, ग्रेट राइटर... उनका कोई मुकाबला नहीं था। अपने काम को लेकर बहुत सीरियस और सिंसेयर थे। मेरे साथ काफी अच्छा रिलेशन था। मैंने उनके साथ एंड तक काम किया। मेरे साथ आखिरी फिल्म ‘मुझसे शादी करोगी’ रही। वे हर रोल में बेस्ट होते थे। कोई भी रोल हो, सब में वे सूट करते थे। अपने काम को लेकर उनमें ईमानदारी बहुत थी। सेट पर आते थे, तब कोई भी सीन हो, मामूली से मामूली सीन में भी चार चांद लगा देते थे। उन्होंने हंसते-खेलते काम किया। उनके साथ काम करने का वाकया अच्छा ही रहा। उन्होंने सब एक्टर और डायरेक्टर के साथ काम किया। वे बहुत डिजर्व इंसान थे। सेट पर आते थे, ईमानदारी से काम करते थे और अपने घर चले जाते थे। बहुत प्रोफेशल एक्टर थे। उन्होंने मेरे साथ 15-16 फिल्में की हैं। कादर खान ग्रेट मैन थे। उनके बेटे कनाडा में रहते हैं, उनसे कभी-कभार बात होती रहती है।  

वे बड़े ही खुशवार और इंटलेक्चुअल आदमी थे। वेल एजुकेटेड पर्सन भी थे और लिखते बड़ा ही जबरदस्त थे। मजाक वगैरह तो चलता रहता था, हर किसी के साथ बड़े खुशवारी तरीके से रहते थे। हां, कई दफा वे डायरेक्टर-प्रोड्यूसर से नाराज हो जाते थे। उनके काम को एक्सेप्ट नहीं करते थे। इसके पीछे वजह भी यह होती थी कि वे खुद कमाल के स्क्रीन राइटर थे तो स्क्रिप्ट और सीन को बारीकी से पढ़ते थे। इसमें से जब कुछ उनके वाजिब नहीं लगता था तो मेकर्स से नाराज हो जाते थे। कई बार अपनी जिद पर अड़ जाते तो कई बार डायरेक्टर वगैरह से माफी भी मांग लेते थे और कंप्रोमाइज करके काम शुरू कर देते थे। साउथ इंडियन फिल्मों के डायलॉग्स वगैरह को वे बहुत ही खूबसूरती के साथ ट्रांसलेट करते थे।  

कादर को बचपन से ही लोगों की नकल करने की आदत थी। जब मां नमाज के लिए भेजती थी तब वे बंक मारकर कब्रिस्तान में जाकर दो कब्रों के बीच बैठ खुद से बातें करते हुए फिल्मी डायालॅग्स बोलते थे। वहीं एक शख्स दीवार की आड़ में खड़े होकर उनको देखते थे। वो शख्स थे अशरफ खान। वो उस जमाने में ड्रामा कर रहे थे और उनको एक नाटक में 8 साल के बच्चे की जरूरत थी। उन्होंने कादर को नाटक में काम दे दिया।

कादर से पहले उनके परिवार में 3 बेटे हुए थे पर सभी का आठ साल की उम्र तक निधन हो जाता था। कादर के जन्म के बाद उनकी मां डर गईं कि कहीं उनके साथ भी ऐसा ही न हो। तब उन्होंने भारत आने का फैसला किया और वो मुंबई के धारावी में आकर बस गए। कादर जब एक साल के थे तब उनके माता-पिता का तलाक हो गया। इसके बाद वे डोंगरी जाकर एक मस्जिद पर भीख मांगते थे। दिन-भर में जो दो रुपए मिलते उससे उनके घर में चूल्हा जलता था। इतनी सी उम्र में ही वे पहली बार काम पर जाने वाले थे तब मां ने उन्हें रोककर कहा कि यह तीन-चार पैसे कमाने से कुछ नहीं होगा। अभी तू सिर्फ पढ़ बाकी मुसीबतें मैं झेल लूंगी।

एक दिन कादर पढ़ा रहे थे तब उनके स्कूल में दिलीप कुमार का फोन आया। उन्होंने इच्छा जताई कि वे उनका ड्रामा देखना चाहते हैं। कादर ने उनके सामने दो कंडीशन रखीं। एक तो वे ड्रामा शुरू होने से बीस मिनट पहले आएंगे और दूसरा उन्हें यह प्ले पूरा देखना होगा। यही प्ले देखकर दिलीप ने कादर को दो फिल्मों में साइन किया।  

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