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Interview : रजनीकांत से मेरी फिल्में अलग रही हैं, मेरी पॉलिटिक्स भी उनसे अलग है : कमल हासन

गांधीजी के बारे में कमल हासन ने कहा कि- मैंने खुद को उनके करीब रखने के लिए उन्हें कभी महात्मा नहीं बोला।

Dainik Bhaskar

Aug 12, 2018, 12:11 PM IST
special interview of kamal hassan with Dainik Bhaskar

मुंबई. कमल हासन एक्टिंग, फिल्म मेंकिंग के बाद अब राजनेता के रूप में पारी शुरू कर रहे हैं। वे हिंदुस्तानी फिल्मों को दुनिया के सामने सॉफ्ट पावर के तौर पर पेश करना चाहते हैं। काम के सिलसिले में उनके मुंबई प्रवास के दौरान भास्कर से बातचीत की। दैनिक भास्कर के सवालों का कमल हासन ने कुछ इस अंदाज में जबाव दिया-

सवाल : आपने ट्विटर पर खुद को नियो पॉलिटीकल्चरिस्ट बताया है। यह क्या है?

कमल का जबाव : इस विचारधारा के लोग विकास को अलग पैमाने से देखते हैं। लोग जयप्रकाश नारायण को ब्लेम करते रहे हैं कि उन्होंने राजनीति का स्तर गिरा दिया। डकैतों को नेता बनवा दिया। यह पूरी तरह गलत था। अब लोगों को संपन्न बनाने की बजाय टॉयलेट्स बनाए जा रहे हैं। उसे सरकार अपनी अचीवमेंट के तौर पर पेश कर रही है। मेरी पॉलिटिक्स अलग है। मेरा मानना है कि एक्चुअल डवलपमेंट की पैमाइश हैप्पीनेस कोशंट से होनी चाहिए। लोग कितने खुशहाल हैं। आज जो राजनीतिक हालात हैं, वे अजीबो-गरीब हैं। मैं आज की तारीख में 'हे राम' नहीं बना सकता था।

सवाल : रजनीकांत भी पॉलिटिक्स में कदम रख चुके हैं। क्या कहेंगे इस पर ?

कमल का जबाव : मैं उनका अपमान नहीं कर रहा, मगर हम दोनों को एक तराजू पर न तौलें। मेरा सिनेमा अलग है। नतीजतन, मेरी पॉलिटिक्स भी उनसे अलग है। हम वैसे राजनेता नहीं लाना चाहते, जो शब्दों के जाल में लोगों को फंसाए रखें। हम अभी सिस्टम में नहीं आए हैं। फिर भी विपक्ष के रोल में हैं। सत्ता पक्ष ने जिन वादों की बात की थी, उन्हें पूरा न करने पर हम अभी से सवाल कर रहे हैं।

- जो लोकायुक्त बिल पास हुआ है, वह मूल बिल के मुकाबले बहुत हल्का है। इस पर जिस बंदे ने शिकायत की, उसे एक साल के लिए जेल में डाल दिया गया। उस पर फाइन भी लगा दिया गया। हम उस इंसान के हक के लिए लड़ रहे हैं। इन सब मसलों को कोई नहीं उठा रहा। रजनीकांत जी भी नहीं। लिहाजा प्लीज मुझे उनके साथ इक्वेट न करें।'


सवाल : आप की पार्टी का मैनिफेस्टो कब तक आएगा ?
कमल का जबाव : चुनाव आयोग में पार्टी 'मक्काल निधि मयम' रजिस्टर कर ली है। हम मैनिफेस्टो पर काम कर रहे हैं। उसे अगले 80 दिनों में जारी करेंगे। हमारे पास हार्वर्ड के एक्सपर्ट हैं, जो बता रहे हैं कि सामाजिक, आर्थिक और बाकी मुद्दों पर कैसे काम करना है।


सवाल : महात्मा गांधी को राजकुमार हिरानी ने अपनी फिल्मों में अलग तरह से एक्सप्लेन किया? आप ने अलग तरीके से? आप इस विचारधारा को कैसे देखते हैं?
कमल का जबाव : मैंने खुद को उनके करीब रखने के लिए कभी महात्मा नहीं बोला। ऐसा करने पर मैं उनको अपने आप से दूर कर जाता। मैंने जब उनको लेकर एक लेटर भी लिखा था तो उसमें डियर मोहन लिखा था। डियर महात्मा नहीं। हम नेहरू को चाचा कहते हैं। गांधी को बापू। मेरी बेटियां मुझे बापू बुलाती हैं। मेरे पिता कांग्रेसी रहे हैं। उन्होंने कभी मुझे प्रेशराइज नहीं किया कि मैं उन्हें पसंद ही करूं। तभी मैंने 'हे राम' बनाई थी। वह बनाने से पहले मैंने गांधी की विचारधारा को 15 साल तक समझने की कोशिश की थी। उनके प्रति डवलप हुई अपनी समझ के बाद 20 साल बाद ही हे राम बनाई।

- किसी ने मुझे कुछ नहीं कहा। सिर्फ तुषार गांधी पास आए थे और कहा कि एंटी गांधी फिल्म न बनाऊं। मैं उसमें नाथूराम गोडसे न बनूं। मैंने उन्हें फिर फिल्म के बारे में समझाया कि यह एक्पेरिमेंट्स विद ट्रूथ है। न कि एक्सपेरिमेंट्स इन ट्रूथ्स है। तो वे समझे। उन्हें फिर फिल्म में तुषार गांधी प्ले करने को कहा।


सवाल : आपकी फिल्म विश्वरूपम-2 और उस जॉनर की बाकी फिल्मों में दुनिया को आईना दिखाया जाता है। खास तौर पर अमेरिकी नीतियों को। बावजूद इसके उनकी विस्तारवादी और संरक्षणवादी सोच में कोई तब्दीली नहीं आ रही। क्या कहेंगे?
कमल का जबाव :
कुछ भी नहीं। जब तक ट्रंप जैसे राजनेता रहेंगे, बुश के दौर से भी हालात बुरे रहेंगे। वे ऐसे विजनरी हैं, जो संभावनाओं के दरवाजों पर लात बरसा कर उन दरवाजों को खोलने की छद्म और दिखावटी कोशिशें करते रहेंगे। दरवाजे तो खुलेंगे नहीं। लिहाजा वे कहते फिरेंगे कि फलां समस्या का हल तो बम बरसाना ही है।


सवाल : खाड़ी मुल्कों में अमेरिकी नीतियों के चलते हुई परेशानियों का कोई इलाज दिख रहा है?
कमल का जबाव : कोई सॉल्युशन नहीं दिख रहा है। अमरीकी सिर्फ दूसरे विश्वयुद्ध में बतौर हीरो सबके सामने आए थे। उसके बाद कोरिया या वियतनाम जहां भी उन्होंने सैन्य कार्रवाइयां कीं, वे सब गलत साबित हुईं। वे विलेन बनकर ही उभरे। वियतनाम हमलों को अब वे अपनी गलती मान रहे हैं। ट्रंप के राज में जो नीतियां बनाई जा रही हैं, उन सब का पछतावा उन्हें आज से 20 साल बाद करना होगा।

- भारत में भी उसकी देखादेखी हो रही है। लोकतंत्र के बाकी स्तंभों को सरकार बहुत हल्के में ले रही है। वह अपनी मनमानी कर रही है।

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