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'मेरे भीतर से सर्वश्रेष्ठ कैसे निकालना है, वे जानते थे, वे जो कहते थे मैं वैसा ही करता था'

कुमार मंगलम ने पिता आदित्य बिड़ला को लेकर क्या कहा...

Danik Bhaskar | Jun 17, 2018, 09:58 PM IST

मुंबई। मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे ऐसे माता-पिता मिले। असल में मेरे लिए तो हर दिन ही फादर्स डे है। वे सबसे बेहतर, सबसे प्यारे और सबसे ज्यादा ध्यान रखने वाले पिता थे। मैंने हमेशा उन्हें श्रद्धा, सम्मान और प्रेम से देखा। वे मुझसे जुड़ी छोटी से छोटी बातों में पूरी दिलचस्पी लेते थे। वो चाहे मेरी पढ़ाई हो या खेलकूद का मामला या फिर मेरे शौक। पिता अपने व्यवसाय से जुड़े कामों में काफी व्यस्त रहा करते थे, इसके बावजूद उन्होंने हमेशा मेरे लिए समय निकाला।

मुझे याद है कि उन्होंने कभी मेरे स्कूल का कोई फंक्शन मिस नहीं किया। वे हर छोटे-बड़े मौके पर मौजूद रहते थे। उन्हें पता रहता था कि मेरे दोस्त कौन हैं। इतना ही नहीं, वे यह भी जानते थे कि मैं क्या कर रहा हूं। मगर मैं उनसे डरता भी था। एक बार ऐसा कॉलेज के दिनों में हुआ। मैं बी. कॉम की पढ़ाई कर रहा था। पिता ने मुझे फोन किया था, कहा था 'कुमार मुझे लगता है, इसके साथ-साथ तुम्हें सीए का कोर्स भी कर लेना चाहिए।' हैरानी इस बात की थी कि तब परीक्षा में सिर्फ दो महीने का समय रह गया था। हकीकत तो यह है कि मैं तो सीए का कोर्स करना ही नहीं चाहता था, लेकिन इतनी हिम्मत नहीं जुटा सका कि पिता को ना कह दूं।

मुझे सीए परीक्षा का वह पहला दिन याद है जब पिता छोड़ने गए थे। आज जब मैं पलटकर देखता हूं तो महसूस होता है कि वह सर्वश्रेष्ठ चीज थी जो उन्होंने मुझसे करवाई। दरअसल, अगर उन्होंने कहा कि यह काम सही है, तो मैं वह करता ही था। वे बहुत अच्छे से जानते थे कि मेरे भीतर से सर्वश्रेष्ठ कैसे निकालना है। हालांकि मेरे दादाजी ने मेरे पिता से और पिता ने मुझसे साफ कह रखा था कि जब बात बिजनेस की हो तो फैसले आपको खुद ही लेने हैं। फिर उन फैसलों की जिम्मेदारी भी खुद उठानी है। यही सीख पिता के जाने के बाद मेरे काम आ रही है। मुझे याद है कि ऐसी सीख मुझे 15 साल की उम्र से ही मिलने लगी थी। मैं कंपनी की मीटिंग्स में पिता के साथ जाने लगा था और मीटिंग के बाद अक्सर उनसे सवाल-जवाब करता था।

उनका पक्का विश्वास था कि आप अपने नैतिक मूल्यों के साथ समझौता किए बगैर सफल हो सकते हैं। यह हमारे स्वभाव में ही शामिल होना चाहिए। वे अक्सर कहा करते थे-जिद, जुनून और समर्पण का कोई विकल्प नहीं है। उनका पूरा जीवन भी यही दर्शाता है। उनकी यही पंक्तियां मेरे लिए मार्गदर्शक हैं। काम के अलावा भी जीवन में बहुत कुछ है। उनके इस विचार ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी है। वे मानते थे कि जीवन खुलकर जीना चाहिए। वे कहते थे- मेहनत जमकर करो, सपनों का पीछा करो। आप अगर अपने दिल-दिमाग से जुट जाएं तो इन सपनों को पूरा कर सकते हैं।

जब वे अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में पढ़ते थे, तो मेरे दादा-दादी को एक चिट्‌ठी लिखी थी। इसमें लिखा था 'मैं कुछ बड़ा करना चाहता हूं, बहुत बड़ा।' उन्होंने यह कर भी दिखाया। ग्रेजुएट होने के बाद उन्होंने खुद को इंस्पेक्टर राज के आतंक में घिरा पाया। ऐसे में उन्होंने साउथ-ईस्ट एशिया का रुख किया और अगले दो दशक में बड़ा बिजनेस खड़ा कर दिया। इस तरह भारत को साउथ-ईस्ट एशिया के नक्शे पर स्थापित कर दिया। आज हम छह महाद्वीपों के 35 देशों में मौजूद हैं। और हमारा आधा टर्नओवर विदेशी कारोबार से आता है। यह उनकी दूरदर्शिता का नतीजा है। इसने बिड़ला ग्रुप को दुनियाभर में सफलतापूर्वक कारोबार चलाने का भरोसा दिया है।

मैंने उनमें हमेशा एक ऐसी शख्सियत देखी जो हमेशा राष्ट्रनिर्माण में भागीदारी के लिए तत्पर रहती थी। वे बेहद सख्त लेकिन संवेदनशील इंसान थे। अगर किसी सहयोगी के परिवार में भी कोई बीमार हो जाता था, तो खुद डॉक्टर से बात कर इलाज सुनिश्चित करते थे। वे मेरे सबसे बड़े गुरु थे, जिनसे हर कोई सीख सकता है। बोलचाल के तरीके में वे जीनियस थे। वे गहन चिंतक थे। उनके विचार आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वे एक लीजेंड थे और लीजेंड अमर होते हैं।