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Manikarnika Movie Review: दमदार है Kangana Ranaut की एक्टिंग, Ankita Lokhande भी जीतेंगी दिल, लेकिन कमजोर है 'मणिकर्णिका' का पहला हाफ

Dainik Bhaskar

Jan 26, 2019, 01:08 PM IST

Manikarnika Film Review: आइटम नंबर की तर्ज पर अंकिता लोखंडे ने किया डांस, फिल्म में ऐसे कई गैरजरूरी सीन

Manikarnika Review: Kangana Ranaut's Movie Review in Hindi
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क्रिटिक रेटिंग : 3.5/5

Manikarnika Movie Review: कंगना रनोट (Kangana Ranaut) और राधा कृष्ण जगर्लामुदी के डायरेक्शन में बनी 'मणिकर्णिका' (Manikarnika: The Queen of Jhansi) निश्चिततौर पर 'बाहुबली' तो नहीं है, लेकिन यह रोमांचकारी है। फिल्म में कंगना रनोट, अंकिता लोखंडे, जीशान अयूब, डैनी डेन्जोंगपा और अतुल कुलकर्णी का अहम रोल है।

'मणिकर्णिका' की कहानी: फिल्म का सेट सन 1800 के बाद का है। 'मणिकर्णिका' झांसी की रानी लक्ष्मीबाई (कंगना रनोट) की वीर गाथा सुनाती है, जिन्होंने उस वक्त के अन्य राजाओं से उलट ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ने का फैसला लिया। विधवा और नई-नई रानी होने के बावजूद लक्ष्मीबाई ने उस वक्त के सबसे समृद्ध राज्य झांसी को बचाने के लिए पूरा जोर लगा दिया। झांसी के अंदर जहां सदाशिव राव (जीशान अयूब) जैसे भेदी थे तो वहीं गौस खान (डैनी डेन्जोंगपा), तात्या टोपे (अतुल कुलकर्णी) और झलकारी बाई (अंकिता लोखंडे) जैसे कई वफादार लोग भी थे।

'मणिकर्णिका' का रिव्यू: 'बाहुबली' में और संजय लीला भंसाली की फ़िल्में जहां बड़े पैमाने पर शूट होने के बावजूद इमोशनल वैल्यू से समझौता नहीं किया जाता है। हालांकि, मणिकर्णिका को देखकर लग रहा है कि यह अपनी एपिकनेस से बहुत दूर है। क्योंकि इसमें मेलोड्रामा बहुत ज्यादा है। फिल्म में कुछ सीन हैं जो अपनी संवेदनशीलता के साथ खुद को यादगार बना देते हैं। जैसे कि वह जब मणिकर्णिका अपनी एक व्यक्तिगत ट्रेजिडी पर रिएक्ट करती हैं। कुछ हद तक इसका श्रेय कंगना रनोट को जाता है, जो मणिकर्णिका के किरदार को हवा देती हैं और बहुत जुनून और दृढ़ विश्वास के साथ इसे जीती हैं। यहां तक कि जब वह एक घोड़े की सवारी कर रही होती है, जब वह तलवार चला रही होती हैंऔर जब अपने दुश्मनों तबाह कर रही होती हैं, हर सीन में कंगना आपको बहादुर रानी के चित्रण से अवगत कराती रहती है। उनका जुनून और दृढ़ विश्वास देखकर लगता है कि इस रोल को उनसे बेहतर कोई नहीं निभा सकता था।

फिल्म का फर्स्ट हाफ उम्मीद से ज्यादा स्लो है और कई जगह अपनी एनर्जी खो देता है। अगर इसे टिपिकल बॉलीवुड स्टाइल की जगह सही से नैरेट किया गया होता तो ये और बेहतर हो सकती थी। जैसे कि जब झलकारी बाई मणिकर्णिका से पहली मुलाकात के दौरान आइटम नंबर की तर्ज पर डांस कर रही होती हैं। यह सीन बिल्कुल गैरजरूरी लगता है। पहले हाफ में टाइट एडिटिंग की जरूरत थी। विजयेन्द्र प्रसाद का स्क्रीनप्ले कुछ हिस्सों को छोड़कर खिंचा-खिंचा सा लगता है। प्रसून जोशी के डायलॉग फिल्म की कहानी और सेट के हिसाब से सही हैं। लेकिन अंग्रेजों के मुंह से निकले कुछ डायलॉग्स जबर्दस्ती घुसाए हुए लगते हैं। फिल्म के सेकंड हाफ बेहतर है।

सुरेश ओबेरॉय ने पेशवा बाजीराव-2 के रोल में और डैनी डेन्जोंगपा गौस खान के रोल में एकदम फिट बैठे हैं। अंकिता लोखंडे ने बेहतरीन काम किया है। बाकी स्टार्स का काम भी अच्छा है, सिर्फ जीशु सेनगुप्ता को छोड़कर, जिन्होंने मणिकर्णिका के हसबैंड का गंगाधर राव का रोल किया है। जीशु का कैरेक्टर फंसा-फंसा सा लगता है और उन्होंने बहुत ही कमजोर परफ़ॉर्मेंस दी है।


कंगना रनोट की एक्टिंग और डेब्यू डायरेक्शन के लिए यह फिल्म देख सकते हैं। निडर लक्ष्मीबाई की महान और इंस्पायरिंग स्टोरी के बारे में जानने के लिए भी यह देखी जा सकती है।

रिव्यूअर : शुभा शेट्टी साहा।

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