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विवाद / द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर में संजय बारू की किताब से इतर कई सारी फैक्चुअल मिस्टेक्स

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 03:30 PM IST


Factual mistakes in The Accidental Prime Minister
Factual mistakes in The Accidental Prime Minister
Factual mistakes in The Accidental Prime Minister
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Factual mistakes in The Accidental Prime Minister
Factual mistakes in The Accidental Prime Minister
Factual mistakes in The Accidental Prime Minister

  • फिल्म में कई सीन ऐसे डाले गए, जिनका जिक्र किताब में नहीं है
  • मेकर्स ने राइटर संजय बारू से फिल्म बनाने के राइट्स तो लिए, मगर उन्हें फिल्म दिखाई ही नहीं

 

बॉलीवुड डेस्क. अनुपम खेर की द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर पर शुरू से प्रोपेगेन्डा फिल्म होने के आरोप लग रहे थे। अब फिल्म के आने के बाद इन आरोपों में सच्चाई भी नजर आ रही है। दृश्यों में कई पॉलिटिकल इवेंट्स और शख्सियतों को लेकर फैक्चुअल मिस्टेक्स हैं और कई सारे बयान ऐसे डाल दिए गए हैं जो बारू की किताब से इतर हैं।

 

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी कहते हैं कि यह फिल्म चुनाव से ठीक पहले ही रिलीज की गई है, इसके पीछे गलत इरादा समझा जा सकता है। नापाक इरादों के साथ बनाई गई इस फिल्म में सच के साथ खिलवाड़ होना लाजमी है। इसमें फैक्ट्स नहीं है और ये ठीक से फिक्शन भी नहीं है। त्रिशंकु की तरह लटकी है। इस पर कोई टिप्पणी करना, आलोचना करना है या इसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना इसको सम्मानित करने जैसा होगा।

फिल्म में क्या हैं फैक्चुअल मिस्टेक्स

  1. पहली गलती

    अटल बिहारी बाजपेयी, मनमोहन सिंह के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान उनकी तारीफ करते नजर आ रहे थे। उस क्षण वे लालकृष्ण आडवाणी से कहते हैं, मास्टर स्ट्रोक। हकीकत में किताब में इसका कहीं जिक्र नहीं है।

  2. दूसरी गलती

    संजय बारू का रोल प्ले कर रहे अक्षय खन्ना कहते हैं कि 2009 का इलेक्शन राहुल गांधी के बस की बात नहीं है। किताब में यह बात भी कहीं लिखी हुई नहीं है।

  3. तीसरी गलती

    अहमद पटेल का रोल निभा रहे विपिन शर्मा एक दृश्य में बारू से पीएम के बारे में कहते हैं कि साइकिल का हैंडल पकड़ना नहीं आता, मीडिया क्या हैंडल करेंगे? सच्चाई यह है कि किताब में कहीं इस बात का जिक्र नहीं है।

  4. चौथी गलती

    फिल्म में यह भी दिखाया गया कि मनमोहन सिंह सोनिया गांधी के सामने शिकायत करते नजर आते हैं कि उन्हें दूसरों की गलतियों का जिम्मा लेना पड़ रहा है। यह भी मिसलीडिंग है।

लेखक को ही नहीं दिखाई फिल्म, क्यों?

  1. मेकर्स ने राइटर संजय बारू से फिल्म बनाने के राइट्स तो लिए, मगर उन्हें फिल्म रिलीज होने के बाद अब तक दिखाई ही नहीं है। कहीं लेखक द्वारा ऑब्जेक्शन उठाने की आशंका के चलते तो ऐसा नहीं किया गया।

  2. ट्रेड पंडित और फिल्म

    समीक्षकों का कहना है कि जब एक प्रोपेगेन्डा फिल्म ही बनानी थी तो इसके किताब पर बेस्ड होने के दावे क्यों किए जा रहे थे? साथ ही फिल्म में यह भुला दिया गया कि मनमोहन सिंह विनम्र व्यक्ति थे, डरपोक नहीं।

  3. देखूंगा तो करूंगा टिप्पणी

    बारू ने कहा, "मैंने अब तक फिल्म नहीं देखी है। अगले हफ्ते देखने के बाद उस पर टिप्पणी करूंगा’। बारू से जब यह पूछा गया कि क्या उन्हें फिल्म की स्क्रीनिंग के लिए इनवाइट नहीं किया गया तो उस पर उन्होंने नो कमेंट्स कहा। इससे साफ जाहिर है कि फिल्म में क्रिएटिव लिबर्टी ली गई, पर बारू को लूप में नहीं रखा गया।"

     

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