वजह / हर बार ऑस्कर में असफल हुआ है भारतीय सिनेमा, दिग्गजों ने कहा- अवॉर्ड के लिए नहीं भेजी जाती अच्छी फिल्में

Oscar awards| Bollywood films in Oscar awards| bollywood films
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Oscar awards| Bollywood films in Oscar awards| bollywood films

Dainik Bhaskar

Jan 24, 2020, 04:19 PM IST

हॉलीवुड डेस्क. फरवरी में 92वें एकेडमी अवॉर्ड्स यानी ऑस्कर का आयोजन होना है। इस साल भी भारतीय सिनेमा अवॉर्ड सेरेमनी में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में सफल नहीं हो पाया। जोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ने भारतीय दर्शकों को उम्मीद जगाई थी, लेकिन फिल्म नॉमिनेशन नहीं पा सकी। इंडस्ट्री के दिग्गज इसका कारण भारत में मूवी सिलेक्शन को बताते हैं। 

केवल तीन बार ही भारतीय फिल्में ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंच सकीं हैं। पहली बार साल 1958 में फिल्म ‘मदर इंडिया’ को बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया था, लेकिन केवल एक वोट के कारण ‘नाइट ऑफ कैबिरिया’ से हार गई थी। साल 1988 में आई मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ भी इस कैटेगरी में नॉमिनेट हो चुकी है, फिल्म को गोल्डन ग्लोब्स में भी बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म के लिए नॉमिनेट किया गया था। आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ को भी बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म के लिए 2002 में ऑस्कर नॉमिनेशन मिला था। 
 

दिग्गजों ने बताए असफलता के कारण

  1. अवॉर्ड का सोचते ही नहीं हैं मेकर्स: राज शांडिल्य

    हिट फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ के डायरेक्टर राज शांडिल्य बताते हैं कि, "हमारे यहां पर कई अच्छी फिल्मों का निर्माण होता है, लेकिन हमारी लॉबी जिस तरह की फिल्मों को यहां से भेजती हैं, वे कभी भी उन अवॉर्ड्स का हिस्सा नहीं बन पाएंगी। भारतीय फिल्मों के सिलेक्ट नहीं होने पर उन्होंने बताया कि, यह सब ज्यूरी पर निर्भर करता है, हो सकता है कि उन्हें लगता है भारतीय सिनेमा इतना मैच्योर नहीं हुआ है। राज के अनुसार भारतीय फिल्ममेकर्स जब फिल्म का निर्माण करते हैं तो वो अवॉर्ड के बारे में सोचते ही नहीं हैं, उन्हें केवल फ्राइडे बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से मतलब होता है।

    वहीं उन्होंने कहा कि कुछ प्रोड्यूसर हैं जो जी जान लगा देते हैं, लेकिन कुछ ऐसे हैं जिन्हें कोई लेना-देना नहीं होता, फैशन और पैशन में फर्क होता है। कई अच्छी फिल्मों का निर्माण हुआ है, लेकिन दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती क्योंकि हमारे यहां चेहरा बिकता है। उन्होंने कहा कि कोई भी अवॉर्ड उन फिल्मों को मिलना चाहिए, जो एकदम अलग हो, किसी ने यह पहले कभी ना देखा हो। उन्होंने फिल्म ‘टाइटैनिक’ का उदाहरण देकर बताया कि, हमने कभी भी नहीं सोचा था की एक जहाज की घटना पर इतनी बेहतरीन फिल्म बन सकती है।  वहीं राज ने बेस्ट फिल्म कैटेगरी के लिए नॉमिनेट हुई जोकिन फीनिक्स की फिल्म ‘जोकर’की भी तारीफ की। 

  2. हमारे यहां चेहरे बिकते हैं: राज बंसल, फिल्म क्रिटिक

    फिल्म क्रिटिक राज बंसल बड़े अवॉर्ड्स में भारतीय फिल्मों की असफलता का कारण कंटेट और एक्टिंग को बताया। उन्होंने कहा कि हमारे यहां बनने वाला कंटेट अच्छा नहीं और हमारे यहां टैलेंटेड एक्टर्स का भी काफी अभाव है, इसी वजह से जो फिल्में सिलेक्ट होती हैं उनमें अच्छी एक्टिंग का अभाव होता है। वहीं उन्होंने बताया कि अवॉर्ड्स में भेजी जाने वाली फिल्म में राजनीति हावी होती है, सिलेक्शन कमेटी पर भी फिल्म चुनने का दबाव होता है। एक्टिंग और फिल्म मेकिंग को लेकर उन्होंने कहा कि हॉलीवुड कलाकार फिल्म पर गहन तरीके से काम करते हैं और वे दो-तीन साल तक मेहनत कर एक फिल्म तैयार करते हैं।

    92वें एकेडमी अवॉर्ड्स के लिए सिलेक्ट हुई ‘गली बॉय’ को लेकर उन्होंने कहा कि फिल्म केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित रह गई थी। बहुत बड़ी हिट और शानदार फिल्म होने के बावजूद फिल्म में ग्लोबल अप्रोच नहीं था। फिल्म बहुत अच्छी थी, लेकिन सब्जेक्ट ने उसे एक दर्शक वर्ग तक सीमित कर दिया। उन्होंने रिच कंटेट फिल्मों को लेकर कहा कि हमें कोशिश करनी चाहिए कि जिन फिल्मों का कंटेंट और एक्टर्स अच्छे हैं उन्हें भी उसी टिकट दाम में दर्शकों को भेजा जाए, जिस दाम में बड़ी फिल्मों का टिकट बिकता है। उन्होंने कहा कि कई नए स्टूडियोज ने फिल्म मेकिंग को खराब कर दिया है। पुराने मेकर्स आज भी अच्छी फिल्में तैयार कर रहे हैं। 

  3. मायने रखता है कि कौनसी फिल्म अवॉर्ड के लिए भेजी जा रही है: मोहम्मद जीशान अय्यूब, एक्टर

    ‘तनु वेड्स मनु’ और ‘रांझणा’ जैसी फिल्मों ने नजर आ चुके मोहम्मद जीशान अय्यूब ने फिल्म सिलेक्शन को कसूरवार बताया। उन्होंने कहा कि, भारत में भी अच्छी फिल्मों का निर्माण होता है, लेकिन अवॉर्ड्स में भेजने के लिए सिलेक्शन में गड़बड़ होती है। कई अच्छी फिल्में हैं जो चुनी जानी चाहिए, लेकिन किन्हीं परेशानियों के चलते उन्हें भेजा नहीं जाता। जीशान ने बताया कि बीते कुछ समय से नेशनल अवॉर्ड्स भी बहुत मेनस्ट्रीम बन गया है और अगर केवल मेनस्ट्रीम फिल्मों को तवज्जो देंगे तो अच्छा कंटेंट छिपा रह जाएगा। भारत में कंटेंट तो अच्छा बन रहा है, लेकिन उसका प्रमोशन नहीं हो पा रहा है। उन्होंने कहा कि हमारे यहां भी कई फिल्में होंगी जो हॉलीवुड फिल्मों को टक्कर दे सकती हैं, लेकिन वे अवॉर्ड्स के लिए सिलेक्ट नहीं हो पाती।

  4. हमारा स्टोरीटैलिंग का तरीका विश्वस्तर का नहीं है: राजीव वर्मा, एक्टर

    फिल्म ‘मैंने प्यार किया’में सलमान खान के पिता का रोल निभा चुके राजीव वर्मा ने बताया कि हमारे सिनेमा में स्टोरीटैलिंग का तरीका विश्व स्तर का नहीं है। वहीं, राइटिंग से लेकर कॉस्ट्यूम तक हॉलीवुड में बेहद डिटेल में काम किया जाता है। उन्होंने बताया कि उनके राइटर्स ग्लोबल अप्रोच के साथ काम करते हैं जबकि हमारे लेखक केवल इंडिया तक सीमित रह जाते हैं। उन्होंने कहा कि तकनीक तौर पर अभी हम पिछड़े हुए है। राजीव ने बताया कि हमारे यहां पब्लिसिटी के कारण भी हमारे यहां अच्छी फिल्में दर्शकों के सामने नहीं आ पाती हैं। हमारे प्रोड्यूसर और एक्जिबिटर्स भी केवल कमाई का ध्यान रखते हैं। 

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