पड़ताल / ऑस्कर में क्यों फेल हो जाता है भारतीय सिनेमा? फिल्मकार बोले- हमारे यहां से अच्छी फिल्में भेजी नहीं जातीं

Oscar awards| Bollywood films in Oscar awards| bollywood films
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Oscar awards| Bollywood films in Oscar awards| bollywood films

  • पहली बार 1982 में फिल्म ‘गांधी’ के लिए भानू अथैया को बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन के लिए ऑस्कर अवॉर्ड दिया गया था
  • इसके बाद 2009 में ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के गाने 'जय हो' के लिए एआर रहमान और गुलजार को ऑस्कर मिला था

निसर्ग दीक्षित

निसर्ग दीक्षित

Feb 10, 2020, 06:21 AM IST

लॉस एंजेलिस. 92वें एकेडमी अवॉर्ड्स यानी ऑस्कर का आयोजन 9 फरवरी (भारतीय समयानुसार 10 फरवरी तड़के) को होना है। इस साल भी भारतीय फिल्म अवॉर्ड सेरेमनी में मौजूदगी दर्ज कराने में सफल नहीं हो सकी। जोया अख्तर की फिल्म ‘गली बॉय’ने भारतीय दर्शकों को उम्मीद जगाई थी, लेकिन फिल्म नॉमिनेशन नहीं पा सकी। फिल्मकारों, कलाकारों और आलोचकों की नजर में ऑस्कर जैसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड में हमारे सिनेमा की लगातार असफलता का कारण भेजी जाने वाली फिल्मों का गलत चयन और राजनीति है।  

  • तीन बार ही ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंची भारतीय फिल्में

केवल तीन बार ही भारतीय फिल्में ऑस्कर नॉमिनेशन तक पहुंच सकीं हैं। पहली बार साल 1958 में फिल्म ‘मदर इंडिया’ को बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म कैटेगरी में नॉमिनेट किया गया था, लेकिन केवल एक वोट के कारण ‘नाइट ऑफ कैबिरिया’ से हार गई थी। 1988 में आई मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ भी इस कैटेगरी में नॉमिनेट हो चुकी है। आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ को भी बेस्ट फॉरेन लैंग्वेज फिल्म के लिए 2002 में ऑस्कर नॉमिनेशन मिला था। 

  • ऑस्कर के लिए भारत में ऐसे सिलेक्ट की जाती हैं फिल्में

फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक ऑस्कर में भेजे जाने के लिए फिल्मों को आमंत्रित किया जाता है। वेबसाइट पर 2019 को जारी नोटिफिकेशन के अनुसार फिल्म निर्माता मुंबई स्थित ऑफिस में फिल्म एंट्री भेजते हैं। अगर फिल्म एफएफआई द्वारा जारी की गई कुछ शर्तों को पूरा करती है तो फेडरेशन उस फिल्म पर विचार करता है।

  • ऑस्कर अवॉर्ड में अब तक भेजी गईं भारतीय फिल्में

नंबर

साल 

फिल्म 

भाषा

डायरेक्टर

1

1957

मदर इंडिया 

हिंदी

महबूब खान

2

1958

मधुमति

हिंदी

बिमल रॉय

3

1959

द वर्ल्ड ऑफ अपु

बंगाली

सत्यजीत रे

4

1962

साहब, बीवी और गुलाम

हिंदी/उर्दू

अबरार अल्वी

5

1963

मेट्रोपोलिस

बंगाली

सत्यजीत रे

6

1965

गाइड

हिंदी

विजय आनंद

7

1966

आम्रपाली

हिंदी

लेख टंडन

8

1967

द लास्ट लेटर

हिंदी

चेतन आनंद

9

1968

एल्डर सिस्टर

हिंदी 

ऋषिकेश मुखर्जी

10

1969

देवा मगन

तमिल

एसी त्रिलोकचंद्र

11

1971

रेशमा और शेरा

हिंदी

सुनील दत्त

12

1972

उपहार

हिंदी

सुधेंदू रे

13

1973

सौदागर

हिंदी

सुधेंदू रे

14

1974

हॉट विंड्स

उर्दू

एमएस सथ्यू

15

1977

मंथन

हिंदी

श्याम बेनेगल

16

1978

द चेस प्लेयर्स

उर्दू/हिंदी

सत्यजीत रे

17

1980

पायल की झंकार

हिंदी

सत्येन बोस

18

1984

सारांश

हिंदी

महेश भट्ट

19

1985

सागर

हिंदी

रमेश सिप्पी

20

1986

स्वाती मुत्यम

तेलुगु

कसिनाधुनि विश्वनाथ

21

1987

नयगन

तमिल

मणि रत्नम

22

1988

सलाम बॉम्बे!

हिंदी

मीरा नायर

23

1989

परिंदा

हिंदी

विधु विनोद चोपड़ा

24

1990

अंजली

तमिल

मणि रत्नम

25

1991

हीना 

हिंदी/उर्दू

रणधीर कपूर

26

1992

थेवर मगन

तमिल

भारतन

27

1993

रुदाली

हिंदी

कल्पना लाजिमी

28

1994

मुहाफिज

हिंदी

इस्माइल मर्चेंट

29

1995

कुरुथिपुनल

तमिल

पीसी श्रीराम

30

1996

इंडियन

तमिल

एस शंकर

31

1997

गुरू

मलयालम

राजीव आंचल

32

1998

जीन्स

तमिल

एस शंकर

33

1999

अर्थ

हिंदी

दीपा मेहता

34

2000

हे राम

तमिल/हिंदी

कमल हासन

35

2001

लगान

हिंदी/अंग्रेजी

आशुतोष गोवारिकर

36

2002

देवदास

हिंदी

संजय लीला भंसाली

37

2004

द ब्रीथ

मराठी

संदीप सावंत

38

2005

रिडल

हिंदी

अमोल पालेकर

39

2006

रंग दे बसंती

हिंदी

राकेश ओम प्रकाश मेहरा

40

2007

एकलव्य- द रॉयल गार्ड

हिंदी

विधु विनोद चोपड़ा

41

2008

तारे जमीन पर

हिंदी

आमिर खान

42

2009

हरीशचंद्राची फैक्ट्री

मराठी

परेश मोकाशी

43

2010

पीपली लाइव

हिंदी

अनुषा रिज्वी

44

2011

अबु सन ऑफ एडम

मलयालम

सलीम अहमद

45

2012

बर्फी

हिंदी

अनुराग बसु

46

2013

द गुड रोड

गुजराती

ज्ञान कोरिया

47

2014

लायर्स डाइस

हिंदी

अनुराग बस

48

2015

कोर्ट

मराठी

चैतन्य तम्हाने

49

2016

विसारानाई

तमिल

वेत्री मारन

50

2017

न्यूटन

हिंदी

अमित वी मासुरकर

51

2018

विलेज रॉकस्टार्स

असमी

रीमा दास

52

2019

गली बॉय

हिंदी

जोया अख्तर

दिग्गजों ने गिनाएं असफलता के कारण

फिल्म ‘ड्रीम गर्ल’ के डायरेक्टर राज शांडिल्य कहते हैं, "हमारे यहां अच्छी फिल्में बनती हैं, लेकिन हमारी लॉबी जिस तरह की फिल्में यहां से भेजी जाती हैं, वे कभी भी अवॉर्ड्स का हिस्सा नहीं बन पाएंगी। हमारी फिल्मों के सिलेक्ट न होना ज्यूरी की राय पर निर्भर करता है, क्योंकि मेरे विचार से उन्हें लगता है भारतीय सिनेमा इतना मैच्योर नहीं हुआ है। राज के अनुसार भारतीय फिल्म मेकर्स अवॉर्ड के बारे में सोचते ही नहीं हैं, उन्हें केवल फ्राइडे बॉक्स ऑफिस कलेक्शन से मतलब होता है। फैशन और पैशन में फर्क होता है। कई अच्छी फिल्में दर्शकों तक नहीं पहुंच पाती क्योंकि हमारे यहां चेहरा बिकता है। फिल्म ‘टाइटैनिक’ का उदाहरण ही देखिए, हमने कभी भी नहीं सोचा था की एक जहाज की घटना पर इतनी बेहतरीन फिल्म बन सकती है।

फिल्म क्रिटिक राज बंसल बड़े अवॉर्ड्स में भारतीय फिल्मों की असफलता का कारण कंटेट और एक्टिंग बताया। राज कहते हैं,  हमारे यहां कंटेट और टैलेंटेड एक्टर्स का भी अभाव है। अवॉर्ड्स में भेजी जाने वाली फिल्म में राजनीति हावी होती है, सिलेक्शन कमेटी पर भी फिल्म चुनने का दबाव होता है। हॉलीवुड कलाकार बहुत मेहनत काम करते हैं और वे दो-तीन साल में एक फिल्म तैयार करते हैं। इस बार सिलेक्ट होकर बाहर हुई ‘गली बॉय’ केवल महाराष्ट्र तक ही सीमित रह गई। हिट के बावजूद फिल्म में ग्लोबल अप्रोच नहीं था। कई नए स्टूडियोज ने फिल्म मेकिंग को खराब कर दिया है। पुराने मेकर्स आज भी अच्छी फिल्में बना रहे हैं। 

फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ में सलमान खान के पिता का रोल निभा चुके एक्टर- रंगकर्मी राजीव वर्मा कहते हैं, हमारे सिनेमा में स्टोरी टेलिंग का तरीका विश्व स्तर का नहीं है।  राइटिंग से लेकर कॉस्ट्यूम तक हॉलीवुड में बेहद डिटेल में काम किया जाता है। उनके राइटर्स ग्लोबल अप्रोच के साथ काम करते हैं जबकि हमारे लेखक केवल इंडिया तक सीमित रह जाते हैं। तकनीकी तौर पर भी हम पीछे हैं। कम पब्लिसिटी के कारण भी अच्छी फिल्में दर्शकों के सामने नहीं आ पाती हैं। हमारे प्रोड्यूसर और एक्जिबिटर्स भी केवल कमाई पर फोकस रखते हैं।

‘तनु वेड्स मनु’ और ‘रांझणा’ जैसी फिल्मों ने नजर आ चुके मोहम्मद जीशान अयूब ने फिल्म सिलेक्शन को कसूरवार बताया। जीशान कहते हैं, भारत में भी अच्छी फिल्मों का निर्माण होता है, लेकिन अवॉर्ड्स में भेजने के लिए सिलेक्शन में गड़बड़ होती है। कई अच्छी फिल्में हैं जो चुनी जानी चाहिए, लेकिन उन्हें भेजा नहीं जाता। कुछ समय से नेशनल अवॉर्ड्स भी बहुत मेनस्ट्रीम बन गया है और अगर केवल मेनस्ट्रीम फिल्मों को तवज्जो देंगे तो अच्छा कंटेंट छिपा रह जाएगा। भारत में कंटेंट तो अच्छा बन रहा है, लेकिन उसका प्रमोशन नहीं हो पा रहा। कई फिल्में हैं जो हॉलीवुड को टक्कर दे सकती हैं, लेकिन वे अवॉर्ड्स के लिए सिलेक्ट नहीं हो पाती।

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