एनिवर्सरी / कैफी आजमी के बेटे बाबा और बहू तन्वी ने साझा किए किस्से, कहा- वे कम बोलत थे, लेकिन महफिल पसंद थे

Kaifi Azmi's son Baba and daughter-in-law Tanvi shared stories on his birth anniversary
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Kaifi Azmi's son Baba and daughter-in-law Tanvi shared stories on his birth anniversary

दैनिक भास्कर

Jan 14, 2020, 10:34 AM IST

बॉलीवुड डेस्क. हिंदी फिल्मों के मशहूर गीतकार और शायर कैफी आज़मी के 101वें जन्मदिन पर उनके बेटे बाबा आजमी और बहू तन्वी आजमी बता रहे हैं उनसे जुड़े किस्से। कैफी साहब का जन्म आज ही के दिन उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में हुआ था। 10 मई 2002 में उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया था।

मैं जब 18-19 साल का था तो पढ़ाई में शिफर था। अब्बा की बहुत ख्वाहिश थी कि मैं पढ़ लिख जाऊं। लेकिन उन्होंने कभी मुझे टोका नहीं कि तुम पढ़-लिख नहीं रहे हो। जब मैं 18 साल का हुआ तो एक दिन उन्होंने मुझसे कहा कि 'बेटे जिंदगी में वो सब कुछ करो जिसमें तुम्हें खुशी मिलती हो, लेकिन एक चीज याद याद रखना कि सबमें अव्वल नंबर रहना। अगर तुम सड़क पर झाड़ू मारोगे तो भी मैं तुम्हारी इज्जत करूंगा पर कोशिश ये करना कि तुम उसमें अव्वल रहो।' बस यही पूरी जिंदगी में उन्होंने मुझे एक एडवाइस दी। वरना अब्बा और अम्मी हमेशा पहाड़ की तरह चुपचाप खड़े रहकर मेरा सपोर्ट सिस्टम बने रहे।  अब्बा और मेरे बीच बहुत साइलेंट सा कम्युनिकेशन रहा है। एक रात अब्बा को जब अटैक आया था तो मैं बाहर था। रात का वक्त था, अब्बा को उनके दोस्त बाहर से उठाकर लेकर आए थे। रात को एक ब्रेन सर्जन आए जो चेतन आनंद साहब के बहुत करीबी थे। उन्होंने चेक किया तो अब्बा का ब्लड प्रेशर 240 के करीब था। सुबह फैमिली डॉक्टर आए उन्होंने चेक किया और बताया कि इन्हें पैरालिसिस का अटैक आ चुका है। उनको हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। उन दिनों मैं 18 साल का ही रहा होऊंगा जब मुझे समझ आया कि पैसे की तंगी है।  अब्बा के बहुत चाहने वाले थे, चेतन आनंद और उनके प्रोड्यूसर्स, एक और फिल्ममेकर थे एस सुखदेव इन सबने बहुत मदद की। जाने कहां-कहां से लोग हेल्प करने के लिए आ गए। भिवंडी से कोई वर्कर आ रहा होता तो चुपचाप मुझे कोने में ले जाकर पैसा दे देता। हालांकि हमने कभी नहीं बोला कि हमें पैसे की जरूरत है, लेकिन फैक्ट ये है कि हमें पैसे की जरूरत थी। मेरी मां ने इन परेशानियों को बच्चों पर कभी जाहिर नहीं होने दिया। फिर जब अब्बा ठीक हुए तो बोले मुझे गांव जाना है। उन्होंने कहा बीमारी ने अपना काम किया और मुझे अपना काम करना है।
बाबा आजमी ,कैफी आजमी के बेटे और सिनेमेटोग्राफर


शादी के बाद मुझे गम था कि मैं अपने मां-बाप से दूर हो रही हूं पर कैफी साहब ने मुझे इतना प्यार दिया जितना सिर्फ एक बाप अपनी बेटी को दे सकता है। घर पर हर शाम महफिल जमती थी और शेरो शायरी होती थी। उस महफिल में बैठकर किस्से सुनना मुझे अच्छा लगता था। कैफी साहब खुद भले ही कम बात करते थे पर उन्हें पूरा घर लोगों से भरा हुआ चाहिए होता था। कई बार वे दोस्तों को बुला लेते थे, कोई मुद्दा झेड़ देते थे और फिर एक झपकी भी ले लेते थे। फिर अचानक उठते और अच्छा-अच्छा कहकर फिर से बात करने लगते।  उन्हें बच्चों से मिलना होता था तो कभी यह नहीं कहते थे कि बेटा तुम्हारी याद आ रही है। कोई न कोई बहाना बनाकर हमें अपने पास बुला लेते थे। एक बार मुझे कॉल करके पूछा कि बेटा अगर फ्री हो तो घर आ जाओ, कुछ काम है। मैं गई तो उन्होंने मुझे एक आर्टिकल पढ़ने को दे दिया और मेरे सामने ही सो गए। फिर एक झपकी लेकर उठे और बोले ठीक है इसे बाद में पूरा कर लेंगे, तुम बताओ बाकी सब कैसा चल रहा है। मतलब साफ है कि आर्टिकल तो बहाना था वे तो सिर्फ मुझसे बातें करना चाहते थे।  हर शाम शबाना, जावेद, अम्मी-अब्बा, बाबा और मैं बैठ जाते थे। अब्बा कुछ फरमाइश करते तो जावेद साहब कुछ सुनाते थे और यह हम सबके लिए एनरिचिंग एक्सीपीरियंस होता था। कभी-कभी तो अब्बा और जावेद साहब डिनर टेबल पर आने के लिए एक साथ अपने-अपने कमरों से निकलते तो पहले आप-पहले आप के चक्कर में वहीं बैठे रह जाते थे और हम खाना शुरू होने का इंतजार ही करते रहते थे। फिर एक समय ऐसा भी आया जब जावेद और शबाना अपने नए घर में शिफ्ट हो गए। इसके बाद वे जब भी हमारे घर आते तो वे ही पहले खाना खाने बैठ जाते थे। हम सब मिलकर इसका बहुत मजाक उड़ाया करते थे। इसके बाद यह जुमला बन गया कि इन्हें पहले खा लेने दो, मेहमानों का तो नंबर बाद में आएगा।'
तन्वी आजमी, बाबा आजमी की बहू और फिल्म एक्ट्रेस
(भास्कर के लिए दोनों से खास चर्चा अरविंद मंडलोई ने की)

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