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कश्मीरी पंडितों का दर्द बेचकर पैसे कमाने के आरोप पर विधु विनोद चोपड़ा बोले- ऐसा सोचने वाले गधे हैं

6 महीने पहले
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बॉलीवुड डेस्क.  डायरेक्टर विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'शिकारा' रिलीज के बाद से ही विवादों में है। कई लोग इस फिल्म पर कश्मीरी पंडितों के दर्द के व्यवसायीकरण का आरोप लगा चुके हैं। हाल ही में फिल्म के प्रमोशन के लिए मुंबई के के.सी कॉलेज पहुंचे चोपड़ा ने ऐसे लोगों को जवाब दिया। उन्होंने अपने स्टेटमेंट में उनके लिए गधे शब्द का इस्तेमाल किया है। 

गधे मत बनिए : चोपड़ा
चोपड़ा ने अपने स्टेटमेंट में कहा, "मैंने '3 इडियट्स' प्रोड्यूस की थी, जिसने पहले दिन 33 करोड़ रुपए कमाए थे और हम यह भी जानते थे कि 'शिकारा' का फर्स्ट डे कलेक्शन 30 लाख रुपए होगा। इसके बावजूद हमने इसे बनाने में अपनी जिंदगी के 11 साल लगा दिए। आज का ज़माना देखिए कितना फनी है। मैं वो फिल्म बनाता हूं, जो 30 करोड़ पहले दिन करती है। जब मैं 30 लाख की फिल्म बनाता हूं अपनी मां की याद में तो लोग कहते हैं कि मैंने कश्मीरी पंडितों के दर्द का व्यवसायीकरण किया है। मुझे लगता है कि जो लोग ऐसा सोचते हैं, वे गधे हैं। इसलिए मैं आपसे कहना चाहता हूं कि गधे मत बनिए। पहले फिल्म देखिए, फिर अपनी राय रखिए।" 


चोपड़ा इससे पहले इस संदर्भ में एक ओपन लेटर भी लिख सकते हैं। यंग इंडियंस के नाम लिखे अपने इस लेटर में उन्होंने आरोपों को तर्कहीन कहा था।



1) शिकारा विवाद पर चोपड़ा की सफाई

चोपड़ा ने अपने एक नोट में सफाई देते लिखा है-  मैं लाभ के लिए घृणा कभी नहीं करूंगा। मैं ऐसी फिल्म नहीं बनाऊंगा जो एक समुदाय को प्रदर्शित करती हो और अधिक दुश्मनी पैदा करती हो। शुक्रवार को मैं अपनी नवीनतम फिल्म शिकारा की पहली स्क्रीनिंग के लिए दर्शकों से भरे एक थिएटर में गया था। तीन सौ लोग, जिनमें से अधिकांश कश्मीरी पंडित थे, उन्होंने खड़े होकर तालियां बजाई थीं। लेकिन पीछे से एक महिला ने चिल्लाया कि यह फिल्म उसके दर्द की प्रतिनिधि नहीं है। वह इसके आगे और भी बहुत कुछ देखना चाहती थी। मुझ पर एक समुदाय की त्रासदी का व्यवसायीकरण करने का आरोप लगाया गया था, जिसे 30 साल पहले निर्वासित किया गया था।

मैंने कई दिन यह सोचने में बिताए कि उसने क्या कहा था? और मुझे एहसास है कि वह जो चाहती थी, वह नफरत थी। वह एक ऐसी फिल्म चाहती थी, जो मुस्लिमों को प्रदर्शित करती हो और जिसमें इससे भी ज्यादा दुश्मनी और खून-खराबा दिखाया गया हो। इतना ही नहीं, फिल्म के साथ उसका एक मुद्दा यह भी था कि मुस्लिम कलाकारों ने पंडित का किरदार क्यों निभाया?

एक हफ्ते के तीखे आरोप, विवाद और आत्मनिरीक्षण के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि मैं वह कहानीकार नहीं हूं। मैं लाभ के लिए घृणा कभी नहीं करूंगा। मैंने 11 साल पहले 2008 में 'शिकारा' पर काम करना शुरू किया था। यह फिल्म मेरी मां को श्रद्धांजलि के रूप में बनाई गई है। वे 'परिंदा' के प्रीमियर में शरीक होने के लिए एक हफ्ते के लिए श्रीनगर से मुंबई आई थीं और फिर कभी वापस नहीं लौट सकीं। 

वे 1999 में 'मिशन कश्मीर' की शूटिंग के दौरान मेरे साथ कश्मीर गई थीं। उन्होंने अपने घर का दौरा किया था, जिसे आतंकवादियों ने लूट लिया था। सब कुछ बर्बाद हो गया था। अपने घर में तोड़फोड़ देखने के बावजूद वे कहती रहीं कि यह एक दिन सब ठीक हो जाएगा। उन्होंने पड़ोसियों को गले लगाया और इस उम्मीद के साथ अपना घर छोड़ दिया कि किसी दिन वापस लौटकर आएंगी। 2007 में उनकी मृत्यु हो गई।

मैं अपनी मां का बेटा हूं और जब मैं यह फिल्म बना रहा था तो मेरे दिमाग में प्रमुख विचार यही था कि मेरी फिल्म हिंसा न भड़काए। मेरी महत्वाकांक्षा पूरी तरह से वास्तविकता का प्रतिनिधित्व करना था, लेकिन दर्शकों को तामसिक महसूस करने के लिए उकसाए बिना। इसलिए 19 जनवरी, 1990 के सीक्वेंस में जो उग्रवादी पंडितो का घर जलाने के लिए आते हैं उनकी सिर्फ परछाई दिखाई गई है। मैंने जानबूझकर ऐसा किया, क्योंकि मेरा मानना है कि हिंसा का कोई चेहरा नहीं होता।

मुझे 'शिकारा' के साथ बातचीत शुरू करने की उम्मीद थी और मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि ऐसा हुआ भी है। मुझे कश्मीरी पंडितों से अनगिनत संदेश और ईमेल मिल रहे हैं, जिन्होंने मुझे उनकी कहानी को दुनिया के सामने लाने के लिए धन्यवाद दिया है। मैं अभिभूत महसूस कर रहा हूं। नफरत करने वालों के लिए मेरे पास केवल कहने को 'लगे रहो मुन्नाभाई' के मुन्ना की तरह 'गेट वेल सून' ही है। 

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