कान्स / अपनी कोई फिल्म न होने पर बॉलीवुड की प्रतिक्रिया- फीस देकर फिल्में दिखाना अचीवमेंट नहीं

Dainik Bhaskar

May 17, 2019, 12:47 PM IST


No indian film compete others to cannes film festival in this year
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No indian film compete others to cannes film festival in this year

बॉलीवुड डेस्क. कान्स फिल्‍म फेस्टिवल 2019 के कॉम्पीटिशन में इस बार एक भी भारतीय फिल्‍म नहीं है। ये सेक्‍शन डायरेक्‍टर्स कट, अनसर्टेन रिगार्ड हैं। उनके अलावा वहां फिल्‍म बाजार लगता है। उस बाजार में एक्रीडेशन फीस और मिनी व मेगा थिएटर बुक कर फिल्‍में भेजी जाती हैं। कई सालों से इंडियन पैवेलियन भी वहां हिंदी और बाकी भाषाओं की फिल्‍में ले जाता रहा है।

फिल्म बाजार में जाती हैं फिल्में स्पर्धा में नहीं

  1. दिलचस्‍प पहलू यह है कि कई इंडियन मेकर्स वहां फिल्‍म बाजार और इंडियन पैवेलियन में भी फिल्‍मों की मौजूदगी को इंडिया में आकर अचीवमेंट के तौर पर पेश करते रहे हैं। इस ट्रेंड की शुरूआत अनुराग कश्‍यप ने बरसों पहले की थी। मसान जैसी फिल्‍में तो अनसर्टेन रिगार्ड में रहीं, मगर उनकी कई फिल्‍में वहां के कथित फिल्‍म बाजार में रहीं, पर इंडिया में उसका ढिंढोरा यह पीटा गया कि उनकी फिल्‍म तो कॉम्पीटिशन सेक्‍शन से होकर आई हैं।

    इसका फायदा उन्‍हें फिल्‍मों की ब्रांडिंग करने से लेकर डिस्‍ट्रीब्‍यूटर्स के बीच हवा बनाने में मिलती रही। उसे ही आज की तारीख में बाकी लोग यूज कर रहे हैं।

  2. दुख और निराशा की बात है, मेकर्स फिल्‍में कम प्रोजेक्‍ट ज्‍यादा बनाते हैं : रिचा चड्ढा

    गैंग्‍स ऑफ वासेपुर और मसान से कान जा चुकीं रिचा चड्ढा कहती हैं- यह बड़े दुख की बात है कि इस बार एक भी इंडियन फिल्‍म कान्स फेस्टिवल में नहीं है। अलग-अलग भाषाओं में हम सबसे ज्‍यादा फिल्‍में बनाते हैं। फिर भी यह हाल है। मुझे समझ में नहीं आता कि हम क्‍वालिटी और व्यावसायिक व्यवहारकता का तालमेल क्‍यों नहीं बिठा पाते। इसकी वजह शायद यही है कि मेकर्स फिल्‍म कम, एक प्रोजेक्‍ट ज्‍यादा बानाने लगते हैं। यही सोचते हैं कि स्‍टार की डेट तो मिल ही गई अब तो बेड़ा पार। इस चक्‍कर में फिल्‍म बनाने की नीयत गुम हो जाती है। इस लिहाज से गली बॉय अच्‍छी फिल्‍म थी। वह बर्लिन फिल्‍म फेस्टिवल में नाम कमाने में कामयाब रही थी।

  3. फिल्‍म बाजार में एंट्री को भी लोग अचीवमेंट जैसा दिखाते हैं : जैगम इमाम

    पिछले साल इंडियन पैवेलियन में फिल्म नक्‍काश ले गए मेकर जैगम इमाम कहते हैं- वहां के फिल्‍म बाजार में तो कोई भी जा सकता है। स्पर्धा में चुना जाना अलग बात है। फिल्‍म बाजार में  फीस देकर आपको एक्‍सेस मिल जाता है। फिर अपनी फिल्‍म वहां के डिस्‍ट्रीब्‍यूटर्स को दिखानी हो तो उसके लिए  थिएटर्स बुक करने पड़ते हैं। जिनका बजट ज्‍यादा है वे बीच पार्टीज करते हैं। सबके अपने तरीके हैं। इंडियन पैवेलियन के जरिए जाना भी आसान काम नहीं है। नौकरशाही के चलते लोगों को कई बार बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। बहरहाल, शुरू में तो इंडियन दर्शक मेकर्स की चालाकी समझ नहीं पाए। मगर अब वे समझने लगे हैं कि कौन सी फिल्म कान्स के कॉम्पीटिशन सेक्‍शन की है और कौन फिल्‍म मेले से। उसके बेसिस पर वे फिल्‍म को भाव देते हैं।

  4. ज्‍यूरी के बीच नहीं कनेक्‍शन तो उन्‍हें फिल्‍म दिखाना भी नामुमकिन : अनंत महादेवन

    अनंत महादेवन की ‘गौर हरि दास्‍तान’ कान्स में सिलेक्‍ट नहीं हो पाई थी। वे एक और कड़वे सच की ओर ध्‍यान आकृष्‍ट कराते हैं। अनंत कहते हैं- वहां दुनियाभर से 4000 फिल्‍में आती हैं। जूरी आपकी फिल्म देखे, वह आप को सुनिश्चित करना होता है। उसके लिए आपके नाम की चर्चा उस सर्किट में होनी चाहिए। अनुराग कश्यप व उनके बैनर फैंटम का नाम काफी पुराना था। कान्स में लोग उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानते हैं, इसलिए मसान दिखाने में उन्हें दिक्कत नहीं हुई थी।

  5. जानकारों के मुताबिक, फिल्‍म फेस्टिवल और प्रतिष्ठित अवाॅर्ड्स का फायदा तो है। ‘न्‍यूटन’ उदाहरण है। ऑस्‍कर में नामांकित होते ही, उसका बॉक्‍स ऑफिस कलेक्‍शन काफी बढ़ गया था। वह लागत से कई गुना ज्‍यादा कमा गई थी। मेकर्स को इस तरह की उम्‍मीद कान्स फिल्‍म फेस्टिवल से भी रहती है। मगर अब वह चमक धुंधली पड़ रही है।

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