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बर्थ डे / प्रसून जोशी ने यादों से दरगाह वाली बूढ़ी अम्मा को निकाल कर लिखा था 'मौला मेरे' गीत



मैं पहाड़ से लुढ़का हुआ वह पत्‍थर हूं, जो नदी और समंदर किनारे तराशे रूप में पहुंच गया है।

प्रसून जोशी
Danik Bhaskar | Sep 17, 2018, 02:39 PM IST

बॉलीवुड डेस्क. एड गुरु, गीतकार, स्क्रिप्ट राइटर और अब सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष प्रसून जोशी का आज 47वां जन्मदिन है। प्रसून जोशी का जन्म उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के दन्या नामक गांव में हुआ था। उनकी पढ़ाई  टिहरी, गोपेश्वर, रुद्रप्रयाग, चमोली एवं नरेन्द्रनगर में हुई, जहां उन्होंने एमएससी और उसके बाद एमबीए की पढ़ाई की। गीतकार, पटकथा लेखक और विज्ञापन गुरु प्रसून जोशी का कहना है कि उन्हें ऐसे बोल वाले गीत नहीं भाते, जो अटपटे हों।
 

इमोशन्स से भरी प्रसून की रचनाएं सीधे दिल की गहराई तक पहुंचती हैं। अपनी किताब 'Sunshine Lanes' में उन्होंने अपने रचे प्रमुख गीतों के पीछे की कहानी कही है। इसी किताब में उन्होंने बताया कि दिल्ली-6 के यह गाना उन्होंने कब, कैसे और किन हालातों में पूरा किया और क्यों वे इस गाने को सीधे रूह तक पहुंचने का रास्ता मानते हैं।  

 

"अर्ज़ियां सारी मैं चेहरे पे लिख के लाया हूं
तुम से क्या मांगू मैं तुम ख़ुद ही समझ लो मौला

मेरे मौला, दरारें-दरारें हैं माथे पे मौला
मरम्मत मुक़द्दर की कर दो मौला
तेरे दर पे झुका हूं, मिटा हूं, बना हूं
मरम्मत मुक़द्दर की कर दो मौला..
."
 

प्रसून की जुबानी, इस गीत की कहानी

  1. बदल गए थे आस्था के मायने

    बकौल प्रसून- एक व्यक्ति ने जब मेरा लिखा 'मौला मेरे मौला' गाना सुना तो उसने मुझे बताया कि कैसे उसकी आस्था के मायने बदल गए। एक अन्य व्यक्ति ने भी यह अनुभव साझा किया कि इस गाने ने कैसे उसे अपने अंतर-जातीय विवाह में भरोसा करने के लिए संवेदनशील बना दिया। असर यह हुआ कि अब वह अपने 3 साल के बच्चे को दोनों धर्मों को सम्मान देने के लिए प्रोत्साहित करता है। 

  2. धुन को बना दिया था रिंगटोन

    मेरे लिए भी यह एक ख़ास गाना है। मुझे इस गाने को लिखने में एक साल का वक्त लगा। रहमान ने मुझे इसकी धुन सौंप दी और मेरे लिखने का लम्बा इंतज़ार किया। यहां तक कि, उन्होंने इस धुन को मेरे मोबाइल की रिंगटोन बना दिया ताकि मुझे याद रहे कि गाना लिखना है। पर, बात आगे नहीं बढ़ी। मैं कुछ भी नहीं लिख पाया। 

  3. फिर याद आया बचपन

    मैंने बार-बार, कई बार अपने दिमाग के दरवाजे पर दस्तक दी लेकिन कुछ भी सामने नहीं आया। कई महीनों के बाद - लगभग आधी रात के दौरान - मेरे दिमाग में सहसा अपने बचपन की एक छवि कौंधी। कुछ वक्त के लिए हम लोग एक छोटे से कस्बे रामपुर में रहे थे।

  4. उस बूढ़ी औरत का चेहरा

    मेरे घर के बाजू में एक दरगाह थी - जिसकी दीवार मेरे घर से लगी थी।हर रोज स्कूल जाने से पहले मैं दरगाह पर माथा टेकता था। और अक्सर मेरा सामना चौड़े माथे वाली एक बहुत बूढ़ी औरत से हो जाता था जो वहां चुपचाप सजदे में झुकी होती थी। उसके माथे पर गहरी, बहुत गहरी सिलवटें, झुर्रियां नज़र आती थी। एक ऐसा चेहरा जिसे भुलाना मुश्किल होता है।

  5. यूं बह निकलीं अर्जियां

    मेरे चेतन मन में कुछ शब्द यूं उभरे ‘दरारें दरारें है माथे पे मौला, मरम्मत मुक़द्दर की कर दो मौला।’ हालांकि जैसे ये शब्द उसकी उस खामोशी को बयां कर रहे थे जिसमें वह खुदा से अपने माथे की दरारों की मरम्मत की दुआ मांग रही थी, अपने नसीब की मरम्मत चाह रही थी। मैंने एक ही झटके में लिखना शुरू कर दिया, मेरे पेन से ‘अर्जियां’ के हिज्जे बह निकले।

  6. राकेश और रहमान से शेयर किया

    मैंने इसके बारे में डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा और रहमान को बताया। कविता के मामले में उनके मेरे बीच एक कमाल का रिश्ता है। वास्तव में, वह पहले कविता पर प्रतिक्रया देते हैं और बाद में म्यूज़िक पर। वह ‘कंटेट’ वाले व्यक्ति हैं। उनके लिए विचार सर्वोच्च होते है और जब आप उन जैसे साथी के साथ कोई प्रोजेक्ट साझा करते हैं तो बड़ी खुशी मिलती है।

  7. सीधे रूह से आता है गीत

    जल्द ही हम चेन्नई में रहमान के स्टूडियो में मिले। मुझे अभी गाना पूरा भी करना था। मैं सुझाव दिया कि हम शुरुआती स्टैंजा रिकॉर्ड कर लें, लेकिन रहमान पूरा गाना चाहते थे। मैं अगले कमरे में गया और ठीक आधे घंटे बाद मेरे हाथ में नौ-मिनट लम्बा पूरा गाना था। इस गीत पर और बात नहीं करुंगा। इस पर ज़्यादा चीरफाड़ और दिमागपच्ची नहीं की जा सकती। यह सीधे रुह से आता है।