वुमन इक्वलिटी डे / 3 महिलाएं, जिनके दृढ़ निश्चय और हिम्मत ने निर्धारित की भारतीय सिनेमा की दशा-दिशा



सरस्वती बाई फाल्के, देविका रानी और फातिमा बेगम। सरस्वती बाई फाल्के, देविका रानी और फातिमा बेगम।
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सरस्वती बाई फाल्के, देविका रानी और फातिमा बेगम।सरस्वती बाई फाल्के, देविका रानी और फातिमा बेगम।

दैनिक भास्कर

Aug 26, 2019, 01:16 PM IST

बॉलीवुड डेस्क. भारतीय सिनेमा की शुरुआत में जब महिलाओं का काम करना समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था, उस वक्त तीन महिलाओं ने अपने निश्चय और हिम्मत से मिसाल पेश की। सरस्वती बाई फाल्के ने फिल्म निर्माण में अपने पति दादा साहेब फाल्के की मदद की और देविका रानी ने अपने बोल्ड तौर-तरीकों से  विदेशों में भारतीय सिनेमा को पहचान दिलाई। वहीं, फातिमा बेग भारतीय सिनेमा की पहली निर्देशक बनीं। फातिमा ने 1926 में फिल्म का निर्देशन कर इस क्षेत्र को महिलाओं के लिए खोल दिया।
 

आज वुमन इक्वलिटी डे के मौके पर पढ़िए इन तीन महिलाओं की हिम्मत और समर्पण की कहानी....

  • सरस्वती बाई फाल्के के दम पर मिली पहली भारतीय फिल्म

    सरस्वती बाई फाल्के के दम पर मिली पहली भारतीय फिल्म

    सरस्वती बाई फाल्के पति दादा साहब फाल्के के साथ।

    भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' को बनाने का श्रेय तो सभी दादा साहब फाल्के को देते हैं, पर इसका निर्माण असल में फाल्के की पत्नी सरस्वती बाई के दृढ़ निश्चय और असाधारण सहयोग के बल पर ही पूरा हुआ था। इस फिल्म के निर्माण के लिए रकम उनके गहने बेचकर ही जुटाई गई। इसके बाद फिल्म निर्माण में सीधे सहयोग देते हुए उन्होंने मिक्सिंग, फिल्म डेवलपिंग और फिल्म पर केमिकल का यूज करने का काम सीखा और इसे संभाला। 

     

    सभी छोटे-बड़े काम संभालतीं थीं

     

    वह परफोरेटिंग (यानि फिल्म शीट में होल करने) और शॉट्स को जोड़ने का काम भी करतीं। शूटिंग के समय कैमरा असिस्टेंट, स्पॉटपर्सन, सूरज की धूप में रिफलेक्टर लेकर खड़े रहने जैसे सभी छोटे-बड़े काम संभालतीं। इसके बाद 60-70 लोगों की यूनिट के लिए खाना पकातीं और उनके ठहरने व आराम का इंतजाम भी देखतीं और उनके कपड़े धोती थीं। रात में जब सब सो जाते तो फिल्म की कहानी पर ब्रेन स्टॉर्मिंग करती थीं। 

     

    ठुकरा दिया था लीड रोल  

     

    उनका इस फिल्म के लिए डेडिकेशन इतना था कि पहले उन्हें ही रानी तारामती का रोल ऑफर हुआ था, पर उन्होंने कहा कि मेरे अभिनय में व्यस्त होने से बाकी सारे काम ठप हो जाएंगे। उन्होंने अपने इस सपने को दबा दिया। उनके योगदान के बिना तो भारतीय सिनेमा की इस पहली फिल्म का बनना असंभव ही था। बाद में सरस्वती बाई फाल्के के नाम पर पुरस्कार भी शुरू किया गया। 

  • देविका रानी: पहली ड्रीम गर्ल

    देविका रानी: पहली ड्रीम गर्ल

    देविका रानी को भारतीय सिनेमा की पहली ड्रीम गर्ल कहा जाता है। वह अपने समय से कहीं आगे की सोच रखती थीं। जिस दौर में महिलाओं को घर से बाहर निकलने तक नहीं दिया जाता था, तब देविका एक्ट्रेस बनकर समाज के लिए नायक बन गईं। इसी चुनौतीपूर्ण दौर में उन्होंने न केवल अभिनय किया बल्कि फिल्म निर्माण कम्पनी का कुशल संचालन भी किया। उनकी दिग्गज फिल्मों में 1936 में आई 'अछूत कन्या', 1937 में आई 'जीवन प्रभात' और 1939 में आई 'दुर्गा' शामिल हैं। उनमें टैलेंट को पहचानने की गजब की समझ थी। 

     

    बनाया कई दिग्गजों का करियर

     

    अशोक कुमार, दिलीप कुमार, मधुबाला और राज कपूर जैसे सितारों का करियर उनके हाथों ही परवान चढ़ा। अपने बोल्ड रवैये के कारण ही विदेशों तक उन्होंने अपनी पहचान बनाई। उन्होंने भारतीय सिनेमा का संभवतः सबसे पहला बोल्ड स्टेप उठाया था। यह था परदे पर चार मिनट लंबा किसिंग सीन देना। इसके कारण उनकी काफी आलोचना भी हुई थी। 

     

    पद्मश्री पाने वाली पहली एक्ट्रेस

     

    फिल्म इंडस्ट्री में योगदान देने के लिए भारत सरकार ने साल 1969 में जब दादा साहेब फाल्के पुरस्कार की शुरुआत की तो इसकी सर्वप्रथम विजेता देविका रानी ही बनीं। वह फिल्म इंडस्ट्री की प्रथम महिला बनीं, जिन्हें पद्मश्री से नवाजा गया था। 9 मार्च 1994 को भारतीय सिनेमा ने अपनी इस वास्तविक नायिका को खो दिया था। 

  • फातिमा बेगम: पहली महिला निर्देशक

    फातिमा बेगम: पहली महिला निर्देशक

    जब सिनेमा जगत में महिलाओं के लिए अभिनेत्रियों के सिवाय किसी और काम में कोई भागीदारी नहीं थी, तब फातिमा बेगम ने निर्देशन की बागडोर अपने हाथ में थामी। उन्होंने निर्देशन के अलावा एक्टिंग और राइटिंग में भी अपना हुनर दिखाया। 

     

    अपने बैनर तले बनाई फिल्म 

     

    उन्होंने खुद का बैनर बनाया फातिमा फिल्म्स, और उसके तले ही 1926 में बुलबुल-ए-पेरिस्तान नाम की फिल्म का निर्देशन किया। बाद में 1928 में उनकी इस कंपनी को विक्टोरिया-फातिमा फिल्म्स के नाम से जाना जाने लगा। उन्होंने इस फिल्म को इतनी तन्मयता से बनाया कि इसमें विदेशी तकनीक भी शामिल की और स्पेशल इफेक्ट का प्रयोग भी कराया। 

     

    बिग बजट मूवीज का चलन लाईं 

     

    कहा जाता है कि वो बिग बजट मूवीज का चलन सामने लाई थीं, क्योंकि अपनी डायरेक्टोरियल डेब्यू फिल्म पर उन्होंने भारी-भरकम रकम खर्च की थी। इस फिल्म से पहले 1924 में 'सीता सरदावा', 'पृथ्वी बल्लभ', 'काला नाग' और 'गुल-ए-बकवाली' व 1925 में 'मुंबई नी मोहनी' जैसी फिल्मों में वह अपने अभिनय का जादू दिखा चुकी थीं। भारतीय सिनेमा जगत की इस पहली महिला निर्देशक को ही रियल में महिलाओं के लिए फिल्म उद्योग के सभी रास्ते खोलने का श्रेय जाता है। 

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