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यामी गौतम ने कहा- फिल्मों में अब स्क्रिप्ट लीड रोल प्ले कर रही है, हीरो-हीरोइन के लुक्स नहीं

9 महीने पहले
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बॉलीवुड डेस्क. हालिया रिलीज फिल्म \'बाला\' में टिकटॉक स्टार परी मिश्रा के रोल के लिए यामी गौतम की भी काफी चर्चा हो रही है। फिल्म के लिए यामी गहराई के साथ अपने कैरेक्टर की स्किन में गईं। उनका किरदार लुक्स के चलते हीरो को स्वीकार नहीं करता उसके स्टैंड पर भी यामी ने अपनी राय इस खास मुलाकात में शेयर की है।
 

क्रिटिक्स तक कह रहे हैं कि आप ने परी का किरदार बखूबी पकड़ा। कैसे किया आप ने?
मेहनत तो वाकई बहुत लगी। डायरेक्टर्स के साथ रीडिंग इतनी की कि मैं परी मिश्रा के किरदार में डूब चुकी थी। इतनी ज्यादा कि मैं खुद को परी ही इमेजिन करने लगी। उसे बनावटी नहीं बनने दिया। \'उरी\' के बाद \'बाला\' की स्क्रिप्ट भी मैंने छह से सात बार पढ़ी। \'विकी डोनर\' में वर्कशॉप काफी की थी। लिहाजा वहां स्क्रिप्ट रीडिंग की जरूरत नहीं पड़ी थी। फिल्म की वजह से टिकटॉक के साथ एसोसिएशन तक हो गई।
 

हमने सुना कि आपने डायरेक्टर अमर कौशिक को भी इनपुट्स दिए?
मेरी क्या बिसात? पर मैं परी की जिंदगी जीने लग गई थी। वजह लिखावट में काफी क्लैरिटी थी। उससे स्पष्ट था कि परी फनी है पर लाउड नहीं है। नतीजतन परी की तरह बिहेव करने लगी उसकी तरह एक्ट नहीं करना था। उसे अटेंशन पसंद थी। लिहाजा, उसका वॉक कैसा होगा? उसका लव सॉन्ग फिल्मी गानों पर होगा। उसकी जुल्फें संवारने की अदा तक कैसी होगी, वह सब अमर को मैंने ही जाहिर किया था। ये मेरे सिर्फ आइडियाज थे।
 

परी लुक के बेसिस पर अपने हस्बैंड को छोड़ देती है। उसके इस स्टैंड को कैसे जस्टिफाई करेंगी?
परी जैसी सोच की लड़कियां हमारे आसपास पाई जाती हैं। पढ़ाई में कमजोर होने के बावजूद लुक्स के चलते उन जैसों को शुरू से वैसी अटेंशन मिली कि वे उस मिजाज की हो जाती हैं। उन्हें हमसफर भी वैसा ही चाहिए होता है। गौर करने वाली बात है कि परी मिश्रा मैटेरियलिस्टिक नहीं है। उसे उसके नजरिए से सुंदर पति चाहिए। उसके एक और तर्क को समझना चाहिए कि जब हीरो खुद शीशे में अपने 
 

लुक को एक्सेप्ट नहीं कर रहा तो परी मिश्रा कैसे स्वीकारे, यामी की नजर में परी गुनहगार नहीं है?
गुनहगार कहना जरा ज्यादती होगी। फिल्म में जब कोर्टरूम के बाद बाला और परी के बीच बातचीत पर गौर फरमाएं तो उसमें डायलॉग्स नहीं हैं। वहां परी और बाला के बीच इशारों में बातचीत है। वहां परी बाला का पक्ष रियलाइज तो करती है। मेरे ख्याल से परी को कटघरे में खड़े करना सही तो नहीं है। वह रिप्रेजेंट ही करती है वैसी बिरादरी को जो खुद से प्यार है कि नहीं वाले मुद्दे को उठाती है।
 

इस रोल का फिल्म और एड इंडस्ट्री पर क्या असर पड़ने वाला है? इन दोनों जगहों पर भी तो लुक को काफी तव्वजो दी जाती है?
मुझे नहीं लगता कि अब ऐसा कुछ है। खासकर जिस तरह की फिल्में चल रही हैं सबमें स्क्रिप्ट ही मेन रोल प्ले कर रही है, हीरो-हीरोइन के लुक्स नहीं। चाहे \'बाला\' हो या फिर \'गली बॉय\' या \'राजी\'। साथ ही समाज की सारी नैतिक जिम्मेदारी सिर्फ फिल्मों पर नहीं थोप सकते। सोशल मीडिया से जो फीडबैक आ रहे हैं, उससे साफ है कि छोटे शहरों में सोच बदल सकती है। ढेर सारे लोगों ने कहा कि वे भी पहले गंजेपन या किसी और अधूरेपन के चलते हीनभावना से ग्रस्त रहते थे। अब नहीं हैं।

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