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Rafale Deal: क्या है राफेल डील, क्यों है इस पर विवाद; जानिए इस रक्षा सौदे से जुड़ी अहम बातें

यह दो सरकारों यानी भारत और फ्रांस के बीच हुई डील है। इसके ऑफसेट क्लॉज को लेकर कांग्रेस सवाल उठा रही है।

Danik Bhaskar | Sep 22, 2018, 03:56 PM IST
सितंबर 2019 में पहला राफेल भारत प सितंबर 2019 में पहला राफेल भारत प

नई दिल्ली. भारत और फ्रांस सरकार के बीच हुए राफेल लड़ाकू विमान सौदे को लेकर कांग्रेस केंद्र सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राहुल गांधी को एक इंटरव्यू के जरिए जवाब भी दिया। लेकिन, विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। रही सही कसर फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद के एक कथित बयान ने पूरी कर दी। इसमें उन्हें यह कहते हुए बताया गया है कि रिलायंस का नाम भारत ने प्रस्तावित किया था। दरअसल, करार की शर्तों को गोपनीय रखा गया है। इसलिए, भारत और फ्रांस दोनों ही इसकी कीमत भी नहीं बता रहे। कांग्रेस और राहुल गांधी इसी वजह से सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। बहरहाल, हम यहां आपको इस डील और उससे जुड़े कुछ सवालों के जवाब दे रहे हैं।

प्रश्न: क्या है ये समझौता संक्षेप में?
- राफेल फाइटर जेट डील भारत और फ्रांस की सरकारों के बीच सितंबर 2016 में हुई। हमारी वायुसेना को 36 अत्याधुनिक लड़ाकू विमान मिलेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह सौदा 7.8 करोड़ यूरो (करीब 58,000 करोड़ रुपए) का है। सितंबर 2019 में पहला राफेल भारत पहुंचेगा।

प्रश्न: एनडीए और यूपीए सरकार के दौरान मूल्य में कितना फर्क?
- कांग्रेस का दावा है कि यूपीए सरकार के दौरान एक राफेल फाइटर जेट की कीमत 600 करोड़ रुपए तय की गई थी। मोदी सरकार के दौरान एक राफेल करीब 1600 करोड़ रुपए का पड़ेगा।

प्रश्न: लेकिन, कीमत में इतना अंतर क्यों?
- यही सबसे अहम सवाल है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यूपीए सरकार के दौरान सिर्फ विमान खरीदना तय हुआ था। इसके स्पेयर पार्ट्स, हैंगर्स, ट्रेनिंग सिम्युलेटर्स, मिसाइल या हथियार खरीदने का कोई प्रावधान उस मसौदे में शामिल नहीं था। फाइटर जेट्स का मेंटेनेंस बेहद महंगा होता है। इसके स्पेयर पार्ट्स ना सिर्फ काफी महंगे बल्कि कई महीनों या सालों में मिल पाते हैं। इसकी प्रक्रिया भी काफी लंबी और पेचीदा होती है। मोदी सरकार ने जो डील की है। उसमें इन सभी बातों को शामिल किया गया है। राफेल के साथ मेटिओर और स्कैल्प जैसी दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइलें भी मिलेंगी। मेटिओर 100 किलोमीटर तक मार कर सकती है जबकि स्कैल्प 300 किलोमीटर तक सटीक निशाना साध सकती है। इसमें OBOGS यानी ऑन बोर्ड ऑक्सीजन रिफ्यूलिंग सिस्टम भी लगा है। कांग्रेस की आपत्ति है कि इस डील में टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का प्रावधान नहीं है। पार्टी इसमें एक कंपनी विशेष को फायदा पहुंचाने का आरोप भी लगाती है।

प्रश्न: भारत के लिए राफेल में और क्या खास होगा?
- मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, राफेल बनाने वाली ‘दसॉल्त’ कंपनी इसे भारत की भौगोलिक परिस्थितियों और उसकी जरूरतों के हिसाब से डिजाइन करेगी। इसे लेह-लद्दाख और सियाचिन जैसे दुर्गम इलाकों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकेगा। इसके लिए खास पुर्जे लगाए जाएंगे। पायलट ट्रेनिंग के लिए अलग से सिम्युलेटर मिलेंगे। सिम्युलेटर का अर्थ ठीक वैसा ही मॉडल फाइटर जेट है जैसा वास्तव में राफेल होगा। इसके रखने की जगह और मेंटेनेंस की जिम्मेदारी भी फ्रांस की ही होगी। इसके लिए स्पेशल हैंगर्स (एयरक्राफ्ट रखने की जगह) भी फ्रांस ही तैयार करेगा।

प्रश्न: राफेल डील में offset clause क्या है?
- यह भी इस समझौते का एक महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है। offset clause (एक ऐसी शर्त जो इस करार का हिस्सा है लेकिन इस्तेमाल दूसरी जगह होगा) के मुताबिक, फ्रांस इस करार की कुल राशि का करीब 50 फीसदी भारत में रक्षा उपकरणों और इससे जुड़ी दूसरी चीजों में निवेश करेगा।