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भारत-चीन सीमा विवाद:बार-बार विरोध के बाद भी कम नहीं हो रही चीन पर निर्भरता, डोकलाम विवाद से अब तक चीन से फार्मा आयात 28% बढ़ा

नई दिल्ली7 महीने पहले
भारत अपनी जरूरत के 70 फीसदी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडेंट (एपीआई) चीन से आयात करता है।
  • 2015-16 के 947 करोड़ के मुकाबले 2019-20 में 1150 करोड़ के फार्मा उत्पादों का आयात
  • चीन से हर साल 15,250 करोड़ के फार्मा इंग्रीडेंट्स, केमिकल और अन्य मेटेरियल का आयात

लद्दाख की गलवान घाटी में सीमा विवाद के बाद एक बार फिर देश में चीन में बने उत्पादों का विरोध करने की बात कही जा रही है। सीमा पर हर बार विवाद के बाद चीन पर निर्भरता कम करने के लिए योजनाएं बनाई जाती हैं। लेकिन यह योजनाएं सिर्फ कागजों में ही रह जाती हैं। 2017 में डोकलाम विवाद के बाद भी फार्मा सेक्टर ने चीन पर निर्भरता कम करने आयात में कमी लाने की बात कही थी। लेकिन ऐसा संभव नहीं हुआ, बल्कि तब से अब तक चीन से फार्मा आयात में बढ़ोतरी हो गई है। 

2019-20 में 1150 करोड़ के फार्मा उत्पादों का आयात

कॉमर्स मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, 2015-16 में चीन से 947 करोड़ के फार्मा उत्पादों का आयात हुआ था, जबकि 2019-20 में यह आयात 1150 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। इस प्रकार इसमें 28 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा इस अवधि में मिश्रित फार्मा उत्पादों का आयात 58 फीसदी बढ़कर 276 करोड़ रुपए पर पहुंच गया है। मिनिस्ट्री के डाटा के मुताबिक, भारत एक साल में चीन से 15,250 करोड़ रुपए के फार्मा इंग्रीडेंट्स, केमिकल और अन्य मेटेरियल का आयात करता है। 

सस्ते उत्पादों के कारण चीन पर निर्भरता बरकरार

दवा निर्माताओं का कहना है कि चीन के उत्पाद सस्ते होते हैं। इसके अलावा घरेलू दवा इंडस्ट्री को प्रोत्साहित करने के लिए देश में पर्याप्त नीतियां नहीं हैं। इस कारण दवा कंपनियों की चीने से आयात पर निर्भरता बरकरार है। इंडस्ट्री के अनुमान के मुताबिक, भारत अपनी जरूरत के 70 फीसदी एक्टिव फार्मास्यूटिकल इंग्रीडेंट (एपीआई) चीन से आयात करता है। इसमें एंटी इनफेक्टिव और एंटी कैंसर मेडीकेशन शामिल हैं। इंडस्ट्री के मुताबिक, पेंसिलिन और एजिथ्रोमाइसिन जैसे उत्पादों के लिए भारत 80-90 फीसदी तक आयात पर निर्भर है।

एक देश पर निर्भरता खत्म करनी होगी: सुदर्शन जैन

इंडियन फार्मास्यूटिकल अलायंस के जनरल सेक्रेटरी सुदर्शन जैन ने ईटी से बातचीत में कहा कि कोविड-19 महामारी हमारे लिए एक वेक अप कॉल की तरह है। हमें दवा आपूर्ति के लिए किसी भी एक देश पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। जैन का कहना है कि भारतीय कंपनियों को नई बल्क ड्रग मैन्युफैक्चरिंग यूनिट की स्थापना करने में दो-तीन वर्ष का समय लगेगा। इसके अलावा चीनी कंपनियों से मुकाबले के लिए भारतीय कंपनियों को सस्ती जमीन, बिजली, प्रदूषण संबंधी जल्दी क्लीयरेंस और वित्तीय मदद की आवश्यकता होगी। 

अगले महीने पास हो सकती है नई बल्क ड्रग पॉलिसी

मिनिस्ट्री ऑफ केमिकल का मानना है कि दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा दवा निर्यातक देश होने के बावजूद भारत अपनी दो-तिहाई एपीआई जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है। भारत मुख्य तौर पर 58 ड्रग इंग्रीडेंट के लिए आयात पर निर्भर है। इसमें भी चीन की ज्यादा भागीदारी है। इस निर्भरता को कम करने के लिए सरकार नई बल्क ड्रग पॉलिसी लेकर आई है। इस पॉलिसी के जुलाई में पास होने की उम्मीद है।   

चीन से वार्षिक आधार पर आयात की स्थिति

वित्त वर्षआयात (लाख रु. में)ग्रोथ (पिछले वर्ष के मुकाबले)
2015-16    94,789.79   -----
2016-17    89,892.90    -5.2%
2017-18    81,873.39    -8.9%
2018-19    103,861.93    26.9%
2019-20    114,927.31    10.7%
2016-17 से 2019-20 तक ग्रोथ    28%

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