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जलवायु परिवर्तन पर वर्चुअल मीटिंग:बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद एक मंच पर जिनपिंग और पुतिन साथ नजर आएंगे, दुनिया के 40 राष्ट्राध्यक्षों को बैठक में किया अमंत्रित

वॉशिंगटनएक महीने पहले
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यह पहला मौका है जब बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद रूस और चीन के राष्ट्रपति भी एक ही मंच पर मौजूद रहेंगे। (फाइल फोटो) - Dainik Bhaskar
यह पहला मौका है जब बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद रूस और चीन के राष्ट्रपति भी एक ही मंच पर मौजूद रहेंगे। (फाइल फोटो)

जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में अमेरिका फिर वापसी कर रहा है। अर्थ डे के मौके जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर होने वाली बैठक में राष्ट्रपति बाइडेन ने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत 40 देशों के राष्ट्रीय अध्यक्षों को अमांत्रित किया है। इस हफ्ते होने वाली इस वर्चुअल बैठक में शी जिनपिंग भी शामिल होंगे। बुधवार को बीजिंग की तरफ से जारी बयान में मंजूरी दी गई है।

इसमें कहा गया है कि दुनिया में राजनीतिक तनाव के बीच दुनिया के प्रदूषण से जूझ रहे देश जमीनी स्तर पर समाधान चाहते हैं। इससे पहले पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका इस प्रक्रिया से हट गया था। यह पहला मौका है जब बाइडेन के राष्ट्रपति बनने के बाद रूस और चीन के राष्ट्रपति भी एक ही मंच पर मौजूद रहेंगे।

चीन बोला- बैठक में प्रभावी भाषण देंगे जिनपिंग

चीन के विदेश मंत्रालय के मुताबिक शी जिनपिंग बैठक में प्रभावी भाषण देंगे। यह बयान US के जलवायू दूत जॉन कैरी की शंघाई यात्रा के बाद आया है। बाइडेन प्रशासन के जॉन कैरी ऐसे पहले अधिकारी हैं, जो चीन की यात्रा पर गए थे।

अमेरिका और चीन की तरफ से जारी संयुक्त बयान में कहा गया है कि जलवायु समस्या को लेकर दोनों देश सहयोग के लिए प्रतिबद्ध हैं। यह बयान ऐसे वक्त आया है जो दोनों देशों के बीच कई मसलों पर तनाव है। इससे पहले अमेरिका ने उइगर समुदाय पर चीन में हो रहे अत्याचर का मसला उठाया था। तब चीन ने घरेलू मामलों में दखल न देने की नसीहत अमेरिका को दी थी।

दोनों देशों के सहयोग के बिना संभव नहीं जलवायु परिवर्तन की समस्या से लड़ना

दरअसल, चीन और अमेरिका के सहयोग के बिना जलवायु परिवर्तन पर किसी तरह का वैश्विक समाधान निकालना संभव नहीं है, क्योंकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का आधा हिस्सा इन्हीं दो देशों से हो रहा है। इससे पहले जलवायु परिवर्तन की समस्या को बाइडेन ने सर्वोच्च प्राथमिकता में रखा है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पेरिस समझौते से हटने के बाद अमेरिका फिर इस प्रक्रिया में शामिल हुआ है। इसमें प्री-इंडस्ट्रियल लेवल पर सभी देशों के बीच तापमान 2 डिग्री से कम रखने का समझौता हुआ था। अगर तापमान बढ़ता है, तो उस पर वहां की सरकार को एक्शन लेना होगा।

चीन ने 2030 में स्थिति को काबू करने का वादा किया है
दुनिया में अभी सबसे ज्यादा कार्बन उत्सर्जन चीन करता है। स्थिति को 2030 तक सामान्य करने को लेकर चीन ने वादा किया है। वहीं माना जा रहा है कि बाइडेन भी स्थिति की सामान्य करने को लेकर नए लक्ष्य की घोषणा कर सकते है। यह मीटिंग ऐसे वक्त हो रही है, जब दुनिया में तापमान रिकॉर्ड तोड़ स्तर पर है और पूरी दुनिया एक महामारी से जूझ रही है।

चीन की तरफ से जारी बयान में कहा गया है कि अमेरिका को इसको लेकर अधिक जिम्मेदारी निभाने की जरूरत है। इससे पहले शी जिनपिंग ने पिछले हफ्ते फ्रांस और जर्मनी के साथ इस मसले पर वर्चुअल बैठक की थी। तब जिनपिंग ने बैठक में कहा था कि विकसित देशों को दुनिया के सामने कार्बन उत्सर्जन को कम करने और विकासशील देशों को समर्थन करने को लेकर एक उदाहरण पेश करना चाहिए।

क्या है पेरिस समझौता
पेरिस समझौता जलवायु परिवर्तन से जुड़ा मुद्दा है। यह दुनिया के सभी देशों के बीच अंतर्राष्ट्रीय स्तर का समझौता है। साल 2015 में पेरिस में हुए UN के ग्लोबल क्लाइमेट समिट (कॉप 21) के दौरान 196 देशों ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसे 4 नवंबर 2016 को लागू कर दिया गया था। इसमें वैश्विक तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से भी कम पर रखने का लक्ष्य है। भारत भी इस समझौते का हिस्सा है।

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