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एयरलाइन इंडस्ट्री में संकट:इस तिमाही में भी एयरलाइंस कंपनियों की मुश्किल रहेगी बरकरार, अमेरिकी कंपनियों को 73 हजार करोड़ रुपए के घाटे की आशंका

नई दिल्ली6 महीने पहले
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अमेरिका में 1 अक्टूबर से छंटनी पर रोक समाप्त होते ही, अमेरिकन एयरलाइंस ने 19 हजार कर्मचारियों को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके अलावा यूनाइटेड  ने भी एक्सट्रा 13 हजार कर्मचारियों की कटौती की है। - Dainik Bhaskar
अमेरिका में 1 अक्टूबर से छंटनी पर रोक समाप्त होते ही, अमेरिकन एयरलाइंस ने 19 हजार कर्मचारियों को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके अलावा यूनाइटेड ने भी एक्सट्रा 13 हजार कर्मचारियों की कटौती की है।
  • अप्रैल-जून के दौरान भारतीय एयरलाइंस का रेवेन्यू 85.7% कम हुआ
  • अमेरिकी एयरलाइन कंपनियों का रेवेन्यू दूसरी तिमाही में 86% कम हुआ ह

पहली तिमाही के बाद दूसरी तिमाही में भी एयरलाइन इंडस्ट्री को भारी नुकसान हुआ है। कोरोना संकट के बीच ठप पड़े कारोबार से यह सेक्टर बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। अमेरिकी एयरलाइन कपंनियों के मुताबिक उन्हें दूसरी तिमाही में कंपनियों को कुल 12 बिलियन डॉलर (87.95 हजार करोड़ रुपए) का नुकसान हुआ है। वहीं, बाजार के जानकारों का कहना है कि तीसरी तिमाही में भी कंपनियों को 10 बिलियन डॉलर (73.29 हजार करोड़ रुपए) से अधिक का नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। कोरोना संकट के बीच दुनियाभर में एयरलाइंस सेक्टर को भारी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।

कोरोना महामारी से बढ़ी एयरलाइंस सेक्टर की मुश्किलें

कोरोना संकट के बीच अमेरिकी एयरलाइन कंपनियों का रेवेन्यू भी दूसरी तिमाही में 86% कम हुआ है। मंगलवार को एयरलाइन कंपनी डेल्टा एयरलाइंस अपनी दूसरी तिमाही के नतीजे घोषित करने वाली है। ऐसे में बाजार के जानकारों ने अनुमान जताया है कि कंपनी को भारी नुकसान हो सकता है।

एयरलाइन सेक्टर में भारी मंदी का यह हाल यूरोपियन और एशियाई देशों में भी है। इसमें भारत भी शामिल है। एयरलाइन सेक्टर में भारी गिरावट की मुख्य वजह कोरोना महामारी है। दरअसल इसके चलते हवाई उड़ाने बुरी तरह से प्रतिबंधित हुई है।

एयरलाइन कंपनियों का रेवेन्यू 86% कम हुआ

भारत में महामारी के दौरान लगे देशव्यापी लॉकडाउन के कारण एयरलाइन कंपनियों को भी भारी नुकसान का सामना करना पड़ा है। अप्रैल-जून के दौरान भारतीय एयरलाइंस का रेवेन्यू 85.7% कम हुआ। इसी दौरान करीब 18 हजार नौकरियां भी खत्म हुई।

इससे पहले मई में क्रिसिल ने अपनी एक रिपोर्ट जारी किया था। इसमें अनुमान जताया गया था कि भारतीय एयरलाइंस इंडस्ट्री को लॉकडाउन के कारण 24-25 हजार करोड़ रुपए तक का नुकसान होगा। इसमें एयरलाइंस को 17 हजार करोड़ रुपए और एयरपोर्ट ऑपरेटर्स को 5-5 हजार करोड़ रुपए का नुकसान होगा। इसके अलावा एयरपोर्ट रिटेलर्स को भी 1700-1800 करोड़ रुपए का नुकसान होगा।

रिकवरी में लग सकता है 10 साल का वक्त

क्रिसिल रिपोर्ट में कहा गया था कि भारतीय एयरलाइंस को इस नुकसान की भरपाई के लिए कम से कम 10 वर्षों का वक्त लग सकता है। इस दौरान सेक्टर में 11 % की सालाना ग्रोथ की भी आवश्यकता होगी। आंकड़ों के मुताबिक भारत का पैसेंजर्स ट्रैफिक 341.05 मिलियन है। यह आंकड़ा वित्त वर्ष 20 के अगस्त महीने के आधार पर है।

बढ़ते डिमांड को ध्यान में रखते हुए सेक्टर में एयरलाइंस ऑपरेशन को बढ़ाने पर भी काम किया जा रहा है। आईबीईएफ ने अपनी रिपोर्ट में उम्मीद जताई है कि 2027 तक भारत में एयरप्लेन की संख्या बढ़कर 1100 हो जाएगी। लेकिन कोरोना के कारण अब योजना प्रभावित हो सकती है।

भारी नुकसान से क्या पड़ेगा असर

एयरलाइंस सेक्टर में भारी नुकसान के कारण सेक्टर से जुड़े अन्य कारोबार पर भी बुरा असर पड़ा है। भारत में भारी कर्ज के चलते एयरलाइन कंपनियां बंद हो रही हैं। इसके लिए सरकार विदेशी निवेशकों और घरेलू निवेशकों को निवेश के लिए आमंत्रित भी कर रही है। लेकिन मौजूदा स्थिति को देखते हुए निवेशकों ने इस सेक्टर से दूरी बनाए रखा है। जबकि अमेरिका में एयरलाइंस इंडस्ट्री के लिए पिछले दिनों ट्रंप प्रशासन ने 20 मिलियन डॉलर के राहत पैकेज का ऐलान किया था।

रोजगार की चिंता

सेक्टर में भारी नुकसान से उबारने के लिए स्थानीय सरकारें राहत पैकेज दे रही हैं या इस योजना पर काम कर रही है। इसकी बड़ी वजह रोजगार है। भारत में इस सेक्टर से जुड़े 18 हजार लोग प्रभावित हुए हैं। जबकि अमेरिका में इसकी संख्या और अधिक है। अमेरिका में आर्थिक तंगी से जूझ रही ज्यादातर एयरलाइन कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को लंबी छुट्टी पर भी भेजा है।

अमेरिका में 1 अक्टूबर से छंटनी पर रोक समाप्त होते ही, अमेरिकन एयरलाइंस (AAL) ने 19 हजार कर्मचारियों को कंपनी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। इसके अलावा यूनाइटेड (UAL) ने भी एक्सट्रा 13 हजार कर्मचारियों की कटौती की है। उन कटौती को रोकने के लिए फेड से मदद की मांग की गई थी, लेकिन ट्रंप प्रशासन वित्तीय सहायता देने में सफल नही रहा।

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