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नई समस्या:असंगठित क्षेत्रों के कर्मचारियों के लिए अप्रैल की सैलरी की हो सकती है दिक्कत

मुंबई8 महीने पहले
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देश में कोरोना के लॉक डाउन से जहां संगठित क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र की कंपनियों ने अपने कर्मचारियों को मार्च महीने का वेतन दे दिया, वहीं असंगठित क्षेत्र के लिए अब दिक्कत खड़ी हो सकती है। असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए मई महीना दिक्कत वाला हो सकता है, जब उन्हें अप्रैल की सैलरी नहीं मिल सकती है। हालांकि संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों को सैलरी की कोई दिक्कत नहीं आनेवाली है।

मजदूरी देने के लिए नहीं है पैसा-एआईएमओ
अखिल भारतीय निर्माता संगठन (एआईएमओ), जो कि 1 लाख छोटे निर्माताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली एक उद्योग संस्था है, ने कहा कि मंगलवार को इसके दो तिहाई से अधिक सदस्यों को मासिक मजदूरी का भुगतान करने के लिए समस्याओं का सामना करना पड़ा। दक्षिण भारतीय शहर चेन्नई में सोलर पार्ट्स की मैन्युफैक्चरिंग यूनिट चलाने वाले एआईएमओ के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष के ई रघुनाथन ने कहा, हमारे पास मजदूरी देने के लिए कोई फंड नहीं है।
उन्होंने कहा, "हमारी पहली प्राथमिकता बिजली के बिल, किराया, बैंक ऋण और कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा योगदान का भुगतान करना है।" उन्होंने बताया कि उन्हें सरकारी भुगतान सहित ग्राहकों से भुगतान में देरी का सामना करना पड़ा। सरकार ने पिछले महीने संसद को बताया था कि संघीय और राज्य सरकारों और सरकारी स्वामित्व वाली कंपनियों पर छोटे व्यवसायों के लिए 66 बिलियन डॉलर से अधिक का बकाया है।

स्थिति ठीक रही तो अप्रैल की सैलरी देंगे
14 अप्रैल को संभावित रूप से समाप्त होने के लिए तैयार भारत के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने लाखों प्रवासी कामगारों को बिना किसी अन्य आय में फंसाकर उन्हें असहाय छोड़ दिया है। क्रिएटीव पेरिफेरल्स के केतन पटेल कहते हैं कि मार्च की सैलरी हमने एडवांस में दे दी है। अप्रैल की भी सैलरी हम देखेंगे की कर्मचारियों को दे सकें। उनके पास 200 कर्मचारी हैं। इसी तरह मैकपावर सीएनसी के रूपेश मेहताा भी कर्मचारियों को मार्च की सैलरी एडवांस में दे चुके हैं और अप्रैल ठीक ठाक रहा तो इसकी सैलरी भी देंगे। 

एममआरडीए देगा पूरा खर्च
देश में बड़े बिजनसे ग्रुपों में महिंद्रा समूह ने अपने कर्मचारियों को मार्च की एडवांस सैलरी दी थी और अप्रैल की भी सैलरी वह कर्मचारियों को देगी। सरकारी कंपनी एमएमआरडीए के आयुक्त आर.ए. राजीव कहते हैं कि मुंबई महानगर प्रदेश विकास प्राधिकरण (एमएमआरडीए) पलायन रोकने के लिए करीबन 11,000 मजदूरों का जिम्मा उठाने का फैसला लिया है और उन्हें भोजन तथा चिकित्सा मुहैया कराएगा। उन्होंने सभी ठेकेदारों को यह आदेश दिया है कि वे उन मजदूरों का खर्च उठाएं और बाद में एमएमआरडीए उन्हें पैसा देगा। आर.ए. राजीव का कहना है कि उनके 11,000 मजदूर कहीं पलायन नहीं कर रहे हैं।

गोदरेज और शापुर पालनजी भी देंगे पूरी सुविधा
गोदरेज समूह ने अपने कर्मचारियों को एक पत्र जारी कर रहा है कि वह सभी 8 शहरों में गोदरेज प्रापर्टी में लगे कामगारों को सुरक्षा और सुविधा मुहैया कराएगा और सेनिटाइज भी कराएगा। साथ ही हाइजेनिक खानों की आपूर्ति करेगा। इसके अलावा आइसोलेशन सुविधा भी कामगारों के लिए मुहैया कराएगा। शापुर पालोनजी ने भी कर्मचारियों के लिए सभी सुविधाएं मुहैया कराई है ताकि वे वापस न जाएं। इस समूह के भारत में 430 साइटों पर 45,000 कर्मचारी हैं।
ओमप्रकाश इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड के ओमप्रकाश पांडेय कहते हैं कि रियल्टी सेक्टर के लिए यह बड़ा खतरा है क्योंकि काफी बड़े पैमाने पर यह मजदूर असंगठित क्षेत्र के रूप में काम करते हैं। चूंकि पूरा काम बंद है, इसलिए इस सेक्टर को उबरने में काफी समय लगेगा। वे कहते हैं कि अप्रैल की सैलरी देना मुश्किल है, हालांकि मार्च की तो सैलरी दी जा चुकी है।

सैलरी देने में आएगी मुश्किल-सीएमआई
क्लोथिंग मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के राहुल मेहता कहते हैं कि बहुत ही मुश्किल है कि अप्रैल की सैलरी कर्मचारियों को मिलेगी। जिसके पास देने की क्षमता होगी, लेकिन बाकी लोग कहां से देंगे? राहुल मेहता 3700 सदस्यों की संस्था के चेयरमैन हैं। उनके मुताबिक गारमेंट में 12 मिलियन कामगार हैं और लॉक डाउन ने इस सेक्टर को बुरी तरह से प्रभावित किया है। हालांकि वे कहते हैं कि लॉक डाउन के कोरोना से निपटने का कोई रास्ता भी नहीं है।
ओमप्रकाश पांडे कहते हैं कि स्थिति इतनी नाजुक है कि मजदूरों को रोकना संभव नहीं है। देश के प्रमुख शहरों जैसे मुंबई, दिल्ली, अहमदाबाद, जयपुर, भीलवाड़ा, असम, कोलकाता आदि इलाकों में उत्तर भारत से बड़े पैमाने पर मजदूर रहते हैं और अपनी रोजी रोटी कमाते हैं। लेकिन इस तरह की पहली बार बंदी ने उनके जीवन यापन पर बहुत ही बुरे तरीके से वार किया है।

दिहाड़ी मजदूरों की दिक्कत सबसे ज्यादा
यही नहीं, मुंबई जैसे शहरों में ऑटो रिक्शा, ओला, टैक्सी या फिर ऐसे कारोबार करनेवाले जो कर्ज लेकर उसे ईएमआई भरकर कारोबार कर रहे थे, वह बुरी तरह प्रभावित हैं। ऐसे ओला और टैक्सी चालकों का कहना है कि ईएमआई में भले राहत दी गई है, लेकिन उसका ब्याज तो भरना पड़ेगा। ऐसे में मार्च, अप्रैल और मई तक की तीन किश्तें तो टूटना तय है। फिर जून से अगर सब कुछ सही हुआ तो इस समय जो कर्ज लेकर जीवन यापन कर रहे हैं, उस कर्ज का भुगतान करना होगा। ऐसे में इन कामगारों यह नहीं लगता है कि अगले कम से कम 4 -5 महीनों तक उनके लिए शहरों में टिके रहना संभव होगा।
कर्मचारियों की राय देखें तो असंगठित क्षेत्र में उनकी अलग राय है। मार्बल्स कंपनी में काम करनेवाले भरत यादव कहते हैं कि मार्च की सैलरी तो मिल गई, लेकिन अप्रैल की सैलरी मिलना मुश्किल है। क्योंकि कंपनी ने पहले ही कह दिया है कि सैलरी नहीं मिलेगी। भरत यादव अकेले नहीं हैँ। सबसे बड़ी दिक्कत है ओला, उबर, टैक्सी और ऑटो वालों की या फिर अन्य खोमचे और फेरीवालों की, जो रोज कमाते खाते हैं। उनके लिए अब कमाई का कोई रास्ता नहीं बचा है।

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