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पैसा नहीं तो इलाज नहीं:कोरोना की दवा नहीं आई, अस्पतालों का बिल रोजाना कम से कम 25 हजार रुपए, बीमा कंपनियां नहीं दे रही हैं पूरा पैसा

मुंबई6 दिन पहलेलेखक: अजीत सिंह
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  • आरोप -अस्पताल गलत बिल लगा रहे हैं, नकदी वाले मरीजों को मिल रही है प्राथमिकता
  • अस्पतालों का कहना है कि वे सरकार या बीमा कंपनियों के चार्ज पर काम नहीं कर सकते क्योंकि खर्चे ज्यादा हैं।

कहते हैं डॉक्टर भगवान का दूसरा रूप है। लेकिन जब भगवान को परखने की बारी कोरोना में आई तो भगवान ही यमराज बन बैठा है। हालात यह है कि अगर आपके पास स्वास्थ्य बीमा है तो आपका इलाज बाद में होगा। अगर आपके पास नकदी है तो आपका इलाज पहले होगा। यही नहीं, आपको इसके लिए भारी भरकम बिल देने के लिए तैयार रहना होगा। वह भी तब, जब कोरोना की दवा भी नहीं आई है।

पड़ताल में चौंकाने वाले मामले सामने आए

भास्कर ने इस संबंध में कई राज्यों की सरकारों द्वारा तय रेट, जनरल इंश्योरेंस काउंसिल के तय रेट्स और मरीजों के साथ अस्पतालों की बिलों की पड़ताल की। पड़ताल में बहुत ही चौंकानेवाले तथ्य सामने आए हैं। कई अस्पतालों ने मरीजों को सीधे-सीधे कह दिया कि इंश्योरेंस है तो आप बाद में आइए। नकदी वालों को पहले भरती किया जाता है। यही नहीं, आपके पास कैश भी है तो पहले डिपॉजिट जमा करिए और फिर आपको भरती होने से पहले ही रोजाना का 15-20 यहां तक कि 35 हजार रुपए का बिल बता दिया जाता है ताकि आप उसके लिए तैयार रहें।

हम पहले आपको बता रहे हैं कि जीआई काउंसिल का नियम क्या है?

जीआई काउंसिल यानी देश की सभी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों की काउंसिल है। यह काउंसिल अस्पतालों के मनमाने रवैये पर रोक लगाती है। हाल में कोरोना में जब भारी भरकम वसूली की बात अस्पतालों की सामने आई तो जीआई काउंसिल ने इसकी एक राशि तय की। इसके मुताबिक जीआई काउंसिल ने कहा कि नीति आयोग पैनल की जो सिफारिश है उसी आधार पर यह रेट तय किए जा रहे हैं।

जीआई काउंसिल के ये हैं रेट

जीआई काउंसिल ने जो रेट तय किए उसमें सपोर्टिव केयर और ऑक्सीजन के साथ आइसोलेशन बे्ड्स का प्रति दिन का चार्ज 10 हजार रुपए होगा। इसमें पीपीई किट भी होगा जो 1,200 रुपए का होगा। दूसरे मामले में आईसीयू का चार्ज 15 हजार रुपए तय हुआ जिसमें वेंटिलेटर नहीं होगा। इसमें पीपीई किट 2000 रुपए की होगी। तीसरी कैटेगरी आईसीयू की बनी जिसमें वेंटिलेटर के साथ 18 हजार रुपए प्रति दिन चार्ज होगा। इसमें पीपीई किट 2,000 रुपए की होगी।

यह दरें एनएबीएच अस्पतालों की हैं। जो अस्पताल एनएबीएच नहीं हैं उनकी दरें इसी क्रम में 8 हजार, 13 हजार और 15 हजार रुपए तय की गई।

शहरों के आधार पर तय हैं अस्पतालों की दरें

इसमें भी शहर के आधार पर दरें हैं। जैसे कोई सी लेवल का शहर है तो वहां पर प्रतिदिन के चार्ज कम से कम 4,875 रुपए होने चाहिए। अधिकतम में यह चार्ज 7313 रुपए हो सकता है। जीआई काउंसिल ने मेट्रोपोलिटन शहरों में बस दिल्ली एनसीआर, मुंबई एमएमआर, कोलकाता एमएमआर और चेन्नई एमएमआर को रखा है। बाकी सब मेट्रोपोलिटन के दायरे से बाहर के शहर हैं।

कोई भी अस्पताल 15 हजार रोजाना से ज्यादा बिल नहीं लगा सकता है

यानी जीआई काउंसिल की दरों के मुताबिक कोई भी अस्पताल 15 हजार रुपए प्रतिदिन से ज्यादा का चार्ज नहीं ले सकता है। अस्पताल की जो फिलहाल दरें हैं वह जनरल काउंसिल की तय दरों की तुलना में 70 से 108 प्रतिशत ज्यादा हैं। एसोसिएशन ऑफ हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स ने देश में 6 अस्पतालों के आंकड़ों को जुटाया है। इसमें नारायणा हेल्थ बंगलुरू, मेडिका सुपर स्पेशियालिटी कोलकाता और भगत चंद्र हॉस्पिटल दिल्ली का समावेश है।

जीआई काउंसिल और अस्पतालों की दरों में अंतर

जीआई काउंसिल और अस्पतालों की दरों में बहुत ज्यादा अंतर पाया गया है। उदाहरण के तौर पर ऑक्सीजन के साथ आइसोलेशन बेड के लिए प्रति दिन 10 हजार रुपए की सीमा तय की गई है। जबकि हॉस्पिटल एसोसिएशन का अनुमान है कि यह 21,932 रुपए प्रति दिन लिया जा रहा है। बीमा कंपनियां इसी आधार पर रोजाना 18 हजार रुपए आईसीयू के लिए तय की हैं। जबकि हॉस्पिटल बॉडी ने इसके लिए 37,358 रुपए तय किया है।

अब राज्य सरकारों की तय दरों को देखें-

कर्नाटक में सरकार ने आयुष्मान भारत के तहत जनरल वार्ड की दर 5,200 से 25 हजार रुपए जबकि अन्य बीमा और कैश पेमेंट के लिए 10 हजार रुपए तय किया है। ऑक्सीजन के साथ यह दर 7 हजार रुपए और 12 हजार रुपए है। इसी तरह आईसीयू के लिए 8,500 और 15 हजार रुपए तय किया गया है। आइसोलेशन आईसीयू वेंटिलेटर के साथ यह दर 10 हजार और 25 हजार रुपए है।

हरियाणा में 13 से15 हजार रुपए तय

हरियाणा में सरकार ने अस्पतालों का बिल 13 हजार से 15 हजार रुपए आईसीयू के लिए तय किया है। हालांकि इसमें वेंटिलेटर नहीं है। वेंटिलेटर के साथ आईसीयू बेड का चार्ज 15 हजार से 18 हजार रुपए प्रति दिन है। आइसोलेशन बेड का चार्ज 8 हजार से 10 हजार रुपए है।

अब कुछ केस को देखते हैं।

केस -1- अस्पताल ने रोजाना 30 हजार का बिल बताया, सरकारी अस्पताल में बिना किसी बिल के मरीज ठीक हुआ

मुंबई के कांदिवली इलाके में रहनेवाले ओमप्रकाश पांडे बताते हैं कि उनके भाई को कोरोना पॉजिटिव पाया गया। जब उन्होंने दो तीन अस्पतालों में बात की तो डॉक्टर्स ने कहा कि अगर हेल्थ इंश्योरेंस है तो आपको हम फिलहाल भर्ती नहीं कर सकते हैं। मामला पूरी तरह कैश का है। इसमें आपको पहले एक लाख रुपए जमा कराने होंगे। रोजाना का बिल 30 से 35 हजार रुपए होगा। बाद में ओमप्रकाश ने भाई को बोइसर के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया जहां कुछ हजार रुपए की दवाइयों से वे स्वस्थ हो गए।

केस-2- एक लाख डिपॉजिट न होने पर अस्पताल ने भर्ती करने से मना किया, मरीज की मौत

जौनपुर के रहनेवाले आनंद मिश्र बताते हैं कि उनके चाचा पंडित दीनानाथ मिश्र का कोरोना पॉजिटिव आया। जब वह बनारस के अपेक्स अस्पताल में उनको लेकर गए तो अस्पताल ने कहा कि पहले एक लाख जमा कराइए। लेकिन उनके भाई के पास महज 40 हजार रुपए थे। अस्पताल ने इतने पैसे में भर्ती करने से मना कर दिया। आनंद के मुताबिक, उन्होंने डॉक्टर्स से कहा कि वे 15 मिनट में पैसे मंगा रहे हैं। लेकिन तुरंत अस्पताल ने कहा कि कोविड बेड पूरा हो गया है और दूसरा मरीज पैसा दे चुका है, आपका इलाज नहीं होगा।

यही नहीं, पूरे दिन भर चक्कर लगाने के बाद बनारस जैसे शहर में किसी अस्पताल ने उन्हें भर्ती नहीं किया और अंत में उनकी मृत्यु हो गई।

केस -3- तीन दिन का बिल बना 1.05 लाख रुपए

ठाणे जिले के मीरा रोड में रहनेवाली सरोजा देवी कोरोना पॉजिटिव पाई गई। उन्हें धनवंतरी अस्पताल मेँ भर्ती कराया गया। स्वास्थ्य बीमा नहीं था। 3 दिन के लिए डॉक्टर ने कुल 1.05 लाख रुपए का बिल बनाया। दवा के साथ कुल खर्च 1.90 लाख रुपए तीन दिन का हुआ। इसमें डॉक्टर ने पहले 50 हजार रुपए डिपॉजिट जमा कराए। हालांकि बाद में मरीज की मौत हो गई।

केस-4- अस्पताल ने थमाया 9.61 लाख का बिल

ठाणे जिले के नालासोपारा पश्चिम के रिद्धि विनायक हॉस्पिटल ने कोरोना से मरने वाले एक मरीज के परिजनों को 9 लाख 61 हजार का बिल थमा दिया। मृतक के परिजनों ने हॉस्पिटल पर लापरवाही पूर्वक इलाज और मनमाना बिल बनाने का आरोप लगाया है।

केस 5- दिल्ली के अस्पताल ने 7.5 लाख बिल बनाया, दबाव पड़ा तो 4 लाख किया

दिल्ली के शांति मुकुंद अस्पताल में 52 वर्षीय नरेंद्र कौर कोरोना पॉजिटिव होने पर भर्ती की गई। अस्पताल ने पहले 4 लाख रुपए जमा कराने को कहा। चूंकि एटीएम से एक दिन में 50 हजार ही निकल पाता है इसलिए कौर की बेटी मायंका ने 2.5 लाख रुपए किसी तरह से इंस्टॉलमेंट में भर दिया। पर कुछ ही दिन बाद अस्पताल के बिलिंग विभाग ने बताया कि उनका बिल 7.5 लाख रुपए से ज्यादा हो चुका है। इसके बाद मामला उलझ गया। कारण कि कौर की बेटी ने जब दिल्ली सरकार के अस्पतालों का रेट पता किया तो उसमें और अस्पताल के रेट में काफी फर्क था।

हालांकि बावजूद इसके अस्पताल ने इस मामले में 4.20 लाख रुपए की बिल पर ही सेटलमेंट किया।

मामला सामने आया तो कार्रवाई भी हुई, 4 अस्पताल कोरोना लिस्ट से बाहर

मुंबई के बोरीवली में 4 निजी अस्पतालों को कोविड का इलाज करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया। क्योंकि इनके खिलाफ ज्यादा पैसे वसूलने की शिकायतें मिली थीं। मुंबई महानगर पालिका के सहायक आयुक्त भाग्यश्री कापसे ने बताया कि बोरीवली में अपेक्स के दो हॉस्पिटल, मंगलमूर्ति अस्पताल और धनश्री अस्पताल को कोविड की लिस्ट से हटा दिया गया है।

अपेक्स के खिलाफ 6 शिकायतें

अपेक्स के खिलाफ 6 शिकायतें मिली थीं। महाराष्ट्र राज्य सरकार ने मई में अस्पतालों को यह कहा था कि प्रति दिन 9,000 रुपए से ज्यादा की बिल मरीज की नहीं हो सकती है। यह बिल आईसीयू और वेंटिलेटर के साथ होगी। जबकि केवल आईसीयू बेड के लिए 7,500 और रूटीन वार्ड में आइसोलेशन के लिए 4,000 रुपए प्रति दिन का चार्ज होगा। यह चार्ज 31 अगस्त तक के लिए है।

अस्पतालों की मनमानी पर रोक के लिए ऑडिटर की नियुक्ति

मुंबई मनपा ने यह पाया कि ज्यादातर अस्पताल मनमानी कर रहे हैं। इस पर एक ऑडिटर की नियुक्ति भी की गई। 20 जुलाई तक 1,115 शिकायतें मनपा को ज्यादा बिल के मामले में मिली थीं। इसमें 37 अस्पतालों के खिलाफ 625 शिकायतें थी। इसमें 1.46 करोड़ रुपए उन मरीजों से लिए गए जिनसे ज्यादा चार्ज किया गया था।

जनरल बीमा कंपनी के अधिकारी क्या कहते हैं?

किसी भी क्लेम में कौन कौन सी चीजें पे होती हैं, वो रेगुलेटर इरडाई में परिभाषित है। बजाज आलियांज जनरल इंश्योरेंस के एक अधिकारी के मुताबिक कोरोना से पहले भी किसी भी क्लेम में 5-7 प्रतिशत की कटौती होती थी। लेकिन कोरोना में ऐसा देखा गया है कि अस्पताल से कुछ ऐसी चीजों को क्लेम किया जा रहा जो उसमें है ही नहीं। इसलिए कोरोना के मामले में हम 15-20 प्रतिशत तक बिल कम पास कर रहे हैं।

मेहमान का चाय पानी बीमा में शामिल नहीं

मान लीजिए अस्पताल में कोई मेहमान आ गया। उसका भी चाय पानी का बिल उसी क्लेम में जोडा जा रहा है जो कि देय नहीं है। कोरोना में ऐसा देखा गया है कि अस्पताल कई बार साफ सफाई, सैनिटाइजर और अन्य चार्ज लगा रहे हैं। यह हमारी पॉलिसी में नहीं है। यह तो अस्पताल का खर्चा है।इंश्योरेंस कंपनियां कहती हैं कि किसी भी दिक्कत से पहले पॉलिसीधारकों को ही अस्पताल से यह पता करना चाहिए कि वह किस किस बात का चार्ज लगा रहा है। यह दिक्कत वहीं हल हो सकती है। चूंकि मरीज कुछ पूछता नहीं है और अस्पताल कुछ भी मनमाने बिल लगाकर क्लेम कर देते हैं।

यह बहुत बड़ा मुद्दा है। ऐसा देखा गया है कि पीपीई किट कवर तो है, लेकिन ग्लव्स जैसी चीजों के लिए अलग से क्लेम हो रहा है। मान लीजिए हमने रूम लिया तो उसमें चद्दर और तकिया का चार्ज अलग थोड़े होगा।

काफी सारे चार्ज बिल में लग रहे हैं

कंपनियां कहती हैं कि काफी सारे चार्जेस बिल में आने लगे हैं। यह नियमों के अनुकूल पेयबल नहीं हैं। सारी बीमा कंपनियों ने फैसला किया था कि पीपीई किट का चार्ज देंगे और वो कवर है। लेकिन उसके नाम पर अतिरिक्त चार्ज कैसे देंगे? उधर अस्पतालों का कहना है कि वे सरकार के या बीमा कंपनियों के चार्ज पर काम नहीं कर सकते हैं क्योंकि खर्चे ज्यादा हैं। कुछ बीमा कंपनियां तो जीआई काउंसिल की दरों की बजाय जो पहले से तय की हैं, उसी के अनुसार अस्पतालों को पैसा दे रही हैं। पर अस्पताल और बीमा के बीच मरीज के पास कोई रास्ता नहीं है।

अगर आपके पास पैसा है तो आपका इलाज होगा, नहीं है तो अस्पताल कोई दया नहीं दिखाएंगे। बता दें कि बीमा नियामक आईआरडीएआई ने 10 जुलाई को कोरोना कवच लांच करने का आदेश बीमा कंपनियों को दिया था।

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