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गेहूं एक्सपोर्ट बैन से दुनिया में हलचल:G-7 ने की भारत के फैसले की आलोचना, जर्मनी के कृषि मंत्री बोले- इससे गहरा जाएगा संकट

नई दिल्ली3 महीने पहले
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रुस-यूक्रेन जंग के बीच भारत के गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन लगाने से दुनियाभर में हलचल मच गई है। G-7 देशों के ग्रुप ने भारत सरकार के इस फैसले की आलोचना की है। जर्मनी के कृषि मंत्री केम ओजडेमिर ने कहा है कि भारत के इस कदम से दुनियाभर में कमोडिटी की कीमतों का संकट और ज्यादा बढ़ जाएगा। अगले महीने जर्मनी में जी-7 शिखर सम्मेलन में इस मुद्दे को उठाया जाएगा। इस सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भाग लेंगे।

रूस और यूक्रेन दोनों देश गेहूं के बड़े एक्सपोर्टर है और फरवरी में यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के बाद सप्लाई की चिंताओं से वैश्विक गेहूं की कीमतें बढ़ गई हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं के दाम 60% तक बढ़े हैं। भारत गेहूं उत्पादन के मामले में दूनिया में दूसरे नंबर पर है। यहां सालाना लगभग 107.59 मिलियन टन गेहूं का उत्पादन होता है। इसका एक बड़ा हिस्सा घरेलू खपत में जाता है। भारत में प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान, बिहार और गुजरात हैं।

भारत ने गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन क्यों लगाया?
गेहूं एक्सपोर्ट पर बैन लगाने के दो प्रमुख कारण हैं। पहला- गेहूं की सरकारी खरीद कम हुई है। दूसरा- मौसम की मार से गेहूं की फसल पर असर पड़ा है, जिस वजह से पैदावार कम हुई है। ऐसी स्थिति में देश के सामने यह आशंका खड़ी हो गई थी कि कहीं आने वाले समय में गेहूं के भंडार खाली न हो जाएं। सरकार ने यह भी साफ किया है कि जिन कंपनियों-फर्मों को 13 मई तक लेटर ऑफ क्रेडिट (एलओसी) मिल चुके हैं, वे निर्यात कर सकेंगे।

हालांकि, ये नहीं बताया है कि कितनी कंपनियों को 13 मई तक एलओसी मिल चुके थे। सरकारी अधिसूचना में कहा गया है कि कई कारणों से दुनिया में गेहूं की कीमतों में उछाल आया है। इससे भारत सहित पड़ोसी देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा हो गया है। इसे ध्यान में रखते हुए निर्यात पर रोक का फैसला लिया गया है।

पिछले महीने 15 तारीख को केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि 2022-23 में गेहूं का निर्यात 100 लाख टन पार कर जाएगा। लेकिन, अब सरकार का रुख बदलने से कुछ किसान संगठनों ने विरोध जताया है। उनका कहना है कि इस फैसले से गेहूं के दाम घटेंगे, जिससे किसानों को नुकसान होगा। हालांकि, कुछ संगठनों का कहना है कि इससे आम लोगों को गेहूं उचित कीमत पर मिलेगा।

एक्सपोर्ट पर रोक नहीं लगाते तो क्या होता?
एक्सपोर्ट पर अगर सरकार रोक नहीं लगाती तो 2006-07 जैसे हालात बन सकते थे। उस समय हमें गेहूं इंपोर्ट करना पड़ा था। वो भी लगभग डेढ़ गुना ज्यादा कीमत पर। रोक नहीं लगती तो भारत में गेहूं के दाम 3000 रुपए प्रति क्विंटल तक उछल सकते थे, जो अभी 2300 रु. के करीब है। आप सोचिए कि अभी देश में गेहूं की कमी नहीं है, फिर भी दाम बढ़ गए हैं। अगर बाद में कमी पड़ती तो क्या हालात होते।

कंपनियों के नाम बताए सरकार
आर्थिक विशेषज्ञ अंशुमान तिवारी ने कहा कि सरकार ने बेशक कीमतें थामने की बात कहते हुए गेहूं के निर्यात पर रोक लगाई है। लेकिन, सरकार को यह भी सार्वजनिक करना चाहिए कि किन कंपनियों को लेटर ऑफ क्रेडिट जारी हुए हैं। ताकि किसी के मन में यह आशंका न रहे कि कुछ चुनिंदा कंपनियां ही निर्यात करेंगी। इसकी सूची व्यापार महानिदेशालय के पास मौजूद है।