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महामारी पड़ी युवाओं पर भारी:कोविड-19 से सबसे ज्यादा नौकरियां युवाओं की गई, बढ़ा वर्कफोर्स में 40 से ज्यादा उम्र वालों का पर्सेंटेज

4 महीने पहले
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कोरोनावायरस के चलते हुए लॉकडाउन में नौकरियों का सबसे ज्यादा नुकसान 40 साल के कम उम्र के लोगों को हुआ है। इससे जो लोग नौकरी में अभी बने हुए हैं, उनमें 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का पर्सेंटेज बढ़ गया है। वर्कफोर्स में बना यह ट्रेंड मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में स्ट्रॉन्ग इकोनॉमिक रिकवरी के लिए अच्छा नहीं है। ये बातें सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इकोनॉमी (CMIE) ने अपने वीकली एनालिसिस में कही हैं।

सबसे ज्यादा नुकसान फीमेल वर्कर्स को उठाना पड़ा है

CMIE ने अपने एनालिसिस में एक और परेशान करने वाली बात का जिक्र किया है। उसके मुताबिक, सबसे ज्यादा जॉब लॉस शहरी इलाकों में हुआ है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान कम उम्र के वर्कर्स और उनमें भी फीमेल वर्कर्स को उठाना पड़ा है। जॉब लॉस को अगर एडुकेशन लेवल के हिसाब से देखें तो ज्यादा मार ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट्स पर पड़ी है।

वर्क फोर्स में 40 साल से ज्यादा के लोगों का पर्सेंटेज बढ़ा

वित्त वर्ष 2020-21 में दिसंबर तक वर्क फोर्स में 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का पर्सेंटेज बढ़कर 60% हो गया है। CMIE के एनालिसिस के मुताबिक 2019-20 में टोटल वर्क फोर्स में 40 साल से ज्यादा उम्र के लोगों का पर्सेंटेज 56% था। इसका मतलब कोविड-19 के चलते वर्कफोर्स में कम उम्र के लोगों की संख्या सालाना आधार पर घटी है। CMIE के मुताबिक वर्कफोर्स में बड़ी उम्र के लोगों की संख्या बढ़ना दूसरी मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी छमाही या आगे इकोनॉमिक ग्रोथ के लिए सही नहीं है।

40 साल से कम उम्र के वर्कर्स के बीच ज्यादा जॉब लॉस

CMIE के मुताबिक, सबसे ज्यादा जॉब लॉस 40 साल से कम उम्र के वर्कर्स के बीच रहा है। इससे कम के हर एज ग्रुप के वर्कर्स के लिए रोजगार के मौके दिसंबर 2020 तक घटे हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में दिसंबर तक 20 से 30 साल के वर्कर्स को 80% जॉब लॉस का सामना करना पड़ा। इस दौरान 30 से 40 साल तक के वर्कर्स के बीच जॉब लॉस पर्सेंटेज 48% रहा।

जून तिमाही में GDP 23.9% घटा, नौकरियां 18.4% घटी

वीकली एनालिसिस में CMIE ने यह भी पाया कि वित्त वर्ष 2021 में दिसंबर तक रोजगार के कुल 1.47 करोड़ मौके सालाना आधार पर घटे थे। जहां तक इकॉनमी की बात है तो जून तिमाही में GDP जब 23.9% घटा था, तब नौकरियों में 18.4% की गिरावट आई थी। GDP जब सितंबर तिमाही में 7.7% घटा तब नौकरियों में 2.6% की कमी हुई थी। दिसंबर क्वॉर्टर में रोजगार के मौके 2.8% घटे हैं।

इस वित्त वर्ष दिसंबर तक 34% जॉब लॉस शहरों में हुआ

वीकली एनालिसिस में CMIE ने पाया कि 2019-20 में 32 पर्सेंट नौकरियां शहरी इलाकों में थीं। उन इलाकों में इस वित्त वर्ष दिसंबर तक 34% जॉब लॉस हुआ। CMIE के मुताबिक, इसमें कोई शक नहीं कि शहरी इलाकों में बेहतर रोजगार मिलते हैं। ऐसे में यहां ज्यादा जॉब लॉस होना इकोनॉमिक रिकवरी प्रोसेस के लिए अच्छा नहीं है।

फीमेल का पर्सेंटेज सिर्फ 11% है, लेकिन जॉब लॉस 52%

CMIE का यह भी कहना है कि यूं तो वर्कफोर्स में फीमेल का पर्सेंटेज सिर्फ 11% है, लेकिन उनमें जॉब लॉस 52% रहा है। उसके मुताबिक, 'इकोनॉमिक ग्रोथ में तेजी वर्कफोर्स में महिलाओं के पर्सेंटेज में बढ़ोतरी पर निर्भर करती है। पहले डीमॉनेटाइजेशन और अब कोविड-19 के चलते हुए लॉकडाउन में ज्यादा जॉब लॉस इनको हुआ है।'

दिसंबर में पिछले साल से 4.2 पर्सेंट घटे हैं रोजगार मौके

CMIE को एनालिसस में यह भी पता चला कि रिकवरी के शुरुआती महीनों यानी मई और जून में रोजगार में मासिक बढ़ोतरी हुई। लेकिन बाद के तीन महीनों यानी जुलाई, अगस्त और सितंबर में रोजगार बढ़ने की रफ्तार कम हो गई। CMIE के आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में रोजगार के मौके हर महीने घटे। दिसंबर में ये आंकड़े पिछले साल से 4.2 पर्सेंट कम घटे थे।

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