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कॉलम / एमएसपी बढ़ने का महंगाई पर ज्यादा असर नहीं होगा- धर्मकीर्ति जोशी



धर्मकीर्ति जोशी, चीफ इकोनॉमिस्ट, क्रिसिल धर्मकीर्ति जोशी, चीफ इकोनॉमिस्ट, क्रिसिल
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धर्मकीर्ति जोशी, चीफ इकोनॉमिस्ट, क्रिसिलधर्मकीर्ति जोशी, चीफ इकोनॉमिस्ट, क्रिसिल

Dainik Bhaskar

Oct 12, 2018, 05:15 PM IST

नई दिल्ली. मानसून इस साल दीर्घकालीन औसत से 9% कम रहा है। मौसम विभाग दीर्घकालीन औसत से 10% कम या ज्यादा को सामान्य मानता है। इस लिहाज से 2018 सामान्य मानसून का लगातार तीसरा साल है। 2010 से 2013 तक चार साल सामान्य बारिश हुई थी। इससे कृषि विकास दर 4.7% तक पहुंची थी। इस साल बारिश का वितरण आसमान रहा। फसलें न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से कम दाम पर बिक रही हैं। इससे किसानों की कमाई प्रभावित हुई है। लेकिन कृषि का कुल उत्पादन बढ़ने से खाने-पीने की चीजों की महंगाई नियंत्रित रहने की संभावना है। 

 

पूर्व में बारिश 24% कम: जून में उत्तर-पश्चिम और पूर्वी राज्यों (बिहार, प. बंगाल) को छोड़कर बाकी देश में बारिश हुई। पूर्वी इलाके में तो सीजन 24% कमी के साथ खत्म हुआ। उत्तर-पश्चिम में सितंबर में बारिश ने रफ्तार पकड़ी लेकिन गुजरात, हरियाणा और पंजाब में जुलाई-अगस्त के दौरान मानसून की आंख-मिचौली चलती रही। हरियाणा और पंजाब में तो सिंचाई से स्थिति सुधर गई लेकिन गुजरात पर इसका बुरा असर हुआ। 

 

ज्वार-बाजरा की बुवाई 15% तक घटी: 27 सितंबर को 91 बड़े जलाशयों में क्षमता का 76% पानी था। यह 10 साल के औसत से ज्यादा है। सितंबर की शुरूआत में कुछ इलाकों में तेज बारिश के कारण इन जलाशयों में पानी बढ़ा है। ज्यादातर राज्यों के जलाशयों में पर्याप्त पानी है, लेकिन गुजरात, पश्चिम बंगाल और महाराष्ट्र में कमी है। इन राज्यों में बारिश भी कम हुई। फसल के लिहाज से मूंगफली, कपास, अरहर, ज्वार और बाजरा के लिए थोड़ी समस्या दिख रही है। अग्रिम अनुमानों के अनुसार ज्वार और बाजरा की बुवाई 10-15%, मूंगफली की 16%, कपास की 7% और अरहर की 4% कम हुई है। हालांकि इसके बावजूद खरीफ उत्पादन का अनुमान पिछले साल से बेहतर है। कृषि क्षेत्र में हम 2018-19 के दौरान 3% ग्रोथ देख सकते हैं। 

 

किसानों को फसल की कम कीमत मिल रही है: सरकार ने एमएसपी बढ़ाया है और खरीफ उत्पादन बढ़ने का भी अनुमान है। इसके बावजूद किसानों की कमाई अभी तक नहीं बढ़ी है। मंडियों में दाम एमएसपी से कम चल रहे हैं। ग्रामीण इलाकों में दूसरी फसलों में बेहतरी के संकेत हैं। इस साल 37% कृषि आय फलों, सब्जियों, दूध, पोल्ट्री और मछली पालन से हुई है। फलों और सब्जियों के दाम कम हैं लेकिन बाकी की कीमतें पिछले साल से अधिक हैं। ग्रामीण इलाकों में 52% परिवार अब कमाई के लिए गैर कृषि स्रोतों पर निर्भर हैं। नाबार्ड के अनुसार खेतिहर परिवारों में भी 65% मासिक कमाई गैर-खेती कार्यों से हो रही है। इसमें 34% दिहाड़ी मजदूरी से और 16% सरकारी या निजी सेवाओं से है। कंस्ट्रक्शन गतिविधियों (प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और मनरेगा) के तहत सड़क और हाउसिंग के कारण गैर-कृषि आय बढ़ी है। दो साल से मनरेगा का 60% काम सड़क और घर बनाने में ही हो रहा है। हालांकि औसत दैनिक मजदूरी अब भी हर साल 2.5% ही बढ़ रही है। 

 

टू व्हीलर, ट्रैक्टर की बिक्री बढ़ी: ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर और कनेक्टिविटी बेहतर बनाने पर सरकार के जोर और नोटबंदी का असर कम होने से ग्रामीण इलाकों में डिमांड बढ़ रही है। टू व्हीलर और ट्रैक्टर की बिक्री इसके उदाहरण हैं। टू व्हीलर की बिक्री 2017-18 और 2018-19 (अगस्त तक) में 10-15% बढ़ी है। ट्रैक्टर की बिक्री में 20% से ज्यादा ग्रोथ है। एमएसपी बढ़ने के शोर-शराबे के बावजूद हमें इस साल खाद्य महंगाई पर इसका खास असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। जिन 13 खरीफ फसलों का एमएसपी बढ़ाया गया खुदरा महंगाई में उनकी वेटेज सिर्फ 5% है। इसलिए असर हुआ भी तो खुदरा महंगाई दर इसकी वजह से सिर्फ 0.5% बढ़ेगी।

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