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PM किसान सम्मान निधि:क्या है इसका अर्थशास्त्र, क्यों नहीं है ये किसान की हर समस्या का समाधान!

मुंबई4 महीने पहले
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  • PM किसान सम्मान निधि की पहली किश्त फरवरी 2019 में जारी की गई थी
  • इसके तहत हर 4 महीने में किसानों को 2 हजार रुपए की रकम मिलती है

देश में शुक्रवार को 9 करोड़ किसानों को साल की आखिरी और सातवीं किश्त के तहत 18 हजार करोड़ रुपए दिए गए हैं। सरकारी तंत्र ने बड़े पैमाने पर इसका प्रचार-प्रसार किया। लेकिन, जिसे किसानों का सम्मान बताकर ढोल पीटा जा रहा है, दरअसल वह न तो सम्मानजनक है और न ही आवश्यक निधि। ऐसे में PM किसान सम्मान निधि योजना दिखावा मात्र बनकर रह गई है।

बात करते हैं पहले सम्मान के शुरुआत की
साल 2018 में इसकी बुनियाद रखी गई थी। केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के घर पर कुल 22 लोगों की बैठक हुई। इसमें मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, कुछ इंडस्ट्रियलिस्ट और किसानों के चार नेता शामिल थे। किसान नेताओं की अगुवाई छत्तीसगढ़ के बस्तर के किसान डॉ. राजाराम त्रिपाठी ने की थी।

राजनाथ के घर बना घोषणा पत्र
राजाराम त्रिपाठी अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के संयोजक हैं। इसमें 45 किसान संगठन हैं। राजनाथ के घर पर ही घोषणा पत्र बना। इस घोषणा पत्र में राजाराम त्रिपाठी ने सलाह दी कि किसानों को सालाना 24 हजार रुपए की मदद दी जाए।

कहानी कुछ ऐसी है
इसके पीछे की कहानी कुछ ऐसी है कि बैठक में त्रिपाठी ने कहा कि जब किसान कमजोर हो जाता है, काम नहीं कर पाता है, तब उसके ही घर में उसकी इज्जत नहीं होती है। बुढ़ापा बहुत मुश्किल से गुजरता है। उसे सताया जाता है। 60 साल किसानी करने के बाद ऐसी स्थिति के लिए उसे महीने का 2 हजार रुपए मिल जाए, तो घर में उसका सम्मान बना रहेगा।

6 घंटे तक चली मीटिंग
6 घंटे की इस मीटिंग में यह सलाह दी गई कि सब्सिडी की बजाय सीधे किसानों को अगर यह रकम मिल जाए, तो वह इस रकम को खेती में ही लगाएगा और अनाज का उत्पादन अच्छा होगा। हालांकि तेलंगाना सरकार पहले ही किसानों को सालाना 16 हजार रुपए देती है। उनका प्रस्ताव तो माना गया, लेकिन इसे 24 हजार की जगह 6 हजार रुपए सालाना कर दिया गया। इसे एक साल बाद यानी 2019 फरवरी में लागू किया गया।

इससे परेशानी हल नहीं होती है
दरअसल यह महीने की 500 रुपए की रकम है। गांवों में जो किसान रहता है, उसे महीने में यह रकम लेने के लिए 2-3 बार बैंक जाना होता है। क्योंकि, बैंक एक बार में 100-200 लोगों को ही पैसे देता है। अगर कोई किसान दो बार भी इस रकम के लिए बैंक गया तो उसकी दो दिन की मजदूरी ही 600 रुपए हो गई। फिर आने-जाने का किराया अलग। ऐसे में इतनी छोटी रकम देना या न देना, कोई मायने नहीं रखता है। हालांकि, यही रकम अगर एक बार में मिल जाए तो उपयोगी हो सकती है। किसान का बैंक में चक्कर काटने का समय भी बच जाएगा।

सरकार किसानों को नाम के लिए निधि तो दे रही है, लेकिन वह सम्मानजनक नहीं है। दूसरी ओर, पिछले ही साल आरटीआई से जानकारी मिली कि रिजर्व बैंक ने केवल 60 उद्योगपतियों के 70,000 करोड़ रुपए के कर्ज को राइट ऑफ कर दिया, जो नौ करोड़ किसानों को साल भर में मिली रकम 54,000 करोड़ से 16,000 करोड़ रुपए ज्यादा है। लेकिन, प्रचार ऐसा है कि देश में किसानों को ही सब कुछ मिल रहा है।

किसानों की प्रमुख मांगे क्या हैं?
किसानों की मांग यह है कि जो कम से कम मूल्य समर्थन (MSP) है, उसमें एक तय प्राइस की जाए कि इससे कम में कोई व्यापारी हो या सरकार हो, फसल को नहीं खरीदेगी। सरकार कह तो रही है कि ऐसा होगा, लेकिन वह इस पर अध्यादेश नहीं ला रही है। इसलिए इसमें असली पेंच यहीं पर है। साथ ही बिल को होल्ड कर दिया जाए। अगर इतना सा ही सरकार मान ले, तो आंदोलन खत्म हो जाएगा।

सरकार केवल 7% फसल खरीदती है
सरकार अभी एमएसपी पर किसानों की सिर्फ 7% फसल ही खरीदती है। ऐसी कोई मांग नहीं है कि फसल सरकार ही खरीदे। अगर यह कानून बन जाए, तो व्यापारी भी फसल खरीदेगा, तो किसानों को अच्छी रकम मिलेगी। 16 रुपए प्रति किलो गेहूं बिकता है, जबकि कंपनियां उसी गेहूं का आंटा 45-50 रुपए किलो दे रही हैं। यह डबल से भी ज्यादा मुनाफा है।

विदेशों में सीनियर सिटिजन को पेंशन
जापान में 60 साल के बाद सभी को चाहे वह किसान हो या कोई और, 70 हजार रुपए मासिक पेंशन दी जाती है। इसे हम सामाजिक सुरक्षा कहते हैं। अमेरिका में 60 हजार रुपए मासिक रकम इसके तहत दी जाती है। यहां ग्रेड के आधार पर यह दिया जाता है। यानी जो जितना ज्यादा टैक्स भरता है, उसको उतना ज्यादा यह पैसा मिलता है। यही कारण है कि अमेरिका में लोगों की ज्यादा टैक्स देने की होड़ लगी रहती है। जबकि भारत में यह 500 रुपए है, वह भी केवल किसानों को लुभाने के नाम पर है। हमारे यहां सामाजिक सुरक्षा तो है ही नहीं। अगर देना है तो कम से कम इतना दिया जाए कि उसका कोई उपयोग हो।

किसानों की मांग है कि अगर देश में न्यूनतम मजदूरी तय है तो फिर MSP क्यों नहीं तय हो सकता है? सरकार को ये करना चाहिए।

थाईलैंड और मलेशिया में कांट्रैक्ट फार्मिंग की स्थिति
थाईलैंड में कांट्रैक्ट फार्मिंग में किसान जमकर भाग लेते हैं। यहां जो कांट्रैक्ट फार्मिंग का सिस्टम है, उसमें दो वजहों से किसान भाग लेता है। पहला कि इससे 52 पर्सेंट बाजार सुनिश्चित होते हैं। कीमतों में 46 पर्सेंट की स्थिरता होती है। साउथ एशियन इकोनॉमी से पता चलता है कि कांट्रैक्ट फार्मिंग स्कीम मलेशिया में 2 कारणों से बहुत ज्यादा सफल है। पहला कारण सरकार ने फेडरल लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी सेट अप किया है। दूसरा यही अथॉरिटी कांट्रैक्ट फार्मिंग का प्रबंधन करती है।

पंजाब में ज्यादा विरोध क्यों है?
दरअसल यह पूरा मामला राज्यों के टैक्स से जुड़ा है। उनको डर है कि नए कानून से उनका टैक्स खत्म हो जाएगा। उदाहरण के तौर पर पंजाब को सालाना मंडी के टैक्स और फीस से 3,500 करोड़ रुपए मिलता है। इसमें छह पर्सेंट मंडी टैक्स और 2.5 पर्सेंट सेंट्रल प्रिक्योरमेंट को हैंडलिंग करने का चार्ज लिया जाता है।

किसानों की आत्महत्या में पंजाब सबसे पीछे
किसानों की आत्महत्या की बात करें, तो 2019 में देश में कुल किसानों की आत्महत्या में पंजाब का हिस्सा केवल 3% था। जबकि किसानों के आंदोलन में पंजाब की ही भूमिका अहम है। छत्तीसगढ़ के 6%, तेलंगाना के 6%, मध्य प्रदेश के 8%, आंध्र प्रदेश के 12% कर्नाटक के 22% किसानों ने आत्महत्या की थी। महाराष्ट्र टॉप पर रहा जहां 45% किसानों ने आत्महत्या की। दिलचस्प यह रहा कि महाराष्ट्र और कर्नाटक की तुलना में पंजाब के कृषि हाउस होल्ड की आय 2.3 गुना ज्यादा रही है।

आंकड़े बताते हैं कि 2015 में कुल 11,584 किसानों ने, 2016 में 11,379, 2017 में 10,655, 2018 में 10,349 और 2019 में 10,269 किसानों ने आत्महत्या की थी।

किसानों का क्रेडिट कार्ड
अब किसानों क्रेडिट कार्ड के बकाया को देखते हैं। पंजाब में प्रति किसान क्रेडिट कार्ड पर 2,93,288 रुपए का बकाया है। हरियाणा में यह 211,577 रुपए, राजस्थान में 141,583 रुपए, उत्तर प्रदेश में 98,722 रुपए, मध्य प्रदेश में 96,146 रुपए, छत्तीसगढ़ में 57,488 रुपए और महाराष्ट्र में 96,523 रुपए बकाया है। मार्च 2020 तक किसानों के क्रेडिट कार्ड का कुल बकाया 7,095 अरब रुपए रहा है। इसमें 6.7 करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड हैं।

MSP को फ्लोर प्राइस बनाना बाजार के लिए नुकसानदेह
SBI के रिसर्च के मुताबिक, किसानों की मांग के हिसाब से MSP को मंडी के भीतर और बाहर दोनों जगह के लिए फ्लोर प्राइस के तौर पर लागू करना बाजार के लिए नुकसानदेह होगा। इससे खरीदार बिदकेंगे, क्योंकि अगर सभी एक रेट पर माल लेंगे तो उनका इन्सेंटिव या काम्पटीटिव एज नहीं रहेगा। ऐसे में कुछ खरीदार तिकड़म लगाकर बहुत से छोटे किसानों से कम दाम पर खरीदारी करने की जुगत लगाएंगे।

SBI ने ऐसे में किसानों की समस्या का समाधान करने के लिए पांच उपाय बताए हैं।

1- पांच साल का क्वांटिटी गारंटी क्लॉज
किसान प्राइस गारंटी के तौर पर जो MSP मांग रहे हैं उसके बजाय सरकार कानून में कम से कम पांच साल के लिए क्वांटिटी गारंटी क्लॉज जोड़ सकती है। इसके हिसाब से वह लगातार पांच साल तक किसानों के कुल उत्पादन का उतना प्रतिशत उपज खरीदती रहेगी, जितना उसने पिछले साल खरीदा था। इसके साथ ही वह बाढ़ और सूखे वाली स्थिति में किसानों की आजीविका के लिए उपाय कर सकती है। फसलों की सरकारी खरीदारी के हालिया आंकड़े बताते हैं कि कुल गेहूं उत्पादन का 25 से 35% हिस्सा ही वह खरीदती रही है। गेहूं की सबसे ज्यादा खरीदारी पंजाब और हरियाणा के किसानों से होती रही है।

2- eNAM मार्केट के लिए नीलामी का फ्लोर प्राइस
सरकार मिनिमम सपोर्ट प्राइस को नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (eNAM) में होने वाली नीलामी के लिए फ्लोर प्राइस बना सकती है। लेकिन इससे समस्या पूरी तरह दूर नहीं होगी, क्योंकि मौजूदा डेटा के मुताबिक (eNAM) मंडियों का औसत मॉडल प्राइस उड़द को छोड़कर सभी कमोडिटी की MSP से कम है।

3- APMC मार्केट व्यवस्था को मजबूत करती रह सकती है
APMC मार्केट वाली व्यवस्था के ढांचे को मजबूत बनाने की कवायद जारी रखी जा सकती है। सरकार की एक रिपोर्ट के हिसाब से फसल की कटाई और उसके बाद अनाज के रखरखाव की दिक्कतों से लगभग 27,000 करोड़ रुपए सालाना का नुकसान होता है। इन दिक्कतों के चलते तिलहन का 10,000 करोड़ रुपए जबकि दलहन 5000 करोड़ रुपए का नुकसान होता है।

4- कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए एक संस्था बना सकती है
सरकार देश में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग (ठेका पर खेती) के लिए एक संस्था बना सकती है, जिसके पास कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए होनेवाली प्राइस डिस्कवरी पर नजर रखने का विशेष अधिकार हो सकता है। कई देशों में किसानों को टेक्निकल असिस्टेंस के साथ मार्केट के सप्लाई चेन का एक्सेस मुहैया कराने और कीमतों में स्थिरता का लाभ दिलाने में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का अहम रोल रहा है। थाईलैंड का अनुभव बताता है कि बाजार में निश्चितता और दाम में स्थिरता ने वहां के किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अपनाने के लिए बढ़ावा दिया है।

5-किसान क्रेडिट कार्ड के नॉर्म्स में बदलाव कर सकती है
सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के नियमों में बदलाव करने के बारे में भी सोच सकती है जिसके चलते बैंकों का एग्री पोर्टफोलियो पर बड़ा दबाव है। एसबीआई का कहना है कि किसान क्रेडिट कार्ड के रीपेमेंट नियम में बदलाव करने से किसानों की मासिक आय में 35% का उछाल आ सकता है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि इसमें जितना कम आउटस्टैंडिंग होता है, किसानों के आत्महत्या करने के आसार कम होते हैं।

तीनों बिल वापस लिए जाएं

किसानों के नेता राकेश टिकैत कहते हैं कि जब तक तीनों बिल वापस नहीं लिए जाते, तब तक हम आंदोलन खत्म नहीं करेंगे। वे कहते हैं कि हम सरकार से बात करने को तैयार हैं, पर सरकार बात नहीं कर रही है। हम यहां किसी को झुकाने नहीं आए हैं। हम तो सरकार के पास अपनी फरियाद लेकर आएं हैं। हम तो बस यही फरियाद कर रहे हैं कि तीनों किसान बिल वापस लिए जाएं और हमारे लिए MSP का कानून बनाया जाए, पर हमारी बात सरकार सुन ही नहीं रही है।

वे कहते हैं कि सरकार आने वाले समय में लैंड बैंक बनाना चाहती है, जो किसान कर्ज नहीं लौटा पाएगा उसकी जमीन लेकर कर्ज खत्म किया जाएगा। हम यह भी कहते आ रहे हैं कि किसान को कर्ज नहीं चाहिए। किसान को अपनी फसल की वाजिब कीमत चाहिए।

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