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ब्याज दरों में बढ़ोतरी के आसार नहीं:रेपो रेट को 4% पर बनाए रखा जा सकता है, लेकिन दिसंबर में बढ़ सकता है रिवर्स रेपो रेट

2 महीने पहले
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अगर आपने लोन लिया हुआ है या लेने के बारे में सोच रहे हैं, तो त्योहारी सीजन में वित्तीय संस्थानों से मिल रहे बैनिफिट का फायदा निश्चिंत होकर उठाएं। अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, रिजर्व बैंक (RBI) की शुक्रवार को मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की मीटिंग में ब्याज दर यानी रेपो रेट को 4% रहने दिया जा सकता है। लेकिन महंगाई पर रोकथाम के लिए इसमें बढ़ोतरी का फैसला लिया जाता है, जिसकी संभावना अभी नहीं बल्कि कम से कम दो तिमाही बाद ही है, तो आपके लोन के इंटरेस्ट रेट में देर-सबेर इजाफा होगा।

सिस्टम से एक्सेस फंड निकालने के लिए बढ़ाया जा सकता है रिवर्स रेपो रेट

ऐसे में भले ही रेपो रेट न बढ़े लेकिन वरिष्ठ अर्थशास्त्री वृंदा जागीरदार के मुताबिक रिवर्स रेपो रेट बढ़ाया जा सकता है। ऐसा होने पर बैंकिंग सिस्टम से एक्सेस फंड निकलेगा। रेपो रेट वह ब्याज दर होती है जिस पर RBI बैंकों को शॉर्ट टर्म लोन देता है। बैंकिंग सिस्टम में नकदी घटाने बढ़ाने के लिए RBI के पास एक और पॉलिसी टूल होता है- रिवर्स रेपो रेट। यह वो रेट होता है जो RBI अपने पास जमा कराए जाने वाले फंड पर बैंकों को ऑफर करता है।

सिस्टम में नकदी पर कंट्रोल के लिए दूसरे उपायों का ऐलान हो सकता है

डॉ जागीरदार के मुताबिक सरकार का फोकस ग्रोथ के साथ महंगाई पर भी बना हुआ है। ऐसे में वह रेपो रेट में कटौती तो नहीं करेगा, लेकिन महंगाई लंबे समय तक ऊंची रही तो इस बारे में सोचने पर मजबूर जरूर हो सकता है। उनके मुताबिक, RBI सिस्टम में नकदी पर कंट्रोल रखने के लिए दूसरे उपायों का ऐलान कर सकता है। इसके तहत वह GSAP यानी गवर्नमेंट सिक्योरिटीज एक्विजिशन प्लान को खत्म कर सकता है या उसमें धीरे-धीरे कमी कर सकता है।

सरकारी सिक्योरिटीज की खरीदारी को घटा या बंद कर सकता है RBI

सिस्टम में नकदी घटाने के लिए GSAP को समय आने पर बढ़ाने की बात कहकर RBI उसमें कमी कर सकता है। यह बात HDFC बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट अभीक बरुआ ने कही है। गौरतलब है कि सरकार के भारी भरकम उधार लेने की योजना से डेट मार्केट में कोई हलचल न मचे, इसके लिए रिजर्व बैंक ने अप्रैल की शुरुआत में सरकारी सिक्योरिटी खरीदने की इस योजना का ऐलान किया था।

ग्रोथ एस्टीमेट तो नहीं, लेकिन महंगाई का अनुमान जरूर घट सकता है

बरुआ के मुताबिक, रिजर्व बैंक जीडीपी ग्रोथ के अनुमान में भी कोई बदलाव नहीं करेगा, लेकिन महंगाई के अनुमान में कमी जरूर कर सकता है। वह कहते हैं कि औसत महंगाई इस वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 5.1% और तीसरी तिमाही में 4.8% रह सकती है जबकि पूरे साल औसतन 5.35% रह सकती है। रिजर्व बैंक ने अगस्त के पॉलिसी रिव्यू में महंगाई दर सितंबर तिमाही में 5.9% और दिसंबर तिमाही में 5.3% रहने का अनुमान दिया था।

दूसरे तरीकों से पॉलिसी नॉर्मलाइजेशन की तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है

एमके रिसर्च के अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, RBI रिवर्स रेपो बढ़ाने से परहेज कर सकता है और दूसरे तरीके अपनाते हुए पॉलिसी नॉर्मलाइजेशन की तरफ कदम बढ़ा सकता है। उनका कहना है कि रिजर्व बैंक इकोनॉमिक रिकवरी को लेकर भरोसा बढ़ने का संकेत दे सकता है और महंगाई के अनुमान में 30-40 बेसिस पॉइंट की कमी कर सकता है। वह ग्लोबल कमोडिटी और क्रूड प्राइस में तेजी के अलावा तीसरी लहर के खतरे को लेकर आगाह भी कर सकता है।

मई 2020 में रेपो रेट घटाकर 4% और रिवर्स रेपो रेट 3.35% किया गया था

गौरतलब है कि कोविड के चलते पिछले साल जब इकोनॉमी के पहिए पूरी तरह थम गए थे तब रिजर्व बैंक ने ग्रोथ में रिकवरी लाने और उसको सपोर्ट देने के लिए मई में फौरी तौर पर रेपो रेट को 40 बेसिस पॉइंट घटाकर 4% कर दिया था। उसने रिवर्स रेपो रेट में भी 40 बेसिस पॉइंट की कटौती करके उसे 3.35% कर दिया था। जानकारों के मुताबिक, पॉलिसी नॉर्मलाइजेशन की शुरुआत रिवर्स रेपो रेट में बढ़ोतरी से की जा सकती है।

रिवर्स रेपो रेट में बढ़ोतरी से हो सकती है नॉर्मलाइजेशन की शुरुआत

यस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट इंद्रनील पान और PwC इंडिया के इकोनॉमिक एडवाइजरी सर्विसेज लीडर रनेन बनर्जी के मुताबिक, इंटरेस्ट रेट में बढ़ोतरी का दौर वित्त वर्ष 2023 की पहली तिमाही से शुरू हो सकता है। केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस का कहना है कि रिजर्व बैंक पहले रिवर्स रेपो रेट बढ़ाएगा। वह फरवरी की पॉलिसी में इसको बढ़ाकर 3.50% कर सकता है।

नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बढ़ाया जा सकता है रेपो रेट

क्वॉन्टइको रिसर्च की फाउंडर सुभदा राव भी मानती हैं कि रिजर्व बैंक आने वाले महीनों में रिवर्स रेपो रेट बढ़ा सकता है। उनके मुताबिक, दिसंबर से फरवरी के बीच रिवर्स रेपो रेट में 40 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की जा सकती है। रेपो रेट नए वित्त वर्ष की पहली तिमाही में बढ़ाया जा सकता है। महिंद्रा ग्रुप के चीफ इकोनॉमिस्ट सचिदानंद शुक्ला का मानना है कि अगले कैलेंडर ईयर के अंत तक हालात जस के तस रह सकते हैं।

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