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1.74 कर्मचारियों को कई महीने की सैलरी नहीं मिली, कांग्रेस सांसद ने कहा- सरकार बेल आउट पैकेज दे

2 वर्ष पहले
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  • कांग्रेस से राज्यसभा सांसद रिपुन बोरा ने कहा- बीएसएनएल के अलावा एमटीएनएल के 45 हजार कर्मचारियों को भी सैलरी नहीं मिली 
  • बीएसएनएल ने सरकार से कहा- जून की सैलरी के लिए भी रकम नहीं जुटा पा रहे, ऑपरेशन चलाना असंभव हुआ

नई दिल्ली. दूर संचार कंपनी बीएसएनएल के आर्थिक संकट का मुद्दा सोमवार को राज्यसभा में भी उठा। कांग्रेस सांसद रिपुन बोरा ने कहा कि बीएसएनएल के 1.74 लाख और एमटीएनएनल के 45 हजार कर्मचारियों को कई महीनों का वेतन नहीं मिला है। उन्होंने सरकार से अपील की कि मदद के लिए बेल आउट पैकेज दिया जाए। 

1) बीएसएनएल पर 13 हजार करोड़ का कर्ज

बोरा ने कहा- एक तरफ निजी कंपनियों को 4जी और 5जी स्पेक्ट्रम का आवंटन किया जा रहा है। दूसरी ओर दो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां अपनी सेवाएं 3जी स्पेक्ट्रम के जरिए देने पर मजबूर हैं। इन कंपनियों के कर्मचारियों को महीनों से वेतन नहीं मिला है। सरकार इनका घाटा कम करने और इन्हें पुनर्जीवित करने के लिए तुरंत कदम उठाए।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, बीएसएनएल ने भी सरकार से मदद की अपील की है। कंपनी ने कहा- हम जून माह में कर्मचािरयों के वेतन की 850 करोड़ की राशि भी नहीं जुटा पा रहे हैं। हमारे लिए कंपनी का ऑपरेशन चलाना करीब-करीब असंभव हो रहा है। 13 हजार करोड़ के कर्ज ने हमारे कारोबार को अस्थिर कर दिया है। 

रिपोर्ट में कहा गया कि पुनर्गठन को लेकर कई बार चर्चा के बावजूद सरकार किसी भी तरह का रोड मैप नहीं दे पाई है। कंपनी ने पिछले हफ्ते टेलीकॉम मिनिस्ट्री को लिखे एक पत्र में कहा था कि संकट में घिरी कंपनी का भविष्य तय करने के लिए आगे का एक्शन प्लान सुझाया जाए। 

लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बीएसएनएल की खराब हालत पर चिंता जाहिर की थी। इसके बाद कंपनी के चेयरमैन ने एक प्रेजेंटेशन भी तैयार किया। लेकिन, कोई पुख्ता हल नहीं निकल सका।

  • रिपोर्ट के मुताबिक, बीएसएनएल पर कर्मचारियों के वेतन और अन्य भत्तों का बोझ कमाई के मुकाबले काफी अधिक होता जा रहा है। वित्त वर्ष 2017-18 में कंपनी के ऑपरेटिंग रेवेन्यू का 66% हिस्सा कर्मचारियों के वेतन और अन्य भत्तों पर खर्च हुआ जबकि 2006 में यह सिर्फ 21% था। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, 2017-18 में एयरटेल ने इन वेतन और भत्तों पर ऑपरेटिंग रेवेन्यू का केवल 3% खर्च किया।
  • लचर मैनेजमेंट और सरकार के असमय हस्तक्षेप के अलावा कंपनी का आधुनिक तकनीक में पिछड़ना भी समस्या है। नवीनीकरण योजना में अभी भी देरी हो रही है। बीएसएनएल अभी भी 4जी सेवाएं नहीं दे पा रही है, जबकि सरकार 5जी लाने की तैयारियों में जुटी है।
  • 2004-5 के मुकाबले अब बीएसएनल का मोबाइल सब्सक्राइबर्स मार्केट शेयर आधा रह गया है। यह करीब 20% से घटकर अब 10% ही रह गया है। जियो, एयरटेल और वोडा-आइडिया जैसी निजी कंपनियों के मुकाबले बीएसएनएल का प्रति यूजर रेवेन्यू भी काफी घट गया है। 
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