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भास्कर इंटरव्यू:स्टील में और कमी की गुंजाइश नहीं, लेकिन स्टील के दामों में हो सकती है बढ़ोतरी

नई दिल्लीएक महीने पहलेलेखक: भीम सिंह मीणा
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बीते साल जोरदार उछाल देखने वाले स्टील के दाम तेजी से घटे हैं। हालांकि, कोयले की कमी से उत्पादन प्रभावित हो रहा है। कोयले की आपूर्ति घटने से बिजली संकट जैसे से हालात भी बन रहे हैं। जिंदल स्टील एंड पावर के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) वीआर शर्मा का कहना है कि स्टील में अब और गिरावट की गुंजाइश नहीं बची है। उल्टा यहां से दाम बढ़ जरूर सकते हैं। पेश है उनसे बातचीत के मुख्य अंश:

हाल के हफ्तों में स्टील के दाम तेजी से घटे हैं। इसकी क्या वजह है? यह ट्रेंड कब तक रहेगा?
मुख्य रूप से चीन में खपत घटने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्टील के दाम घटे हैं। मार्केट बॉटम पर आ गया है यानी अब इसमें और कमी की गुंजाइश नहीं बची है। यदि कोकिंग कोल और आयरन ओर की कीमतें कम नहीं होती हैं, तो जल्द स्टील के दाम बढ़ने शुरू हो जाएंगे।

स्टील मार्केट में डिमांड का आउटलुक कैसा है?
अभी मांग सुस्त पड़ी हुई है, लेकिन 10-15 दिन में रुझान पलट जाएगा। चीन में लॉकडाउन खुलेगा और स्टील की डिमांड बढ़ने लगेगी।

डॉलर के मुकाबले गिरते रुपए को आप कैसे देखते हैं?
भारत के लिए यह एक हद तक आपदा में अवसर की तरह है। कारण यह है कि आज की तारीख में भारत ट्रेड सरप्लस में है, यानी आयात के मुकाबले निर्यात ज्यादा हो रहा है। रुपया कमजोर होने से निर्यातकों को ज्यादा पेमेंट मिलता है। हालांकि, आयातित सामान पर कमजोर रुपए का 3-4% असर होगा और महंगाई भी बढ़ेगी। वैसे यह गिरावट अस्थायी है, यूक्रेन युद्ध खत्म होने के बाद पूरी दुनिया में एनर्जी के दाम घटेंगे और रुपए को सपोर्ट मिलेगा।

रूस-यूक्रेन युद्ध से भारतीय स्टील कंपनियों को यूरोप के बाजार क्या कोई फायदा है?
युद्ध से पहले रूस और यूक्रेन यूरोप काे सालाना 3 करोड़ टन स्टील निर्यात करते थे। अभी यह बंद हो गया है। इसके चलते यूरोप से हर माह 25 लाख टन स्टील की डिमांड निकल रही है। भारत यह जरूरत पूरी नहीं कर पा रहा है। युद्ध खत्म होने के बाद भी यह मांग बनी रहेगी। यूक्रेन को अपना इंफ्रास्ट्रक्चर दुरूस्त करने में कई साल लगेंगे। वहां स्टील प्लांट भी बर्बाद हो गए हैं। ऐसे में यूक्रेन को खुद स्टील आयात करना पड़ेगा, जो पहले नेट एक्सपोर्टर था।

रुपी-रुबल ट्रेड शुरू होने से क्या फायदा होगा?
काफी फायदा होगा। देश का भुगतान संतुलन मजबूत होगा। डॉलर की बचत होगी, जिसका इस्तेमाल भारत तेल-गैस जैसी एनर्जी खरीदने में करेगा।

देश में बिजली और कोयला संकट को आप कैसे देखते हैं?
देश में कोयले की कमी नहीं है। ऐसे में बिजली संकट नहीं आना चाहिए था। दरअसल 2012 से देश में नई कोल माइन का विकास बंद पड़ा है, जबकि बीते 10 साल में बिजली की मांग तेजी से बढ़ी है। अभी देश में सालाना 75 करोड़ टन कोयला निकल रहा है, यदि इसे 100 करोड़ टन तक पहुंचा दिया जाए है तब भी हमारा भंडार 350 साल चलेगा।

केंद्र ने 2030 तक 30 करोड़ टन स्टील उत्पादन का लक्ष्य रखा है। यह लक्ष्य हासिल हो पाएगा?
डिमांड की कोई कमी नहीं है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्टील की तगड़ी मांग बनी रहेगी, लेकिन प्लांट लगाने के लिए सरकार का सहयोग जरूरी है। यदि सरकार पूरा सहयोग करे तो यह लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।