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आंकड़े भी कहते हैं:किसानों के आंदोलन की वजह आर्थिक कम राजनीतिक ज्यादा लगती है

2 महीने पहले
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  • SBI की रिसर्च टीम ने खरीफ सीजन में फसलों की सरकारी खरीद के आधार पर किया आकलन
  • इस साल 11 दिसंबर तक 55 पर्सेंट तक पहुंच गई थी पंजाब में खरीफ फसल की सरकारी खरीद

नए कृषि विधेयक के खिलाफ किसानों के आंदोलन की वजह आर्थिक कम राजनीतिक ज्यादा लगती है। यह आकलन SBI की रिसर्च टीम ने खरीफ सीजन में फसलों की सरकारी खरीद के आधार पर किया है। उसके मुताबिक, 11 दिसंबर तक पंजाब में खरीफ फसल की सरकारी खरीद 55 पर्सेंट तक पहुंच गई थी। जबकि यह धान के उत्पादन के मामले में तीसरे नंबर पर आता है। उत्तर प्रदेश इस मामले में दूसरे नंबर पर है लेकिन इस साल यहां सिर्फ 8 पर्सेंट की खरीदारी हुई है।

MSP को फ्लोर प्राइस बनाना बाजार के लिए नुकसानदेह

SBI की रिसर्च टीम के मुताबिक, किसानों की मांग के हिसाब से MSP को मंडी के भीतर और बाहर दोनों जगह के लिए फ्लोर प्राइस के तौर पर लागू करना बाजार के लिए नुकसानदेह होगा। इससे खरीदार बिदकेंगे क्योंकि नैश इक्विलिब्रियम के हिसाब से अगर सभी एक रेट पर माल लेंगे तो उनका इनसेंटिव या कॉम्पिटिटिव एज नहीं रहेगा। ऐसे में कुछ बायर तिकड़म लगाएंगे और बहुत से छोटे किसानों से कम पर खरीदारी करने की जुगत लगाएंगे।

SBI ने ऐसे में किसानों की समस्या के समाधान के लिए पांच उपाय बताए हैं।

1 पांच साल का क्वॉन्टिटी गारंटी क्लॉज

किसान प्राइस गारंटी के तौर पर जो MSP मांग रहे हैं उसके बजाय सरकार कानून में कम से कम पांच साल के लिए क्वॉन्टिटी गारंटी क्लॉज जोड़ सकती है। इसके हिसाब से वह लगातार पांच साल तक किसानों के कुल उत्पादन का उतना प्रतिशत उपज खरीदती रहेगी, जितना उसने पिछले साल खरीदा था। इसके साथ ही वह बाढ़ और सूखे वाली स्थिति में किसानों की आजीविका के लिए उपाय कर सकती है। फसलों की सरकारी खरीदारी हालिया आंकड़े बताते हैं कि कुल गेहूं उत्पादन का 25 से 35 पर्सेंट हिस्सा ही वह खरीदती रही है। गेहूँ की सबसे ज्यादा खरीदारी पंजाब और हरियाणा के किसानों से होती रही है। पांच साल तक अब तक जितने प्रतिशत अनाज की सरकारी खरीद की गारंटी किसानों की फिक्र को काफी हद तक दूर कर देगी।

2 eNAM मार्केट के लिए नीलामी का फ्लोर प्राइस

सरकार मिनिमम सपोर्ट प्राइस को नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (eNAM) में होने वाली नीलामी के लिए फ्लोर प्राइस बना सकती है। लेकिन इससे समस्या पूरी तरह दूर नहीं होगी क्योंकि मौजूदा डेटा के मुताबिक (eNAM) मंडियों का औसत मॉडल प्राइस उड़द को छोड़कर सभी कमोडिटी के MSP से कम है।

3 APMC मार्केट व्यवस्था को मजबूत करती रह सकती है

APMC मार्केट वाली व्यवस्था के ढांचे को मजबूत बनाने की कवायद जारी रखी जा सकती है। सरकार की एक रिपोर्ट के हिसाब से फसल की कटाई और उसके बाद अनाज के रखरखाव की दिक्कतों से लगभग 27,000 करोड़ रुपये सालाना का लॉस होता है। इन दिक्कतों के चलते तिलहन का 10,000 करोड़ रुपये जबकि दलहन 5000 करोड़ रुपये का लॉस होता है।

4 कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए एक संस्था बनाा सकती है

सरकार देश में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के लिए एक संस्था बन सकती है जिसके पास कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के जरिए होनेवाली प्राइस डिस्कवरी पर नजर रखने का एक्सक्लूसिव राइट हो सकता है। कई देशों में किसानों को टेक्निकल असिस्टेंस के साथ मार्केट के सप्लाई चेन का एक्सेस मुहैया कराने और कीमतों में स्थिरता का लाभ दिलाने में कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का अहम रोल रहा है। थाईलैंड का अनुभव बताता है कि बाजार में निश्चितता और दाम में स्थिरता ने वहां के किसानों को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग अपनाने के लिए बढ़ावा दिया है।

5 किसान क्रेडिट कार्ड के नॉर्म्स में बदलाव कर सकती है

सरकार किसान क्रेडिट कार्ड के नॉर्म्स में बदलाव करने के बारे में भी सोच सकती है जिसके चलते बैंकों का एग्री पोर्टफोलियो पर बड़ा दबाव है। एसबीआई का कहना है कि किसान क्रेडिट कार्ड के रिपेमेंट नॉर्म्स में बदलाव करने से किसानों की मासिक आय में 35 पर्सेंट की उछाल आ सकती है। इसके आंकड़े यह भी बताते हैं कि इसमें जितना ज्यादा आउटस्टैंडिंग होता है, किसानों के आत्महत्या करने के आसार कम होते हैं।

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