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खास इंटरव्यू:3-4 महीने में इकोनॉमी और रोजगार पर दिखने लगेगा बजट का असर : चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर केवी सुब्रमण्यन

नई दिल्ली8 महीने पहले
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हाल में पेश बजट अर्थव्यवस्था की बुनियाद सुधारने का काम करेगा। अगले 3-4 महीने में इकोनॉमी में मांग और रोजगार बढ़ने लगेंगे। चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर केवी सुब्रमण्यन ने दैनिक भास्कर के अनिरुद्ध शर्मा और मुकेश कौशिक से साक्षात्कार में यह अनुमान व्यक्त किए। बातचीत के मुख्य अंश...

बजट के बाद से ही शेयर बाजार लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहा है, क्या बजट के प्रावधानों से उसी तरह रोजगार की स्थिति भी सुधरेगी?
जो भी स्थायी काम होते हैं, उसमें समय लगता है, बस थोड़ा सा सब्र रखना है। जब कंस्ट्रक्शन एक्टिविटी बढ़ती है तो संगठित व असंगठित क्षेत्र दोनों में रोजगार बढ़ता है। सरकार जब इतना निवेश करती है तो निजी क्षेत्र भी निवेश करता है। ये एक चक्र है। निवेश से उत्पादकता बढ़ती है, इससे रोजगार बनते हैं, रोजगार से लोगों के हाथ में पैसा आता है, इससे खपत बढ़ती है और खपत बढ़ता देख निजी क्षेत्र और निवेश करता है। पूंजी निवेश में सरकार ने अगले वित्त वर्ष में 24 फीसदी की बढ़ोतरी की है। इससे निश्चित ही रोजगार पैदा होंगे।

विनिवेश के कदम पर विपक्ष का आरोप है कि सरकार ‘फैमिली सिल्वर’ बेच रही है। क्या कहेंगे?
इसमें न फैमिली सही है, न सिल्वर सही है। भारत की जीडीपी में 90 फीसदी योगदान निजी क्षेत्र का है। यदि आप इसे परिवार में न जोड़ें तो निजी क्षेत्र खफा हो सकता है। आप ये तो नहीं कह सकते कि केवल सरकार ही परिवार है। अर्थव्यवस्था में परिवार निजी व सार्वजनिक क्षेत्र दोनों को मिलाकर बनता है। और, सिल्वर के मामले में, पिछले साल जब हमने प्राइवेटाइजेशन और वेल्थ क्रिएशन किया, उस सिलसिले में सबसे पहले जब भारत पेट्रोलियम के निजीकरण का एलान हुआ तो हमने भारत पेट्रोलियम व हिंदुस्तान पेट्रोलियम दोनों का स्टॉक प्राइस जारी किया जो करीब-करीब साथ-साथ चल रहे थे और जैसे ही निजीकरण का एलान हुआ, उसके अगले तीन-चार महीने में ही भारत पेट्रोलियम की वैल्यू में 35000 करोड़ रुपए का इजाफा हुआ। अब ये वैल्यू तो जुड़ गई न परिवार में, और इतना तो केवल निजीकरण के एलान से हुआ।

बजट में मध्यम वर्ग नौकरी-पेशा वालों के लिए कोई राहत नहीं दिखी,?
इस पर दो-तीन बात रखना चाहूंगा। पहली, किसी को यूं ही मछली मुहैया कराने की बजाय यदि उसे मछली पकड़ना सिखाएं तो ज्यादा दूरदर्शी कदम होगा। दूसरा, 137 करोड़ की आबादी के देश में जहां डेढ़ करोड़ से भी कम लोग करदाता हों तो इसे क्या नाम दें, क्या मध्यम वर्ग केवल देश की आबादी का एक प्रतिशत है। तीसरा, पिछले बजट में निजी टैक्स का काफी सरलीकरण किया गया, अब फिर उसमें यहां कुछ जोड़ दें, वहां कुछ जोड़ दें तो दोबारा खिचड़ी बन जाएगी, उससे बचना है।

मौजूदा सरकार की वह कौन सी आर्थिक सोच है जो पुरानी सरकारों से बिल्कुल अलग हटकर है?
हमने रेवेन्यू खर्च की सोच को कैपिटल खर्च के रास्ते पर डाला है। अर्थशास्त्र सीमित संसाधनों का सही व सबसे अच्छा इस्तेमाल है। यदि आप 100 रुपए ट्रांसफर में दे रहे हैं तो इकोनॉमी में 98 रुपए ही पहुंच पाता है। यदि यही 100 रुपए पूंजी खर्च में डालें तो वह उसी साल 250 रुपए इकोनॉमी में जोड़ता है और अगले दो-तीन सालों में कुल 450 रुपए इकोनॉमी में जुड़ते हैं। सरकार भी ज्यादा रिटर्न वाले क्षेत्रों में ही निवेश करती है।

सरकार कर्ज लेने से क्यों नहीं बचती, उसके खर्च में बड़ी मद ब्याज चुकाने में जाती है?
यदि आप 100 का ऋण लेते हैं 8 फीसदी पर और उसे निवेश करके 12 कमाते हैं तो असल में आप 4 फीसदी कमाते हैं। जब विकास दर बढ़ती है तो जीडीपी के अनुपात में कर्ज घटता है। इकोनॉमी में जब मंदी हो तो कर्ज लें लेकिन उसे सब्सिडी में न बांटें, उसका पूंजी निवेश करें जिसके दीर्घकालिक फायदे होते हैं।

पिछले कुछ वर्षों में इकोनॉमी के सामने तीन बड़े व्यवधान आए हैं, नोटबंदी, जीएसटी और अब कोरोना, इनसे क्या फायदे व नुकसान हुए?
शुरूआती दिक्कतें तो आईं लेकिन इन पर उठाए कदमों से दीर्घावधि लाभ हो रहे हैं। जीएसटी के फायदे आप साफ देख रहे हैं, पिछले कई महीनों से एक लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का रिकॉर्ड कलेक्शन हो रहा है। नोट बंदी से टैक्स बेस बढ़ा है, डिजिटल ट्रांजेक्शन बढ़ा है। कोरोना के बाद इकोनॉमी में वी-शेप रिकवरी दिख रही है।