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अगले साल से होगा बड़ा फेरबदल:असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए करनी होगी PhD, दो साल पहले लिया गया था फैसला, इस बार कोविड की वजह से टला

8 दिन पहले
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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने हाल में कहा कि असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा के लिए इस शैक्षणिक सत्र में PhD की योग्यता अनिवार्य नहीं होगी, लेकिन वर्ष 2022-23 से असिस्टेंट भर्ती परीक्षा में बैठने के लिए PhD की योग्यता अनिवार्य होगी। ऑल इंडिया सर्वे ऑन हायर एजुकेशन की रिपोर्ट के मुताबिक हर साल लगभग 40 लाख स्टूडेंट्स PG में प्रवेश लेते हैं, इनमें से करीब 2 लाख छात्र PhD में एडमिशन लेते हैं।

वर्ष 2019-20 की रिपोर्ट के मुताबिक 43.1 लाख छात्रों ने PG में दाखिला लिया, वहीं मात्र 2.02 लाख छात्रों ने PhD लेवल में प्रवेश लिया। AISHE की 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक 40.42 लाख छात्रों ने PG में प्रवेश लिया, जबकि इस साल PhD में प्रवेश लेने वाले छात्रों की संख्या मात्र 1,69,170 ही थी। हर साल यह आंकड़ा कमोबेश इतना ही रहता है।

सरकार के इस फैसले के बाद अब लगभग 39 लाख छात्रों के पास असिस्टेंट प्रोफेसर बनने का ऑप्शन नहीं रहेगा। केवल इस साल तक PG के वे छात्र जिन्होंने नेट क्वालिफाइ किया है असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती परीक्षा के लिए योग्य होंगे। असिस्टेंट प्रोफेसर बनने का सपना देखने वाले छात्रों को PG के बाद PhD में भी दाखिला लेना होगा।

2018 में लिया गया था फैसला, कोविड के कारण टला
वर्ष 2018 में शिक्षा मंत्रालय की ओर से कहा गया था कि विश्वविद्यालय व कॉलेजों में असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए शैक्षणिक सत्र 2021-22 से नेट क्वालिफाइ करने के साथ ही PhD की योग्यता भी अनिवार्य होगी। कोरोना को देखते हुए हाल में मंत्रालय ने अपने फैसले पर इस साल तक के लिए रोक लगा दी है, ताकि शिक्षण संस्थाओं में खाली टीचिंग स्टाफ के पदों को भरा जा सके।

जिन संस्थानों में शोध कार्य नहीं होता वहां के लिए मौजूदा व्यवस्था ही ठीक

BHU से PG की पढ़ाई पूरी कर चुके रोहित मिश्रा व उत्कर्ष सिंह के अनुसार, देश के कई ऐसे शिक्षण संस्थान हैं जहां केवल शिक्षण कार्यों पर ही जोर दिया जाता है, न कि शोध कार्यों पर। ऐसे संस्थानों में असिस्टेंट प्रोफेसर की भर्ती के लिए टीचर एलिजिबिलिटी पर जोर देना चाहिए न कि शोध पात्रता पर।

फोकस केवल रिसर्च पर रहता है

असिस्टेंट प्रोफेसर बनने के लिए PhD की अनिवार्यता को जोड़ने से शिक्षा की गुणवत्ता में कोई फर्क आएगा ऐसा नहीं लगता, क्योंकि PhD के छात्र टीचिंग एप्टीट्यूड को नहीं सीखते हैं। उनका फोकस केवल रिसर्च पर रहता है।

प्रो. कौशल किशोर- डीन, स्कूल ऑफ एजुकेशन, सीयूएसबी, गया