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UGC बनाम स्टूडेंट्स:फाइनल ईयर और सेमेस्टर परीक्षाएं कराने पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा, कोर्ट ने सभी पक्षों को लिखित जवाब के लिए तीन दिन दिए

2 महीने पहले
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  • मामले में यूजीसी और सरकार की ओर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता रख रहे हैं पक्ष
  • न्यायधीश जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली बेंच मामले में कर रही है सुनवाई

फाइनल ईयर और सेमेस्टर की परीक्षाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट में करीब चार घंटे सुनवाई के बाद कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। कोर्ट ने छात्रों और सभी राज्यों से कहा है कि वे तीन दिन के भीतर हमारे सभी प्रश्नों का जवाब लिखित में जमा करें, इसके बाद ही कोर्ट किसी अंतिम निर्णय पर पहुंचेगी।

यूजीसी की 6 जुलाई की गाइडलाइन को चुनौती देती याचिका पर न्यायधीश जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली जस्टिस सुभाष रेड्‌डी और जस्टिस एमआर शाह की बेंच ने सुनवाई की। इससे पहले 14 अगस्त को कोर्ट ने अपना फैसला 18 अगस्त तक के लिए टाल दिया था।

यूजीसी और सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा। कोर्ट में छात्रों का पक्ष डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी और महाराष्ट्र, ओडिशा, दिल्ली और प.बंगाल सरकार के एडवोकेट जनरल ने रखाद्ध

मंगलवार कोर्ट रूम में से दलीलें दी गईं-

कोर्ट में राज्य सरकारों की ओर से दलील -

- कोर्ट में सबसे पहले महाराष्ट्र सरकार की ओर पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट अरविंद दातार ने कहा कि, हमारा राज्य बहुत कोरोना प्रभावित है। ऐसे में हमारे सामने परीक्षाएं कराने में व्यावहारिक समस्याएं हैं। दातार ने कहा कि, यूजीसी राज्यों पर परीक्षाएं कराने का दबाव नहीं बना सकता।

- एडवोकेट दातार ने इसके लिए राज्य और केंद्र की शक्तियों को हवाला भी दिया। इस पर जस्टिस शाह ने उन्हें टोकत हुए कहा- इस मामले में यूजीसी परीक्षाएं नहीं करा रहा है, परीक्षाएं कराना यूनिवर्सिटीज का काम है। आप ऐसा नहीं कह सकते कि यूजीसी परीक्षाएं कराता है।

- दातार ने कहा- हम भी छात्रों के लिए भी चिंतित हैं। हम भी चाहते हैं कि परीक्षा जल्द से जल्द आयोजित हो। हम उनके भविष्य को लेकर चिंतित हैं, लेकिन यह काम यूजीसी के तरीके से नहीं किया जा सकता।

- दातार की जिरह पूरी होने के बाद ओडिशा के एडवोकेट जनरल अशोक परीजा ने भी अपना पक्ष महाराष्ट्र की तर्ज पर रख रहे हैं। उनकी दलील है कि मौजूदा हालात में उस तरह से परीक्षाएं नहीं कराई जा सकती है जैसी हर बार होती थी।

- एजी परीजा ने कहा कि ओडिशा में कोरोना के मामले अपने पीक पर है और ऐसे में हम कॉलेज की परीक्षाएं कराने में समर्थ नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कॉलेजों में होस्टल मार्च से बंद है और उन्हें फिर से चालू करना एक हरक्यूलियन टॉस्क होगा।

- इसके बाद कोर्ट प.बंगाल में कोरोना के कारण बिगड़े हालात में वहां की टीचर्स एसोसिएशन का पक्ष सुन रहा है। उनकी ओर से सीनियर एडवोकेट जयदीप गुप्ता और एडवोकेट जनरल किशोर दत्ता ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि, हमारे राज्य में सुविधाओं की कमी है और कोरोना के कारण स्थितियां गंभीर हैं। ऐसे में यूजीसी की 6 जुलाई की एग्जाम गाइडलाइन राज्यों पर थोपी नहीं जा सकती। 30 सितंबर तक परीक्षाएं कराना 'अनरीजनेबल' है।

- अब दिल्ली सरकार की ओर से सीनियर एडवोकेट केवी विश्वनाथन पक्ष रख रहे हैं। उनकी दलील है कि यूजीसी ने अपनी गाइडलाइन में परीक्षा के जो तीन मॉडल सुझाएं हैं वो तीनों ही सही नहीं हैं। ऑफलाइन एग्जाम बिल्कुल नहीं करवा सकते। ऑनलाइन एग्जाम में गरीब बच्चे पिछड़ जाएंगे और घर से एग्जाम देने में ऐसे हालात नहीं कि किताबों से भी परीक्षा दी जा सके।

- राज्यों के बाद अब सरकार और यूजीसी की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता अपना पक्ष रख रहे हैं। मेहता ने कोर्ट से कहा कि, इस मामले में महाराष्ट्र की ओर से राजनीतिक समरसॉल्ट खेला जा रहा है। उन्होंने कोरोना काल के पूरे इवेंट को एक ऑर्डर में समझने की बात कही।

- इसके बाद कोर्ट ने सभी पक्षों को आगे तीन दिन का वक्त देते हुए लिखित में जवाब देने को कहा और अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

सरकार ने कहा- UGC को नियम बनाने का अधिकार

सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट में कहा कि फाइनल ईयर की परीक्षा कराना ही छात्रों के हित में है। सरकार और UGC का पक्ष कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता रख रहे थे। उन्होंने सुनवाई के दौरान कोर्ट से यह भी कहा कि परीक्षा के मामले में नियम बनाने का अधिकार UGC को ही है।

राज्यों के पास परीक्षा रद्द करने की शक्ति नहीं

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुंबई और दिल्ली राज्यों की तरफ से दिए गए एफिडेविट यूजीसी की गाइडलाइंस से बिल्कुल उलट हैं। तुषार मेहता ने कहा कि जब UGC ही डिग्री जारी करने का अधिकार रखती है। तो फिर राज्य कैसे परीक्षाएं रद्द कर सकते हैं?

UGC की दलील- स्टैंडर्ड खराब होंगे

इससे पहले यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (UGC) ने गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में कहा कि फाइनल ईयर की परीक्षा रद्द करने का दिल्ली और महाराष्ट्र सरकार का फैसला देश में उच्च शिक्षा के स्टैंडर्ड को सीधे प्रभावित करेगा। दरअसल, यूजीसी के सितंबर के अंत तक फाइनल ईयर की परीक्षा कराने के फैसले के खिलाफ जारी याचिका पर कोर्ट में जवाब दिया।

क्या है स्टूडेंट्स की मांग

दायर याचिका में स्टूडेंट्स ने फाइनल ईयर की परीक्षा रद्द करने की मांग की है। इसके साथ ही स्टूडेंट्स ने आंतरिक मूल्यांकन या पिछले प्रदर्शन के आधार पर पदोन्नत करने की भी मांग की है। इससे पहले पिछली सुनवाई में, यूजीसी की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने शीर्ष अदालत से कहा था कि राज्य नियमों को बदल नहीं सकते हैं और परीक्षा ना कराना छात्रों के हित में नहीं है। 31 छात्रों की तरफ से केस लड़ रहे अलख आलोक श्रीवास्तव ने कहा है कि, हमारा मसला तो यह है कि UGC की गाइडलाइंस कितनी लीगल हैं।

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने परीक्षाओं पर लगाई रोक

दूसरी तरफ हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने फाइनल ईयर परीक्षाओं पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने तक राज्य में परीक्षाओं पर रोक लगा दी है। 6 जुलाई को जारी गाइंडलाइंस में यूजीसी ने उच्च शिक्षा संस्थानों में फाइनल ईयर या सेमेस्टर की परीक्षाओं को 30 सितंबर तक कराने के निर्देश दिए गये थे। वहीं, फैसले के बाद से ही स्टूडेंट्स फिजिकली परीक्षा आयोजित कराने का लगातार विरोध कर रहे हैं।

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