संतों के क्षण व अन्न का तिरस्कार नहीं करना चाहिए

Anchalik News - मन की शांति तप, धन, बल अथवा संपत्ति से नहीं अपितु केवल सत्संग से ही मिलती है। दुनिया में मां का स्थान ही सर्वोच्च है।...

Bhaskar News Network

Feb 14, 2019, 03:01 AM IST
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मन की शांति तप, धन, बल अथवा संपत्ति से नहीं अपितु केवल सत्संग से ही मिलती है। दुनिया में मां का स्थान ही सर्वोच्च है। पिता का भी नहीं। कृष्णावतार भगवान के पूर्ण अवतार हैं अन्य सभी अंशावतार हैं।

समीपस्थ ग्राम नवापारा के गांधी चौक पर आयोजित संगीतमय श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ सप्ताह के तीसरे दिन अमलीडीह के कथा वाचक पं. लीलादेव महाराज ने वेदव्यास जन्म, वेदों की रचना व भगवान के 24 अवतारों का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि संतों के क्षण व अन्न के कण का तिरस्कार कभी नहीं करना चाहिए। उन्होंने बताया की पूर्व जन्म में देवर्षि नारद एक आया के पुत्र थे और संतों के संगत के कारण देवर्षि कहलाए। बुद्धि के देव श्री गणेश त्रिभुवन को छोड़ केवल अपने माता-पिता की परिक्रमा कर देवों के देव कहलाए क्योंकि माता-पिता की परिक्रमा विश्व भ्रमण के बराबर है। महाराज ने कहा की भागवत रस है, गंगा है, अमृत है, जिसका श्रवण करने का अवसर जन्म जन्मांतर के पुण्य उदय होने के बाद ही मिल पाता है।

पूतना मोक्ष की कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि भगवान ज्ञानी के नहीं बल्कि भक्ति के पीछे भागते हैं, इसीलिए दूध में जहर लेकर मारने आई पूतना को श्रीकृष्ण ने मां की गति प्रदान किया, क्योंकि उसने अपने आंखों में भगवान को बसाए रखा था। उन्होंने कहा की मोर निष्काम प्राणी होता है, इसीलिए उसका पंख श्रीकृष्ण के मुकुट में बिराजता है और उसके बिना श्रीकृष्ण का श्रृंगार पूरा नहीं होता।

उन्होंने कहा कि परिवार में सुख-शांति बनाए रखने के लिए दरवाजे पर आए भिक्षुक को कभी भी खाली हाथ नहीं लौटाना चाहिए और कुछ न कुछ अवश्य देना चाहिए। मुकुट सिर मोर का, मेरे चित चोर का, वो नैना नैना नैना मेरे सरकार का और ओम नमो भगवते वासुदेवाय जैसे भजनों से श्रोताओं में भक्ति जगाया। माखन देवांगन द्वारा आयोजित भागवत सुनने के लिए राम गोपाल द्विवेदी, रामेश्वर लाल वर्मा, कमल नारायण द्विवेदी, ललित शर्मा, धनेश देवांगन आदि लोग उपस्थित थे।

पं. लीलादेव महाराज

सुहेला. नवापारा के गांधी चौक पर आयोजित कथा सुनते हुए श्रद्धालु।

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