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पांच साल से एसईसीएल शिवपुर-चरचा माइंस से रोजाना 90 हजार लीटर प्रदूषित पानी डेम में छोड़ रहा

करार के मुताबिक एसईसीएल को चरचा अंडर ग्राउंड माइंस से निकलने वाले पानी को फिल्टर करके नाला में छोड़ना था, क्योंकि...

Bhaskar News Network | Last Modified - Apr 24, 2018, 03:15 AM IST

करार के मुताबिक एसईसीएल को चरचा अंडर ग्राउंड माइंस से निकलने वाले पानी को फिल्टर करके नाला में छोड़ना था, क्योंकि यही पानी नाला में बहकर जिला मुख्यालय सागरपुर स्थित झुमका डेम में मिल जाता है लेकिन शिवपुर-चरचा के माइंस से निकलने वाला गंदा पानी बीते 5 साल सीधे नाला में छोड़ दिया जाता है। जिससे यही पानी बहकर झुमका डेम में मिल रहा है। इससे न सिर्फ जलीय जीव जीवन पर खतरा मंडरा रहा है बल्कि पानी दूषित होने के कारण पीने लायक भी नहीं रह गया है।

जानकारी के अनुसार एसईसीएल शिवपुर-चरचा माइंस से प्रतिदिन 90 हजार लीटर प्रदूषित पानी नाला में छोड़ा जाता है, जो सीधे झुमका डेम में आकर मिल जाता है। जिससे झुमका डेम का पानी प्रदूषित हो रहा है। चरचा अंडर ग्राउंड से निकलने वाले खदान के प्रदूषित पानी को बिना फिल्टर के ही एसईसीएल के द्वारा छोड़ा जा रहा है। झुमका डेम के पानी की जांच में यह बात सामने आई। जिसके बाद जिला प्रशासन के निर्देश पर चरचा में ही खदान से निकलने वाले पानी को फिल्टर कर नाला में छोड़ने के लिए फिल्टर प्लांट बनवाया गया। लेकिन बिना फिल्टर का ही पानी छोड़ा जा रहा है।

गंदा पानी मिलने से जलीय जीवन प्रभावित हो रहा है, साथ ही पीने योग्य भी नहीं रहा डेम का पानी

पानी को फिल्टर करने के लिए बनाया गया फिल्टर प्लांट सिर्फ दिखावा साबित हो रहा है। इससे पानी को साफ ही नहीं किया जा रहा है।

एक पाइप दिखावा, दूससे से गंदा पानी पहुंचा रहे

खदान से पानी फिल्टर प्लांट मंे पहंुचाया जा रहा है। पर फिल्टर पानी वापस खदान में ही वापस किया जा रहा है। जबकि दूसरे पाईप के जरिए खदान का गंदा पानी सीधे नाला में छोड़ा रहा है। दैनिक निस्तार के लिए जिन लोगों के द्वारा इस पानी का उपयोग किया जा रहा है। उन्हें भी चर्म रोग सहित डेम मंे जलीय जीवों के आहार में कमी की बात सामने आ रही है। इससे क्षेत्र में पेट संबंधी परेशानी लोगों को बढ़ रही हैं।

झुमका डेम में मछली पालन भी प्रभावित

झुमका डेम में 33 लाख 52 हजार की लागत से समूह योजना के तहत मछली पालन किया जा रहा लेकिन खदान का गंदा पानी बहकर झुमका डेम में मिल रहा है। जिससे प्रकृतिक रूप से डेम मे रहने वाले जलीय जीवों का आहार नष्ट हो रहा है। हालांकि केज कल्चर में इस्तेमाल होने वाले पानी को ट्रीटमेंट दिया जाता है। जलेकिन समूह के माध्यम से जिनके द्वारा सीधे डेम मे मच्छली पालन किया जाता है। वहां मच्छली उत्पादन प्रभावित हो रहा है।

10 करोड़ का प्रस्ताव

एरिगेशन विभाग के ईई वीएस साहू ने बताया कि माइंस से निकल रहे गंदे पानी को फिल्टर कर नाला में छोडने के लिए 10 करोड़ का प्रस्ताव एसईसीएल को भेजा गया है। प्रस्ताव पास होने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

नष्ट हो रहा जलीय जीवों का प्रकृतिक भोजन

मत्स्य विभाग सहायक संचालक एसपी चौरसिया का कहना है कि बताया कि मत्स्य विभाग की शिकायत पर दो साल पहले पर्यावरण और एसईसीएल लैब अधिकारियों के द्वारा पानी की जांच कर कहा था कि पानी सभी पैरामीटर पर ठीक है लेकिन जलीय जीवों का प्रकृति भोजन प्रदूषित पानी के कारण नष्ट हो रहा है।

कंपनी को दिया काम

कलेक्टर नरेंद्र दुग्गा का कहना है कि नागपुर की निजी कंपनी नीरी को खदान से निकलने वाले गंदे पानी को साफ कर नाला में छोड़ने का काम दिया गया है। इसके लिए सीएसआर से करीब दो करोड़ का प्रस्ताव भेजा गया है।

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