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दूसरे बच्चे को भी किया रेफर, डाॅक्टर बोले- अब इलाज करने से लगता है डर

12 करोड़ के जच्चा-बच्चा अस्पताल में खुले शिशु वार्ड में भी नवजात की जान नहीं बच पा रही है, न ही यहां ठीक से इलाज हो पा...

Dainik Bhaskar

Feb 02, 2018, 02:05 AM IST
12 करोड़ के जच्चा-बच्चा अस्पताल में खुले शिशु वार्ड में भी नवजात की जान नहीं बच पा रही है, न ही यहां ठीक से इलाज हो पा रहा है। और यह रेफर सेंटर बनता जा रहा है। बुधवार को गंजईडीह के एक दंपति को हुए पहले बेटे की मौत हो गई थी। वहीं इसी गांव से एक बच्ची को भी प्रसव के बाद नहीं रोने पर भर्ती किया गया था। इसका भी डॉक्टर इलाज नहीं कर पाए। एक दिन भर्ती के बाद गुरुवार को उसे भी रेफर कर दिया गया।

इससे अब बच्ची के परिजन सोच में पड़ गए हैं कि एन वक्त में हम कहां-कहां इलाज के लिए भटकेंगे। पिछले महीने जब वार्ड शुरू किया गया तो प्रबंधन द्वारा दावा किया जा रहा था कि अब बच्चों को इलाज में सुविधा मिलेगी। गंभीर बीमारियों का भी यहां इलाज हो सकेगा। लेकिन यह दावा एक महीने के भीतर ही झूठा साबित होने लगा है। बच्ची के पिता मनोज निर्मलकर ने कहा कि जिला अस्पताल के इस वार्ड में बच्ची के ठीक होने की उम्मीद के साथ आए थे। लेकिन यहां भी रेफर कर दिया गया।

केस बिगड़ न जाए इसलिए िकया रेफर: डॉ. श्रीमाली

बालोद. इस बच्चे को किया रेफर जो प्रसव के बाद से रो नहीं रहा है।

वेंटिलेटर की कमी, नहीं कर पाते भर्ती: केसरवानी

लगातार नवजात की मौत व इलाज की सही व्यवस्था नहीं होने पर सवालों से घिरे सिविल सर्जन डॉ एसपी केसरवानी का कहना है कि शिशु गहन चिकित्सा वार्ड तो खुल गया है लेकिन यहां वेंटिलेटर मशीन की सुविधा नहीं है। जिसमें गंभीर बच्चों को भर्ती किया जा सके। इसलिए हम प्रारंभिक स्तर पर जितना हो सके, इलाज करने प्रयास करते हैं। अगर वेंटीलेटर मशीन की सुविधा मिलती तो ही यहां इलाज की व्यवस्था सुधर सकती है।

इस विशेष वार्ड के प्रभारी डॉ आरके श्रीमाली से जब भास्कर ने दूसरे बच्चे की सेहत की स्थिति जाननी चाही तो वे कहने लगे कि अब तो यहां इलाज करने से भी डर लगने लगा है। इसलिए बच्चे को रेफर कर दिया हैं। बच्चे के मुंह में प्रसव के समय बाथरूम व मल चले जाने के कारण सांस लेने में दिक्कत हो रही है। जिससे उसकी आवाज भी नहीं खुल रही है। प्रसव के कई घंटों बाद भी बच्चा रो नहीं रहा है। केस बिगड़ ना जाए, इसलिए हमने दूसरे दिन ही उसे रेफर कर दिया।

बच्चों का यह हाल तो माताओं का क्या होगा

इस अस्पताल में नवजात बच्चों का ही सही ढंग से इलाज नहीं हो पा रहा है तो फिर माताओं का कैसे यहां प्रसव हो पाएगा, यह प्रश्न चिन्ह बन गया है। अभी भी यहां स्टाफ व डाक्टरों की नियुक्ति नहीं हुई है। कुछ संविदा नर्स के भरोसे अस्पताल प्रबंधन काम चला रहा है। गंभीर केस में डॉक्टर कैसे प्रसव करवापाएंगे यह कह पाना मुश्किल लग रहा है। शिशु व मातृ मृत्यु दर को कम करने के उद्देश्य से शासन ने करोड़ों खर्च करके अस्पताल खुलवाया है।

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