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डीजे के शोरगुल में भी फाग मंडली ने नगाड़े की थाप को रखा है जिंदा

आधुनिकता के दौर में पारपंरिक होली अब गुम होने लगी है। आज की पीढ़ी डीजे के शोर शराबे में डूबी रहती है। पर इस दौर में भी...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 02, 2018, 02:05 AM IST

डीजे के शोरगुल में भी फाग मंडली ने नगाड़े की थाप को रखा है जिंदा
आधुनिकता के दौर में पारपंरिक होली अब गुम होने लगी है। आज की पीढ़ी डीजे के शोर शराबे में डूबी रहती है। पर इस दौर में भी शहर के कुछ इलाके में आज भी होली की प्राचीन विधा बरकरार है।

होली की मस्ती, फाग गीत का उत्साह, नगाड़ों की थाप और होलिका पूजा से पर्व मनता है। भास्कर ने तब और अब की तर्ज पर बुजुर्ग व युवा दोनों पीढ़ी से बात कर होली के बदलते रंग को सामने लाने का प्रयास किया। पांडेपारा, जवाहरपारा, नयापारा, टिकरापारा व पाररास में आज भी बड़े बुजुर्गों की फाग मंडली सक्रिय है। जो युवा पीढ़ी को भी प्रेरित कर रही है। इस विधा को जीवित रखने में शहर के कुछ लोग अहम भूमिका निभा रहे हैं।

बालोद. होलिकादहन के दिन गुरुवार को पांडेपारा में फाग गीत गाते हुए नागरिक।

बसंत पंचमी में ही गड़ जाता है अंडी का पेड़

शहर में सबसे पुरानी होलिका पुराने बस स्टैंड में जलती है। जहां होलिका दहन रात दो बजे होती है। शहर के सभी मारवाड़ी समाज की महिलाएं होलिका के फेरे लेकर पूजा करती है। बसंत पंचमी के दिन से यहां नागरिक अंडी का पेड़ गड़ाकर विधि विधान से पूजा कर लकड़ी इकट्ठा करना शुरू कर देते हैं।

आठ साल से बुधवारी बाजार में होली के दूसरे दिन करवाते हैं फाग प्रतियोगिता

होली इतिहास न बन जाए इसलिए पहल

व्यापारी शरद अग्रवाल ने कहा होली पर होलिका दहन, फाग गीत गाना, नगाड़े बजाना एक पारंपरिक विधा है। पर डीजे के दौर में यह विधा इतिहास बनकर न रह जाए इस उद्देश्य से पुराना बस स्टैंड में होलिका जलाते हैं।

पिता के साथ बैठकर बजाता हूं नगाड़ा

जवाहरपारा के पूनम कुमार (17) ने कहा कि फाग गीत व नगाड़े की धुन में जो आनंद है, वह डीजे में महसूस नहीं होता। मैंने पिता से फाग गीत का महत्व समझा। अब उनके साथ बैठ नगाड़ा बजाता हूं। अन्य युवा भी मंडली में शामिल हुए हैं।

पिता से सीखा फाग गीत, उन्हें याद कर गाते हैं

जवाहरपारा के त्रिभुवन सारथी ने कहा परदादा के जमाने से मुहल्ले में होली पर फाग गीत चलता है। पिता दीवान सारथी दुर्ग जिले के लोकप्रिय फाग गायक थे। उन्होंने बताया कि उनके निधन के बाद मैंने इस परंपरा को कायम रखा।

60 साल से परंपरा को सहेजने की कोशिश

पांडेपारा के पूर्णानंद आर्य ने कहा स्व. शंकर लाल योगी से पिता प्रेमलाल ने फाग सीखा और पिता से मैंने। उनके निधन के बाद अब साथियों के साथ फाग मंडली बनाकर प्रतियोगिता में जाते हैं। 60 साल से परंपरा को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं।

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