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महिलाओं के लिए साल भर में एक बार मंडई के दिन खुलता है दंतेश्वरी मंदिर का दरवाजा

Dainik Bhaskar

Jan 14, 2019, 02:05 AM IST

Balod News - जिला मुख्यालय से 9 किलोमीटर दूर दुधली (मालीघोरी), यहां का मां दंतेश्वरी मंदिर, जहां का दरवाजा सालभर में सिर्फ एक बार...

Balod News - chhattisgarh news danteshwari temple door opens once a year for women
जिला मुख्यालय से 9 किलोमीटर दूर दुधली (मालीघोरी), यहां का मां दंतेश्वरी मंदिर, जहां का दरवाजा सालभर में सिर्फ एक बार महिलाओं, लड़कियों के लिए खुलता है, वह भी मंडाई के दिन। यहां के मंदिर में स्थापित की गई मां दंतेश्वरी की प्रतिमा, 12 गांव की आराध्य देवी मानी जाती है।

मंदिर के दरवाजा विशेष रूप से दुधली मंडई को साल में सिर्फ एक बार महिलाओं के लिए खुलता है। इस बार 19 जनवरी को मंडई मनाने का निर्णय लिया गया है। क्षेत्र के महिलाओं को विशेष रूप से इस दिन का इंतजार रहता है। पूर्व सरपंच गंगाराम देशमुख ने बताया कि यहां होने वाले मेले के लिए 8 गांव में छत्तीसगढ़ी नाचा का आयोजन होता है।

आयोजन का जिले में अलग पहचान है। गांवों में मेहमान आते हैं एवं रात में छत्तीसगढ़ी नाचा कार्यक्रम होता है। रेंगनी, रंेघई, मालीघोरी, दुधली, बनगांव, खपरी,धौराभाठा, कोरगुड़ा, कलकसा सहित 10गांव के हजारों लोग मंडई में शामिल होते हैं।

चिराम परिवार के लोग करते हैं पूजा: चिराम परिवार के लोग मंदिर में विशेष पूजा अर्चना करते हैं। सोमवार व गुरुवार को बैगा के माध्यम से मंदिर का दरवाजा खुलता है लेकिन महिलाओं के लिए नहीं। शोक कार्यक्रम होने पर मंदिर नहीं खुलता।

19 जनवरी को मंडई: 12 गांव की आराध्य देवी मानी जाती है दंतेश्वरी की प्रतिमा

बालोद. दुधली के इस मंदिर का दरवाजा 19 जनवरी को खुलेगा।

किसी को आया था सपना तब बनाया गया मंदिर

मंदिर में महिलाओं का प्रवेश क्यों प्रतिबंध है, साल में एक ही दिन क्यों दरवाजा क्यों खुलता है, इस संबंध में गांव वाले कुछ बता नहीं पा रहे हैं। सिर्फ कह रहे हैं कि गांव के एक व्यक्ति को सपना आया था फिर मंदिर बनाया गया। गांव के रुपु देशमुख, सौरभ का कहना है कि जहां मां दंतेश्वरी को स्थापित किया गया। तीन साल के अंतराल में नवरात्र के दौरान ज्वारा जगाते हैं, तब भी मंदिर के दरवाजे खोले जाते हैं। प्राचीन काल से ही महिलाओं का प्रवेश वर्जित है।

इसलिए उमड़ती है लोगों की भीड़

इस दिन नदी में स्नान करके पूजा पाठ करने का विशेष महत्व है। स्नान के बाद मंदिरों में पूजा करने भक्तों की कतारें लगी रहती हैं। गौरेया मंदिर में स्थापित विभिन्न देवी देवताओं की मूर्ति के दर्शन करने श्रद्धालु जुटे रहते हैं। मंदिर की घंटी दिन-रात बजती रहती है। कबीर घाट में दूर-दूर से आए साहेब संतों का प्रवचन चलता रहता है।

क्षेत्र के इन गांवों में रात को ये कार्यक्रम होंगे

19 जनवरी को मालीघोरी में गोपी किशन छत्तीसगढ़ी नाचा पार्टी ग्राम चरोटा अंगारी, दुधली में जय गंगा मैया नाचा पार्टी ग्राम कुहीखुर्द दुर्रेबंजारी, खपरी में छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी ग्राम निच्चे कोडहा, रेंगनी में छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी ग्राम गंजईडीह, रेंघई में छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी ग्राम- मिशटिर्री, बनगांव में छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी ग्राम- हुच्चेटोला, धौराभाठा में छत्तीसगढ़ी नाच पार्टी ग्राम साल्हेटोला( चारामा) जिला कांकेर का कार्यक्रम होगा।

मोहंदीपाट से शुरुआत होती है, ओटेबंद में समाप्त

जिले में दिवाली के बाद पड़ने वाले पहले रविवार को मोहंदीपाट से मेले की शुरुआत होती है। इसके दो दिन बाद यानि पहले मंगलवार को सिकोसा का चर्चित मेला होता है। माघी पूर्णिमा में गौरेया धाम व पाटेश्वर धाम के मेले में जिले भर से लोग जुटते हैं। ओटेबंद में फरवरी में 11 दिनों के मेले के साथ यह सिलसिला खत्म होता है।

यहां की विशेषताएं

शिवलिंग गौरेया मंदिर की प्रमुख खासियत यहां की शिवलिंग प्रतिमा है। जिसे लोग चमत्कारी मानते हैं। यह एक मंदिर में गर्भगृह में स्थापित है। किंवदंती है कि इस शिवलिंग पर जितना भी जल चढ़ाओ वह जल बहकर कहां जाता है, किसी को पता नहीं चलता। मंदिर प्रांगण में स्थापित किए गए प्राचीन मूर्तियों को भी लोग एक ओजस्वी धरोहर समझकर पूजा करते हैं। मेले में खासकर महिलाओं द्वारा इन मूर्तियों में चावल रुपए चढ़ाए जाते हैं। 16 जनवरी को बड़गांव एवं 18 को खरथुली का मंडई रखी गई है।

इधर माघी पूर्णिमा पर फरवरी में गौरैया मेला

जिला मुख्यालय से 20 किलोमीटर चौरेल में गौरेय्या मेला माघी पूर्णिमा पर फरवरी में लगेगा। बालोद-दुर्ग मुख्य मार्ग में पैरी से मुड़कर दो किलोमीटर दूर इस धार्मिक जगह में हर साल हजारों लोग पहुंचते हैं। भक्ति की बयार बहती रही है। तांदुला संगम स्थल श्री सिद्ध गौरेया शक्ति पीठ चौरेल, पैरी आश्रम व मोहलई के कबीर घाट में माघी पूर्णिमा का विशाल मेला लगता है। जिसमें बालोद जिले के और अन्य शहरो के हजारों श्रद्धालु रात 12 बजे के बाद से सुबह 9 बजे तक नदी में स्नान करते हैं।

मेला यानि उत्सव व देव दर्शन पर जुटने वाली भीड़

मेला लगभग हर गांव में होने वाला एक ऐसा उत्सव है। जिसमें लोग परिवार व मेहमान सहित देव दर्शन करने जुटते हैं। साल में एक बार पूरा गांव इसे पर्व के रूप में मनाता है। इस खुशी में शामिल करने के लिए पड़ोसी गांव के लोगों व धार्मिक मान्यता अनुसार देवी देवताओं के रूप में डांग डोरी को भी न्योता दिया जाता है। रात में नाच व सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। आयोजन का पूरा खर्च गांव भर से चंदा करके वहन किया जाता है।

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