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बाजे-गाजे के साथ पैदल चलकर डांग-डोरी लेकर पहुंचे वीर मेला / बाजे-गाजे के साथ पैदल चलकर डांग-डोरी लेकर पहुंचे वीर मेला

Bhaskar News Network

Dec 09, 2018, 03:15 AM IST

Balod News - शनिवार को घने वनों के बीच स्थित राजाराव पठार में आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिली। मौका था साल में एक बार होने...

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शनिवार को घने वनों के बीच स्थित राजाराव पठार में आदिवासी संस्कृति की झलक देखने को मिली। मौका था साल में एक बार होने वाले तीन दिवसीय वीर मेला का। जहां रंग-बिरंगे वेशभूषा में महिला, पुरुष व बच्चे कांकेर, धमतरी व बालोद जिले से पहुंचे थे। सुबह से ही मेला स्थल पर आदिवासियों के आने का सिलसिला शुरू हो गया था। लोग अाते जा रहे थे और राजाराव पठार स्थित मंदिर में पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि की कामना कर रहे थे।

कोई फूल चढ़ा रहे थे तो कोई चावल। कोई सावधान की मुद्रा में हाथ जोड़कर प्रार्थना कर रहे थे तो कोई दंडवत होकर राजाराव महाराज से आशीर्वाद मांग रहे थे। लोगों की भीड़ इतनी कि लाइन लगाकर राजाराव देव महाराज के दर्शन के लिए इंतजार करना पड़ रहा था। फिर भी आस्था में इंतजार सुखद लग रहा था। परेशानी होते हुए भी लोगों के चेहरे पर खुशी दिख रही थी। मेला स्थल से दो किमी दूर जंगल के बीच में स्थित देव स्थल में राजराव बाबा, लिंगो बाबा, चरवाहा डोगावाले बाबा की पूजा परंपरा अनुसार दोपहर 1.30 बजे किया व तीन दिवसीय वीर मेला के लिए आशीर्वाद मांगा। इसके बाद जयकारा करते हुए घने जंगल के बीच से आदिवासी युवा मोर्चा के नेतृत्व में डांग-डोरी के साथ शोभाायात्रा निकाली। अागे-आगे समाज के मुखिया व डांग-डोरी, बाजे-गाजे के साथ चल रहे थे। जंगल से निकलकर जगदलपुर नेशनल हाईवे से होकर वीर मेला स्थल तक पहुंचे।

मांगा आशीर्वाद: 3 जिले के आदिवासी समाज के लोग आए

तार्रीभरदा. डांग-डोरी के साथ शोभायात्रा में शामिल आदिवासी समाज के लोग।

वीर मेला : गांवों में रहा उत्सव का माहौल

वीर मेला को लेकर गांव में उत्सव का माहौल देखने को मिला। सुबह से ही महिलाएं घर द्वार की लिपाई-पोताई की। घर के अांगन पर रंगोली सजाई, फिर सज-धज कर मेला के लिए निकल गई। बच्चों व महिलाओं ने मेला को लेकर ज्यादा उत्साह देखने को मिला। मेला स्थल पर खरीदी के लिए खिलौने खाने-पीने की चीजे व अन्य दुकान लगे है। जहां आदिवासी बच्चे अपने पसंद के सामान खरीदते नजर आए।

ऐसे पहुंच सकते हैं राजाराव पठार: राजाराव पठार मेला स्थल रायपुर-जगदलपुर मुख्य मार्ग के पास है। अगर आपको वीर मेला जाना है तो उसके लिए दो रास्ते है। बालोद से पुरुर होते हुए जगदलपुर मार्ग से या बालाेद से घोटिया चौक से होते हुए चारामा-मरकाटोला मार्ग पकड़कर बड़भूम होते हुए पहुंच सकते हैं। जिला मुख्यालय से दूरी 55 किमी है। अगर रानीमाई, बड़भूम मार्ग से होते हुए जाएंगे तो जंगल के नजारे का आनंद ले सकते हैं। पक्की सड़क बन जाने से कोई परेशानी नहीं होगी। केवल जंगलीभेजा से मरकाटोला तक 5 किमी की सड़क में थोड़ा-बहुत परेशानी होगी।

पानी की समस्या से जूझना पड़ा

वीर मेला स्थल के विकास के लिए सरकार ने लाखों रुपए की स्वीकृति दी है। सामुदायिक भवन सहित अन्य सुविधाआें का विकास किया गया है। वहीं पेयजल के लिए सौर ऊर्जा चलित पंप लगाया गया है। लेकिन पंप के ठीक से नहीं चलने के कारण लोगों को गांवों तक पानी के लिए आना पड़ा। ड्रम में भरकर गांव से पानी ले जाना पड़ा। शोभायात्रा के दौरान डांग-डोरी को लेकर चल रहे आदिवासी आस्था में झुमते नजर आए।

समाज के लोगों ने किया रिलो नृत्य

समाज के लोगों ने रिलो नृत्य किया। पूर्व सांसद सोहन पोटाई, आयोजन समिति के अध्यक्ष शिशुपाल साेरी, उपाध्यक्ष जीआर राणा, कार्यवाहक अध्यक्ष यूआर गंगराले, विनोद नागवंशी, केके ठाकुर, महा सचिव आरएन ध्रुव, भावसिंह टेकाम, बलराम गोटी, उत्तरा मरकाम, उल्फी टेकाम, त्रिभुवन ठाकुर, लक्ष्मी ध्रुव, नीता नेताम, कुशलराम, किशोर सहित समाज के लोगों ने सामुहिक रूप से रिलो नृत्य किया।

कोई पैदल तो कोई चार पहिया में पहुंचे

राजाराव पठार में मेला देखने केवल अंचल के ही नहीं, बल्कि दूरदराज के लोग भी पहुंचे थे। पांच से 10 किमी की दूर गांव में रहने वाले आदिवासी परिवार बच्चों को लेकर पैदल पहुंचे। कई लोग साइकिल से पहुंच। वहीं दूरदराज के आदिवासी पिकअप, ट्रैक्टर, मेटाडोर, ऑटो सहित अन्य चार पहिया वाहन से आए। वाहनों की अधिकता के कारण कर्रेझर ओनाकोना मार्ग के पास राष्ट्रीय राजमार्ग के किनारे पार्किंग स्थल बनाया गया है। मुख्य मार्ग पर यातायात्र व्यवस्थित करने पुलिस की ड्यूटी भी लगाई गई है।

आज होगी आदिवासी महापंचायत

वीरनारायण शहादत दिवस पर आदिवासी महापंचायत, आदिवासी हाट का आयोजन किया गया है। लोक संस्कृति का कार्यक्रम होगा। रविवार को भोयरादादा दल्लीराजहरा, महुआ के फूल चढ़ाई खैरोदाई, सुरोती के दीया, बस्तरिहा मोर संगवारी नृत्य, मोर जहूरिया सांस्कृतिक कार्यक्रम, रिकाॅर्डिंग डांस, पड़की सुआ नृत्य, आदिवासी गेड़ी नृत्य होगा। रात में संस्कृति विभाग ने केकराखोली का रंग तरंग सांस्कृति कार्यक्रम रखा है।

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