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फागुन मेले में दंतेश्वरी और भुवनेश्वरी माता के छत्र को कराई नगर परिक्रमा

फागुन मेले में बुधवार को आठवीं पालकी निकली और दिन में बड़ा मेला-मंडई आयोजित किया गया जिसमें देवी दंतेश्वरी और...

Danik Bhaskar | Mar 01, 2018, 02:10 AM IST
फागुन मेले में बुधवार को आठवीं पालकी निकली और दिन में बड़ा मेला-मंडई आयोजित किया गया जिसमें देवी दंतेश्वरी और भुवनेश्वरी माता के छत्र को नगर परिक्रमा कराई गई। प्रधान पुजारी हरेंद्रनाथ कुर्सीनुमा पालकी पर सवार होकर दोनों देवियों के छत्र लिए हुए थे, जिन्हें कंधे पर लेकर मंदिर के सेवक चल रहे थे।

इस बार बस्तर राज परिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव भी इस परिक्रमा में शामिल हुए। देवी का प्रथम पुजारी होने के नाते पूर्व में उन्हें भी प्रधान पुजारी की तरह कुर्सीनुमा पालकी पर परिक्रमा कराने की योजना बनी थी, लेकिन बाद में इस निर्णय को बदलते हुए उन्हें खुली जीप पर सवार कराया गया।

परिक्रमा में आस-पास और दूरदराज से आए 600 से ज्यादा देवी-देवताओं के ध्वज, छत्र लिए ग्रामीण और लोकनर्तक दल, मुंडा बाजा वादक भी शामिल थे। शक्तिपीठ से शीतला माता मंदिर होते हुए काफिला साप्ताहिक बाजार स्थल पहुंचा और बाजार परिक्रमा के बाद बस स्टैंड, मेंडका डोबरा मैदान होते हुए काफिले की मंदिर वापसी हुई। इसके बाद देवी की आठवीं पालकी निकली।

नाट प्रतियोगिता का उठाया लुत्फ : मंगलवार की रात मेंडका डोबरा मैदान में आयोजित उड़िया-भतरी नाट प्रतियोगिता में कुल आठ दलों ने एक साथ अपनी प्रस्तुति दी। इनमें 5 दल नाट का मंचन करने वाले और 3 दल भजन कीर्तन वाले थे। इनमें से प्रथम पुररस्कार 31000 रुपए मूसागुड़ा बस्तर के नाट दल को, द्वितीय पुरस्कार 25000 रुपए मिचनार बस्तर और तृतीय पुरस्कार 21000 रुपए पुसपाल बस्तर के नाट दल को मिला।

आंवरामार और होलिका दहन आज : गुरूवार को देवी की नवमीं पालकी निकलेगी। इसी शाम पालकी लौटने के बाद आंवरामार की रस्म होगी, जिसमें आंवले से एक-दूसरे के शरीर पर प्रहार किया जाता है। शक्तिपीठ की हाेलिका दहन की रस्म भी इसके बाद होगी।

दंतेवाड़ा. देवी के छत्र के साथ प्रधान पुजारी हरेंद्रनाथ।

गंवरमार में रचा आखेट का स्वांग

इसके पहले मंगलवार की शाम देवी की सातवीं पालकी निकली। इसके बाद रात के तीसरे पहर यानी सुबह करीब 4 बजे गंवरमार की रस्म हुई। इस रस्म में वन्य जीव गौर के शिकार का स्वांग रचा गया। लमहामार, कोडरीमार और चीतरमार की रस्म से अलग इस रस्म में वन्य जीव गंवर का बड़ा ढांचा तैयार किया जाता है, जिसे कंवलनार के समरथ को धारण कराया जाता है। गंवर को रस्सी से बांधकर नियंत्रण करने वाले की भूमिका पंडेवार निवासी ग्रामीण निभाता है, जिसे बखारी कहते हैं। बखारी को गंवर हमले में घायल कर देता है, फिर दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी बंदूक से रस्मी फायर कर पुजारी इसका शिकार करते हैं। मेंडका डोबरा मैदान के बाद फिर से इसे दंतेश्वरी मंदिर के सामने दोहराया गया।