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फाग लाेकसंगीत है कभी भी सुनिए

नगाड़े, झांझ- मंजीरा, तबले, हारमोनियम के साथ शिवकुमार तिवारी छोटे से श्याम कन्हैया रे... की तान छेड़ते हैं तो हजारों लोग...

Bhaskar News Network | Last Modified - Mar 02, 2018, 02:20 AM IST

फाग लाेकसंगीत है कभी भी सुनिए
नगाड़े, झांझ- मंजीरा, तबले, हारमोनियम के साथ शिवकुमार तिवारी छोटे से श्याम कन्हैया रे... की तान छेड़ते हैं तो हजारों लोग खुद को थिरकने से नहीं रोक पाते। देशभर में फाग गीतों पर 20 हजार से अधिक प्रस्तुतियां दे चुके शिवकुमार चिंतित हैं कि छत्तीसगढ़ की यह प्रसिद्ध परंपरा अब खत्म होती जा रही है।

छत्तीसगढ़ के गांव हों या शहर... शिवकुमार तिवारी के फाग गीत होली के पखवाड़ेभर पहले से गूंजने लगते हैं। मुख मुरली बजाय….या दे दे बुलउवा राधे को..., राधे बिन होरी न होय या बजे नगाड़ा दस जोड़ी, राधा किसन खेले होरी... जैसे फाग गीत आज भी लोगों की जुबान पर होते हैं। शिवकुमार कहते हैं, होली के पहले अब दे दे बुलउवा राधे को सुनाई नहीं देता। होली के समय राधा-कृष्ण, सीता- राम और आल्हा-उदल पर आधारित फाग की रचनाएं लोगों में उत्साह और उमंग का संचार कर देती हैं। फाग गीतों की खासियत है कि ये संगीत के साथ गाये जाने पर लोगों को खुद-ब-खुद झूमने पर मजबूर कर देते हैं। बिलासपुर के देवकिरारी गांव में रहने वाले पं. तिवारी बताते हैं उनके गांव में होली पर फाग गीतों के कई पारंपरिक कलाकार हुए। उन्हें देखकर सीखा और छत्तीसगढ़ी फाग को देशभर में पहुंचाने का काम कर रहे हैं। सालभर ही उनके आयोजन होते रहते हैं।

फाग पर 20 हजार से अधिक प्रस्तुति दे चुके शिवकुमार ने छत्तीसगढ़ के बाहर भी पहुंचाया है इस विधा को। वे मध्यप्रदेश के भारत भवन, मुंबई, दिल्ली, आगरा, लखनऊ, नागपुर समेत विभिन्न जगहों पर प्रस्तुतियां दे चुके हैं।

फाग की परंपरा

रतनपुरिहा गम्मत में भी शामिल है फाग

छत्तीसगढ़ी गम्मत की पहचान देशभर में है। खासकर रतनपुरिहा गम्मत में फाग भी शामिल है। वरिष्ठ रंगकर्मी मनीष दत्त ने बताया कि गम्मत का एक अंग है फाग गम्मत। वसंत पंचमी के दिन से फाग गायन की शुरुआत हो जाती है। मूल रूप से फाग होली के आसपास टोली के रूप में गाया जाता है, लेकिन अब फाग लोक परंपरा के संगीत में शामिल होने के बाद सालभर सुना जा सकता है।

विसंगतियों पर चोट का जरिया

दुर्ग में रहने वाले साहित्यकार और लोक गीतों व परंपरा पर लंबे समय से रिसर्च कर रहे संजीव तिवारी कहते हैं, दरअसल फाग समाज की विसंगतियों पर चोट करने का जरिया है। लोक गायक जब सीधे तरीके से अपनी बात नहीं कह पाता तो फाग के जरिए समाज की विसंगति और विरुपताओं पर व्यंग्य करता है। वे कहते हैं राधा-कृष्ण और सीता-राम पर आधारित फाग गीतों में श्रृंगार और प्रेम की अभिव्यक्ति होती है।

बिलासा कला मंच होली पर 25 साल से

दे रहा मूर्खाधिराज की उपाधि

शहर के बिलासा कला मंच द्वारा पिछले 25 सालों से होली पर साल में चर्चित रहने वाली हस्तियों को मूर्खाधिराज की उपाधि से नवाजा जा रहा है। राजनीति, रंगमंच, साहित्य, समाज सेवा सहित अन्य क्षेत्रों के कई दिग्गज को अब तक सम्मानित किया जा चुका है। मंच के संस्थापक सचिव डॉ. सोमनाथ यादव व सदस्यों द्वारा शुरू की गई यह परंपरा आज भी कायम है। यही नहीं, इसके साथ कई अन्य संस्थाएं भी इस परंपरा को आगे बढ़ाने लगी हैं। इसी तरह बिलासपुर के कई संगठनों व समितियों द्वारा होली से पहले फाग प्रतियोगिता और पर्व मनाने का सिलसिला सालों से चला आ रहा है। इसी तरह सीपत के पूर्व विधायक वंद्रप्रकाश वाजेपयी द्वारा होली पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन पिछले कई सालों से किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की खासियत यह है कि शहर के प्रबुद्ध नागरिक, साहित्यकार, रंगकर्मी जुटते हैं।

पं. शिवकुमार तिवारी के आयोजनों में इस तरह से भीड़ जुटती है।

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Web Title: फाग लाेकसंगीत है कभी भी सुनिए
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