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सेहत से खिलवाड़: ना सेंट्रल किचन का जायजा और ना लाइसेंस की कर रहे जांच, कह रहे-अमला नहीं है

खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अधिकारी दावे कर भूल गए हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले रेडी टू ईट के पैकेट पर लाइसेंस...

Danik Bhaskar

Mar 01, 2018, 02:30 AM IST
खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अधिकारी दावे कर भूल गए हैं। उन्होंने कुछ दिन पहले रेडी टू ईट के पैकेट पर लाइसेंस नंबर अंकित करने का निर्देश जारी किया था। इसके निर्माता इसका पालन कर रहे हैं या नहीं। इस बात की तस्दीक करने वाला कोई नहीं है। और न इसकी जांच शुरू हुई है। इसके चलते अव्यवस्था हावी है। इसी तरह बिलासपुर में सैकड़ों कैटरर्स बिना पंजीयन ठेका चला रहे हैं। इसकी भी पूछपरख करने वाला कोई नहीं है।

विभाग अधिकारी मामले में अमले की कमी बताते हैं। उनका कहना है कि ऐसा सालों से चल रहा है। इसके कारण जहां जरूरत है, वहीं तक जांच सीमित है। बिलासपुर में अब तक हजारों समारोह का आयोजन हो चुका है। सैकड़ों की संख्या में बिना पंजीयन के कैटरर का ठेका लिया जा रहा है। फिर भी सब यथावत है। गौरतबल है कि यहां के नामी कैटरर्स एक थाली के एवज में पांच से छह सौ रुपए तक वसूल रहे हैं। वे यह पैसा शादियों में खाना बनाने और परोसने के लेते हैं। कुछ तो ऐसे भी हैं, जो सरकारी समारोह के दौरान नेता मंत्रियों की आमद पर भोजन बनाने का ठेका लेते हैं। इसके बदले में उन्हें मोटी रकम मिलती है। खान-पान मापदंडों के अनुरूप या नहीं? कैटरर जिन शर्तों का दावा करते हैं वे हकीकत में निभाते हैं या नहीं? लोगों की सेहत को लेकर वे कितने फिक्रमंद होते हैं? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के प्रभारी देवेंद्र िवन्ध्यराज ने बताया था कि शादी में सैंपलिंग करने पर विवाद की स्थिति निर्मित होती है। इसके कारण उन्होंने फिलहाल कहीं भी जांच शुरू नहीं की है। अभी भी वे यही बात दोहरा रहे हैं।

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यहां से सैंपल लेने के बाद दिए थे सुधार के निर्देश

खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की टीम ने मां भवानी स्व सहायता समूह, मातेश्वरी स्व सहायता समूह, राधे-राधे स्व सहायता समूह सहित कई जगहों पर रेडी टू ईट की जांच की थी। उन्होंने बच्चों की सेहत पर इसका विपरीत असर नहीं हो, इसे देखते हुए संबंधित कर्मचारियों को सफाई सहित अन्य बातों पर ध्यान देने के निर्देश दिए हैं। इसके बाद से अब तक किसी भी समूह से रेडी टू ईट के नमूने नहीं लिए गए हैं। समझा जा सकता है कि किस हद तक लापरवाही जारी है।

केस-1

मिलावटखोरी की जांच के लिए लैब नहीं रिपोर्ट आने में लगते हैं सालों, बहाने भी आम

शहर में मिलावटखोरी और खाने-पीने के सामान की जांच कराने की कोई सुविधा नहीं है। खुद खाद्य एवं औषधि विभाग के कर्मचारी रायपुर स्थित लैब पर निर्भर हैं। यहां से कई महीनों में भेजे गए सामान की जांच रिपोर्ट आती है। तब तक मिलावटखाेरों और गड़बड़ी करने वालों को अफसरों से मिलीभगत करने का पूरा मौका मिल जाता है। इससे पहले भी खाद्य पदार्थों में दुकानदार की ओर से सामान के साथ मिलावटखोरी और इनके अमानक मिलने का मामला सामने आ चुका है। सरकार नियमों के अनुसार ऐसे मामलों में कम जुर्माना और सरकार की ओर से बरती जा रही लापरवाही के चलते इनके हौसले बुलंद हैं। इनके जिम्मेदार अधिकारी शिकायतों के बाद दुकानों में पहुंचकर सैंपल उठाते हैं और इसे रायपुर स्थित कालीबाड़ी के सरकारी लैब में जांच के लिए भेजा जाता है। वहां से कंपनी के मापदंडाें के अनुरूप सामान सही या गलत इसकी रिपोर्ट भेजी जाती है।

सेंट्रल किचन की जांच महीनों से नहीं, 86 स्कूलों को भेजते हैं भोजन, इसलिए सवाल

छत्तीसगढ़सरकार ने सभी सेंट्रल किचन में किस स्तर का भोजन तैयार हो रहा है, इसकी जांच का जिम्मा खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग को सौंपा है। इसके बावजूद महीनों से इसकी जांच नहीं हुई है। इसलिए कोई अधिकारी ये नहीं बता पा रहा है कि यहां मानकों के अनुरूप खाना बना रहा है या नहीं। स्कूल, शिक्षा विभाग भी इसकी ओर ध्यान देने को तैयार नहीं। इसलिए बच्चों की दिक्कत बरकरार है। बिलासपुर के 86 स्कूलों मंे भोजन बांटने की जिम्मेदारी सेंट्रल किचन के जिम्मे हैं। यहां से वाहन के जरिए आसपास इसकी सप्लाई की जाती है। खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग ने बताया कि कुछ साल पहले यहां चावल के सैंपल उठाकर रायपुर स्थित लैब में जांच के लिए भेजी गई थी। वहां से रिपोर्ट ओके हो गई। तब से उन्होंने सेंट्रल यहां की जांच नहीं है। अभी भी सबकुछ यूं ही चल रहा है।

केस-2

नई कंपोजिट बिल्डिंग स्थित खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग का दफ्तर।

इन संस्थानों में गड़बड़ी पर नहीं होती कार्रवाई

खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग के अधिकारियों ने कुछेक सरकारी संस्थानों में चल रही गड़बड़ी पकड़ी थी। ये सारी लापरवाही खाने-पीने की चीजों में मिली। इसके बावजूद इनके निर्माता पर कार्रवाई नहीं की गई। पूछने पर वजह बताया गया कि इन्हें किसी नियम के तहत छूट दी जाती है। इसलिए अभी तक सरकारी संस्थानों पर जुर्माना का प्रावधान नहीं बढ़ाया गया है। इसके कारण सरकारी संस्थानों में कई तरह की लापरवाही की शिकायत मिलती रही है।

केस-3

प्रतिबंध के बाद बिक रहा गुटखा, कोटपा बेअसर, सामान रखने की जगह नहीं न्यायधानी और आसपास गुटखा पर प्रतिबंध बेअसर होता दिख रहा है। बाजार में इसे चोरी छिपे तो कई इलाकों में इसे खुलेआम बेचा जा रहा है। हालांकि प्रतिबंध के बाद इस अवैध बिक्री पर अंकुश लगाने खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग ने थोड़ा प्रयास जरूर किया, पर व्यापारियों पर इसका कुछ खास असर नहीं दिख सका। तंबाखू मिली वस्तुओं का सेवन इंसान को बीमारी के करीब लाता है। धीरे-धीरे यह इंसान को मौत के मुंह तक धकेल देता है। इससे किशोरों के दिमाग पर खासा असर पड़ता है और वर्तमान स्थिति में यह युवा पीढ़ी को अपने चपेट में ले रहा है। भविष्य में इसके साइड इफेक्ट को देखकर राज्य सरकार ने 25 जुलाई 2012 को गुटखे की खरीदी-बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया। प्रतिबंध के कुछ दिनों तक इसका असर भी देखा गया, लेकिन अब इसकी बिक्री शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ती जा रही है।

केस-4

शिकायत पर करते हैं कार्रवाई


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